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क्या भाजपा भारत का धार्मिक आधार पर एक और विभाजन करना चाहती है? | Pavitra India

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“सवाल आस्था का है कानून का नहीं”—यह जुमला सबसे पहले 1985-86 के शाहबानो तलाक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद, कट्टरपंथी मुस्लिम समुदाय की ओर से शुरू हुए आंदोलन से निकला था। और इसी की नकल करते हुए, रामजन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के माध्यम से की थी। और उनके सहयोगियों में आगे बढ़कर वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसी मुद्दे को लपककर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसी के बल पर गोधरा कांड और उसकी प्रतिक्रिया में गुजरात का दंगा हुआ। और उसी दंगे से वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह पक्की करने के लिए ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और ’56 इंची छाती’ जैसी भड़कीली पुरुष प्रधान मानसिकता का परिचय दिया। वे अपनी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दिन-ब-दिन बढ़ाते हुए, तीन बार प्रधानमंत्री रहने में सफल हुए हैं।

और इन बारह वर्षों के निरंतर सत्ताकाल में उनके ध्यान में आया है कि हम बहुत ही कम मार्जिन से विजयी हो रहे हैं। इसीलिए उन्होंने 2023 के शीतकालीन संसद सत्र के दौरान लगभग सभी विपक्षी दलों के सांसदों को (100 से अधिक) संसद के अध्यक्ष की मदद से संसद से बाहर निकालने के बाद, 20 नए विधेयक बिना किसी चर्चा के मंजूर करवा लिए। जिनमें कृषि से संबंधित विधेयक—जिसमें लाखों हेक्टेयर किसानों की उपजाऊ जमीन कॉर्पोरेट क्षेत्र को सौंपने से लेकर, सौ वर्षों से भी अधिक समय के मजदूरों के आंदोलन से मिले श्रम अधिकारों में कटौती करने तक की बातें शामिल थीं। सबसे महत्वपूर्ण विधेयक चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में बदलाव करना था; उस चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर सत्ताधारी दल के प्रधानमंत्री के अलावा एक और मंत्री को शामिल करके उस समिति में सत्ताधारी दल का बहुमत कर दिया गया। और उस बहुमत से चुने गए चुनाव आयोग के सदस्यों ने यदि कुछ भी गलत काम किया, तो भी उन्हें आजीवन सभी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान करने जैसा बदलाव करने के पीछे क्या कारण है? इसे समझने में सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने क्यों चूक की? इस साजिश को उसी समय समझकर उसी समय से चुनाव आयोग का बहिष्कार करना चाहिए था। परंतु पता नहीं हमारे देश के सभी विपक्षी दलों की क्या मजबूरी थी? पिछले तीन वर्षों से लगातार चुनावों में भाग लेने के कारण ही ऐसे अविश्वसनीय चुनाव आयोग को अनजाने में मान्यता दी जा रही है। इससे चुनाव आयोग की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि करोड़ों मतदाताओं को मतदान से वंचित करने का काम करते हुए, सेना की मदद लेकर अपनी मर्जी से सरकारें बनाने का काम उसने पश्चिम बंगाल से शुरू कर दिया है। और जानबूझकर दक्षिण भारत को अपवाद मानकर फिलहाल वहाँ हाथ लगाने की हिम्मत वह नहीं कर रहा है। क्योंकि केवल उत्तर भारत का ही आंकड़ा मैनेज करने से जब भाजपा को सत्ताधारी दल बनाया जा सकता है, तो इसीलिए दक्षिण भारत से फिलहाल छेड़छाड़ नहीं की जा रही है। परंतु जब उत्तर भारत में यह मैनेजमेंट सेटल हो जाएगा, तो आने वाले समय में दक्षिण भारत को भी इस लपेटे में जरूर लिया जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

