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जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं …… | Pavitra India

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संतोष भारतीय ने बहुत मौजूंं सवाल उठाया। देश धधक रहा है। पर मणिपुर हो, नूंह हो या कहीं और, कहीं भी सिविल सोसायटीज के लोग नजर नहीं आते । न कहीं कोई संत, मौलवी, महात्मा, बाबा इत्यादि। लंबे समय से इस शून्य को देखा जा रहा था । नोटिस भी हर किसी ने किया होगा लेकिन कहते हैं न कि एक ‘ब्लैक स्पॉट’ भी होता है। बस वैसा ही कुछ समझिए। तो संत महात्माओं और मौलवी वगैरह को तो छोड़ दीजिए पर हमारी सिविल सोसायटीज के लोग कहां हैं। सिविल सोसायटी देश की चिंता या शिद्दत से परवाह करने वालों से बनती है वरना परवाह तो कहीं न कहीं हर कोई करता ही है। पर वे लोग और वे संस्थाएं जो सांविधानिक, लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की खातिर जनहित में अपना सर्वस्व न्योछावर करती रही हैं वे इस भीषण समय में कहां हैं। प्रश्न यह है। वे कहीं दिखती क्यों नहीं। क्या जो सोशल मीडिया हमें दिखा रहा है वही सत्य है। यह प्रश्न बड़ा मौजूं है। इस प्रश्न का उतना ही सीधा जवाब अभय दुबे ने दिया कि मोदी ने तमाम सिविल सोसायटीज को खतम या कहिए ध्वस्त कर दिया है। इस मुतल्लिक मेरा सुझाव है कि ‘लाउड इंडिया’ के इस शो को जरूर देखें। इस बार कई प्रश्नों के उम्दा जवाब अभय दुबे ने दिये हैं। जैसे, सिविल सोसायटीज को खतम किया क्योंकि गैर बीजेपी, गैर आरएसएस , गैर मोदी को ही सिविल सोसायटी मान लिया गया। जैसे, साम्प्रदायिक राजनीति हर वक्त मौजूद रहती है जब तक हम (सत्ता) चाहें, साम्प्रदायिक राजनीति और लोकतंत्र का संबंध छुटभैये नेताओं को समझ नहीं आता, इसी प्रसंग में बात करें तो इंदिरा गांधी ने एकात्मक यात्रा के लिए प्रच्छन्न रूप से विहिप का साथ दिया था, सिविल सोसायटीज के अर्थ में सार्वजनिक जीवन का सरकारीकरण कर दिया गया है और इसी तरह नूंह की साम्प्रदायिकता का भी चुनावीकरण कर दिया गया है आदि आदि।
तो क्या इसका अर्थ हुआ कि अब सिविल सोसायटी ट्विटर और फेसबुक पर ही नजर आएगी और एक प्रश्न हमारा यह कि यह सब जानते समझते क्या सिविल सोसायटीज के लोगों ने हथियार डाल दिए हैं। और जब तक यह सत्ता काबिज है तब तक समझिए सिविल सोसायटीज का युग समाप्त है ! क्या संघर्ष का माद्दा बस यहीं तक था या है ? निराशाजनक स्थिति ही कहिए फिर तो !! बहरहाल, यह कार्यक्रम जरूर देखिए। एक राजनीतिक विश्लेषक के रूप में अभय जी का महत्व चारों तरफ है और वे कई जगहों पर आते रहते हैं लेकिन मैं केवल उन्हें ‘सत्य हिंदी’ या लाउड इंडिया टीवी पर ही देखता हूं। संतोष जी से एक निवेदन कि अभय दुबे शो अभय जी का कार्यक्रम नहीं, यह लाउड इंडिया टीवी का कार्यक्रम है । वे कहते हैं अभय जी के कार्यक्रम में उन्हीं से अनुमति। यह शायद मेरे विचार में गलत है। वह केवल कार्यक्रम का नाम है जो लाउड इंडिया टीवी ने रखा है।
साम्प्रदायिकता पर क्या सोचता है सिनेमा इस विषय पर इस बार ‘सिनेमा संवाद’ में चर्चा रखी गयी। कमलेश पांडे की सोच को क्यों न साम्प्रदायिक मान लिया जाए। दरअसल मोदी पूर्व भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता दबी छिपी थी लेकिन मोदी के आने के बाद वह मुखर हुई और इस कदर हुई कि आज हर जगह त्राहि त्राहि मची हुई है। समाज का बहुत फूहड़ और गहरे तौर पर विभाजन कर दिया गया। कमलेश पांडे फिल्मी जगत में बेशक बड़े नाम हैं और कई बड़ी फिल्मों की कहानियां उनकी कलम से निकली हों लेकिन 2014 के बाद हर व्यक्ति की नजर में समाज को लेकर जो बदलाव हुआ उससे तो वे भी बच नहीं पाए । पहले सिनेमा में अंधविश्वास वाली चर्चा में हमने उन्हें देखा और अब इस चर्चा में जहां वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि कश्मीर फाइल्स और केरला स्टोरी किसी प्रोपेगंडा के तहत नहीं बनाई गयीं। उन्होंने सारा दोष मीडिया पर डाल दिया। इस पर जवरीमल पारेख का ग़ुस्सा पहली लाइन में ही झलक गया जो हमारी नजर में बहुत वाजिब था। प्रकाश हिंदुस्तानी ने स्पष्ट रूप से डिमार्केशन लाइन खींची 2014 से पहले और बाद की फिल्में। और मुझे लगता है चर्चा का उद्देश्य भी यही था। अजय ब्रह्मात्मज तो हमेशा अपने स्पष्ट विचारों से प्रभावित करते ही हैं। कुल मिलाकर चर्चा दिलचस्प रही । अमिताभ को शुरुआत में या भूमिका में सिनेमा के महत्व को समझाना मेरे विचार में अब बंद कर देना चाहिए। छोटा सा सुझाव है इसलिए कि श्रोता पक भी जाता है एक ही बात हर बार सुनते हुए। हर समझदार व्यक्ति को मालूम है कि अब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं रहा। खैर ।
इधर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की भारतीय प्रधानमंत्रियों पर एक रोचक किताब मार्केट में आयी है। उसमें सोनिया गांधी के द्वारा प्रधानमंत्री पद ठुकराए जाने का प्रसंग है। जिसमें राहुल गांधी के कड़े प्रतिरोध और धमकी के चलते सोनिया को यह कदम उठाना पड़ा। जहां तक मुझे याद पड़ रहा है यह प्रसंग सबसे पहले संतोष भारतीय ने अपनी पुस्तक ‘वीपी सिंह चंद्रशेखर सोनिया गांधी और मैं’ में प्रकाशित किया था। जाहिर है दोनों के स्रोत एक ही रहे होंगे। लेकिन हैरानी यह है कि संतोष जी की पुस्तक हर किसी ने पढ़ी है फिर भी किसी को यह खयाल नहीं आया। नीरजा चौधरी की पुस्तक पर आशुतोष और आलोक जोशी ने उनसे अच्छी और दिलचस्प बातचीत की है। उन्होंने भी नहीं कहा कि यह प्रसंग संतोष भारतीय की पुस्तक में भी है। और वह पुस्तक काफी पहले आ चुकी है और आशुतोष व आलोक जोशी दोनों उनसे इस पर अपने कार्यक्रम में चर्चा भी कर चुके हैं।
इधर वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने सत्य हिंदी पर अपना एक नया शो शुरु किया है। ‘विजय व्यू’ नाम से। कार्यक्रम का नाम आकर्षित नहीं करता। वैसे भी अपने नामों से शो करना एक प्रथा सी बन गई है। जो शायद ठीक नहीं। आरफा की बात और अपूर्वानंद की मास्टर क्लास अब कहीं दिखाई नहीं देता। विजय जी बदलें तो अच्छा। एक और सुझाव। विजय भाई यदि अपने इस कार्यक्रम को दिग्गज लोगों से बातचीत का अनोखा कार्यक्रम बनाएं तो बहुत अच्छा रहेगा। देश भर में बड़े और दिग्गज नेता और बुद्धिजीवी बिखरे हुए हैं। अगर ऐसा हुआ तो उनका कार्यक्रम एक भूख पैदा करेगा।
कल एक डिजिटल चैनल के ही पत्रकार ने कहा कि आप सत्य हिंदी को नियमित रूप से देखते रहे हैं और आज भी नजर रख रहे हैं तो एक बार सत्य हिंदी के सारे कार्यक्रमों पर बेबाक टिप्पणी कर दीजिए। सब पर । मैंने कहा, यों तो अक्सर करता रहता हूं पर होता यह है कि जब तक आप किसी की तारीफ कर रहे हैं तब तक तो ठीक है जहां आपने उसकी खिंचाई की या वाजिब आलोचना की वहीं वह नाराज़ हो बैठता है। फिर भी एक बार तो समस्त कार्यक्रमों पर खुल कर बात हो ही सकती है। क्योंकि सत्य हिंदी में विविध प्रकार के कार्यक्रम हैं और यह अच्छी बात है। की जानी चाहिए।

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