और सबसे गंभीर बात यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को हमारे देश के संसदीय क्षेत्र से बाहर करने का काम करके देश को एक और विभाजन की ओर ले जाने का काम किया जा रहा है। क्योंकि कोई भी समाज लंबे समय तक अलगाव (आइसोलेशन) की स्थिति में नहीं रह सकता। और इसी बहुसंख्यकवाद का डर दिखाकर ही 1940 में मुस्लिम लीग ने 23 मार्च को लाहौर में ‘हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते’ यह तर्क देते हुए आजादी के साथ ही देश का विभाजन केवल धर्म के आधार पर करवाया था। इस इतिहास को केवल 80 वर्ष ही हो रहे हैं। और उससे पहले ही भारत में रहने वाले सभी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को यदि इसी तरह हमारे देश की संसदीय प्रणाली से लेकर उनकी धार्मिक बातों में हस्तक्षेप करते हुए, उनके ड्रेस कोड से, खाने के मेन्यू से, उनके प्रार्थना स्थलों को कब्जे में लेकर उनकी भावनाओं को कदम-कदम पर ठेस पहुँचाने का काम रोज-बरोज किया जा रहा है। और भाजपा के मुख्यमंत्रियों में एक तरह की होड़ लगी है कि मुस्लिमों को सबसे ज्यादा परेशान कौन करेगा? इस अमानवीय प्रतिस्पर्धा में एक से बढ़कर एक घटिया फतवे (आदेश) प्रत्येक भाजपा की राज्य सरकार की ओर से दिए जा रहे हैं।

अभी एक महीना भी नहीं हुआ है, पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार ने ओबीसी कोटे से मुस्लिम ओबीसी समुदाय के लोगों को हटाने से लेकर, ममता बनर्जी की सरकार ने मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए जो योजनाएं शुरू की थीं उन्हें बदलने तक का काम किया। ईद के त्योहार में जानवरों की कुर्बानी देने के लिए सर्टिफिकेट लेने का फतवा जारी होने के बाद मुस्लिम समुदाय ने इस ईद में किसी भी गाय की कुर्बानी न देने की खुद ही घोषणा की कि, “हम खुद गाय की कुर्बानी नहीं देंगे।” इस पर गरीब हिंदू किसानों ने मुस्लिम समुदाय से विनती करते हुए कहा कि, “हम तो ईद के लिए ही अपने घर के मवेशियों का पालन-पोषण कर रहे थे, अब आप नहीं लेंगे तो हमें इनका खर्च उठाने की और परेशानी झेलनी पड़ेगी।” अधिकांश गोहत्या बंदी वाले तो केवल मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ इस मुद्दे को तूल देते रहते हैं, परंतु उन्हें गाय के अर्थशास्त्र (काउ इकोनॉमी) की कुछ भी जानकारी नहीं है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर डी. एन. झा से लेकर डॉ. वि. म. दांडेकर की इस विषय पर ‘COW ECONOMY’ शीर्षक वाली दोनों ब्राह्मण अर्थशास्त्रियों की किताबों में यह स्पष्ट है कि गाय पालने के लिए किसी भी परिवार को अपने घर के अन्य सदस्यों को पालने जैसा ही कैसा खर्च करना पड़ता है; और वही गाय इसके बदले में कोई उत्पादक योगदान नहीं देती है, जिससे उस परिवार का कितना नुकसान होता है, यह किसानों का अर्थशास्त्र तथाकथित गोभक्त नहीं जानते हैं। वे केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए जो भी मुद्दा काम में आता है, उसे लपककर उठाते हुए उसके इर्द-गिर्द अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का काम कर रहे हैं। और आजादी के बाद पहली बार भारत में ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण वर्तमान समय में आज तीसरी बार भाजपा सत्ताधारी दल बनने में सफल हुई है। परंतु किस कीमत पर? देश को एक और विभाजन के कगार पर ले जाकर? क्योंकि कुछ भी किया जाए, 20 करोड़ की मुस्लिम आबादी को रोज इस तरह से हाशिए पर रखते रहने से कौन सा समाज इसे लंबे समय तक बर्दाश्त करेगा और क्यों करना चाहिए? क्योंकि यह देश किसी एक समाज का नहीं है, इसमें रहने वाले सभी जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों का है—जितना यह हिंदुओं का है।

पहले नारा दिया गया था कि ‘अयोध्या तो सिर्फ झांकी है, काशी मथुरा बाकी है।’ इस तरह के और भी जुमले इस काल में सामने आए हैं। जैसे कि इस देश में दूसरी कोई समस्या बची ही नहीं है। केवल और केवल मंदिर-मस्जिद के इर्द-गिर्द संपूर्ण राजनीति को लाकर खड़ा करने का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रयास आज सफल होता हुआ दिख रहा है।

यद्यपि 1974 के पहले यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महात्मा गांधी जी की हत्या के बाद मुंह छिपाकर घूम रहा था, परंतु सबसे पहले गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन 1972-73 (मोरवी के सरदार पटेल इंजीनियरिंग कॉलेज के मेस की एक रुपये वाली थाली की कीमत सवा रुपये होने के कारण मोरवी के कॉलेज के छात्रों के इस आंदोलन ने पूरे गुजरात में महंगाई के खिलाफ उग्र रूप धारण कर लिया था) जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सरकार को गिरा दिया गया था। और पहली बार बाबूभाई पटेल के नेतृत्व में ‘जनता सरकार’ स्थापित हुई थी। उसके तीन वर्ष बाद 1977 में जनता पार्टी का जन्म हुआ है।

इसके बाद बिहार में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व करने के लिए सत्तर वर्ष पार कर चुके जयप्रकाश नारायण को छात्रों ने आग्रह करके विवश किया था। और उसके बाद 25 जून 1975 की रात में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा और जयप्रकाश से लेकर लाखों राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार करने का इतिहास, इस जून में 51 वर्ष पूरे कर रहा है।

परंतु 1977 की उन्नीस महीनों की जनता पार्टी की सरकार और उसके पतन के बाद चरण सिंह, चंद्रशेखर, वी. पी. सिंह, देवगौड़ा, आई. के. गुजराल और तेरह दिनों की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार और बाद में छह वर्ष उनकी ही सरकार। और इस संपूर्ण राजनीतिक उलटफेर के दौर में 1977 से 2026 तक 49 वर्षों में हिंदुत्ववादियों की ओर से चलाई जाने वाली “सवाल आस्था का है कानून का नहीं” इस घोषणा के इर्द-गिर्द चलाए जाने वाले द्वेषपूर्ण प्रचार-प्रसार के कारण आज बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद—जिसे पहले श्रृंगार देवी की पूजा के नाम पर पूरी मस्जिद का विवाद बनाकर पिछले कई दिनों से देश के सभी महत्वपूर्ण मुद्दों की जगह (महंगाई आसमान छू रही है) केवल ज्ञानवापी मस्जिद, संभल के संदर्भ में और अब मध्य प्रदेश के धार की भोजशाला के मुद्दे पर रखा गया है। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि जब 1947 के पहले के किसी भी धार्मिक स्थलों के विवाद पर अदालतें विचार नहीं करेंगी (इंटरटेन नहीं करेंगी) यह कानून होने के बावजूद, धार की भोजशाला के मुद्दे पर मध्य प्रदेश की अदालत ने ऐसा निर्णय कैसे दिया? और हमारे समाचार पत्रों में, टीवी चैनलों पर और सोशल मीडिया में संपूर्ण सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जुनून छाया हुआ है।

यद्यपि वर्तमान सरकार “सबका साथ सबका विकास” के नारों और महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे विषयों पर ही 2013 के चुनाव प्रचार में वर्तमान प्रधानमंत्री, जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, लगभग पांच सौ सभाओं में बोलते हुए दिखे थे कि—”सिर्फ मुझे एक मौका दीजिए। और मैं देश के भ्रष्टाचार का विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाने से लेकर, वह पैसा देश के प्रत्येक नागरिक के बैंक खाते में पंद्रह लाख रुपये जमा करने का झांसा देने से लेकर, देश के भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी की समस्या दूर करने के लिए मुझे एक मौका दीजिए, मैं हर साल दो करोड़ नौकरियां दूंगा।” इस बात को बोले आज 12 वर्ष हो गए हैं। परंतु बारह वर्षों में 24 करोड़ नौकरियां सचमुच ही दे दी होतीं, तो कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इन बारह वर्षों में कुल मिलाकर दो करोड़ भी रोजगार नहीं दे सके, इसीलिए आज हमारे देश के युवाओं में आक्रोश है।

अन्ना हजारे के तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और जनलोकपाल बिल लाने के लिए चलाए गए आंदोलन के कारण ही भारत के चतुर उद्योगपतियों ने भारतीय जनता पार्टी के पीछे अपना पैसा—जैसे किसी उद्योग में लगाते हैं—वैसे ही 2013 के चुनाव प्रचार में दो सौ से अधिक टेलीविजन चैनल खरीदने से लेकर अपने प्राइवेट जेट विमान नरेंद्र मोदी और बीजेपी को उपलब्ध कराने का काम किया है। और 2014 के मई महीने में सत्ता परिवर्तन हुआ। परंतु चुनाव में दिया गया एक भी आश्वासन पूरा करना तो दूर, उल्टे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा कि, “चुनाव प्रचार में बहुत कुछ बोलना पड़ता है, उसे भूल जाइए।”

आर्थिक स्तर पर तथाकथित सुधारों के नाम पर मुनाफा कमाने वाले सभी सरकारी उद्योग उन्हीं प्राइवेट मास्टर्स (उद्योगपतियों) को—जिन्होंने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए पैसा और संसाधन उपलब्ध कराने का काम किया है—उन्हें ही सौंपने से लेकर, जिस देश की आधी से अधिक आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है, उसे भी प्राइवेट मास्टर्स के हवाले करने के प्रयासों का किसानों ने साल भर से अधिक समय तक आंदोलन करके कड़ा विरोध किया। उसके बाद सरकार ने तात्कालिक परिस्थिति को देखते हुए ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार करो और देखो) का निर्णय लिया है।

और संपूर्ण 2019 का चुनाव पुलवामा के 40 सैनिकों की शहादत को अपनी पार्टी को जिताने के लिए संपूर्ण चुनाव में बीजेपी के अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री और सभी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने चुनाव प्रचार किया है। केवल और केवल धार्मिक ध्रुवीकरण के अलावा अन्य किसी भी मुद्दे पर चर्चा किए बिना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक शाखा बीजेपी ने संपूर्ण चुनाव प्रचार किया। परंतु न हमारे चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई की, न सर्वोच्च न्यायालय ने; सभी मूकदर्शक बने रहे। क्योंकि आपातकाल की आलोचना करने वाले संघ ने इस देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को समाप्त करने में और ज्यादा से ज्यादा अपने कारिंदे उसमें घुसाकर उन्हें लाचार बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह पिछले 12 वर्षों से अघोषित आपातकाल ही चल रहा है।

नोटबंदी, कोरोना तथा आर्थिक, औद्योगिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य, कृषि, बेरोजगारी और सामाजिक स्तर पर देश के इतिहास में पहली बार खुद सत्ताधारी दल ने ध्रुवीकरण की राजनीति करके तीसरी बार सत्ता में आने का एकमात्र कारण यह है कि, सही मायने में गंगा-जमुनी संस्कृति वाले देश को हिंदू-मुसलमानों में बांटकर संघ और उसकी राजनीतिक शाखा बीजेपी ने सत्ता में वापसी की है। स्वतंत्रता के आंदोलन में शामिल न रहने वाले लोगों द्वारा भारत की स्वतंत्रता का पचहत्तरवां उत्सव मनाया जाना, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित हुए सर्वसमावेशी मूल्यों का अपमान है। गंगा-जमुनी संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने के कृत्य के भीतर ही मंदिर-मशीद की राजनीति आती है।

और देश महंगाई की मार झेल रहा है और चर्चा चल रही है मस्जिद की जगह मंदिर बनाने की। और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि, खुद को नंबर वन चैनल बताने वाले कुछ चैनलों के एंकर पत्रकारों के धर्म ‘तटस्थता’ को तिलांजलि देकर किसी भी विषय पर आयोजित चर्चा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक की तरह अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधि से जवाब तलब करते हैं। वास्तव में संघ के प्रतिनिधि को भेजने की आवश्यकता ही नहीं है, परंतु संघ का प्रतिनिधि और एंकर मिलकर संपूर्ण चर्चा का रुख मंदिर के पक्ष में करने का कृत्य देखकर ऐसा लगता है कि, अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों को सीधे तौर पर इसका बहिष्कार करना चाहिए।

इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने का काम शुरू किया गया है। भारत में आर्यों के आने से लेकर, इसी देश में दो महान धर्म ढाई-तीन हजार वर्ष पहले जन्मे बौद्ध और जैन धर्म का पतन और उसके अवशेषों पर खड़े भारत के कोने-कोने के हजारों मंदिर विवाद के घेरे में आ सकते हैं। क्योंकि विषय आस्था का है, तो इस देश में सभी आक्रमणकारियों ने स्थानीय लोगों की आस्था के केंद्र नष्ट करने से लेकर उनकी स्त्रियों पर अत्याचार करना, यह लगभग सभी युद्धों में होता आया है।

तथाकथित मानव संस्कृति की (मुझे संस्कृति कहने में संकोच हो रहा है) संपूर्ण विश्व की यात्रा का आकलन करने जाएं, तो वर्तमान समय में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे तथाकथित विकसित देश पंद्रहवीं शताब्दी के पहले किन लोगों को समाप्त करने के बाद बने हैं? अकेले कोलंबस ने शुरुआत में ही दो करोड़ स्थानीय रेड इंडियन लोगों को मारकर वर्तमान समय के अमेरिका को बनाने की शुरुआत की थी। और कम-अधिक मात्रा में दुनिया के बहुत सारे देशों का निर्माण स्थानीय लोगों को समाप्त करके या वर्तमान समय में पहाड़ों, जंगलों में छिपे हुए—चाहे वे रेड इंडियन हों या भारत के विभिन्न आदिवासी समुदाय हों या संपूर्ण अफ्रीका महाद्वीप हो—दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिसने स्थानीय लोगों को मारकर या भगाकर अपने देश की स्थापना न की हो।

और यही स्थिति संपूर्ण विश्व में शुरू हो गई तो पूरी पृथ्वी पर उथल-पुथल हो जाएगी। भारत जैसे दुनिया के सबसे पुराने देश में इतिहास को सुधारने का सिलसिला शुरू किया गया, तो फिर उसका कोई अंत नहीं है। क्योंकि कोई कितना भी कहे कि ध्रुव प्रदेश पहले वर्तमान समय का भारत ही है, परंतु वैज्ञानिक शोधों में आर्य भारत में उत्तर दिशा से आए हैं। और मोहनजोदड़ो-हड़प्पा के उत्खनन के बाद द्रविड़ संस्कृति के विकास के अवशेषों की गवाही पर्याप्त है। वही बात वर्तमान अयोध्या कभी साकेत थी, और बनारस से लेकर मथुरा-वृंदावन के नीचे बौद्धों और जैनों के पुराने अवशेष दबे-छिपे हैं। शायद ही भारत का कोई कोना बाकी होगा जहां बौद्ध-जैन जैसे भारत में ही जन्मे धर्मों के विहार, स्तूप और धार्मिक स्थल नहीं थे, और उसी जगह पर मंदिरों का निर्माण हुआ है।

वर्तमान नए आंध्र प्रदेश के लिए नई राजधानी का निर्माण अमरावती नामक स्थान पर चल रहा है, और वहाँ चल रहे उत्खनन में बौद्ध धर्म और जैनों के पुराने अवशेष मिल रहे हैं।

यही विवाद पिछले आठ हजार वर्षों से यरुशलम नामक स्थान को लेकर चल रहा है। जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म केवल दो हजार वर्ष बाद निर्मित हुए और विवादों का सिलसिला आठ हजार वर्ष पुराना है।

और उसी विश्वविद्यालय के 51 वर्षीय प्रोफेसर युवाल नोआ हरारी इतिहास के शिक्षक हैं। और अपनी ‘Sapiens’ और ‘Homo Deus’ जैसी किताबों के लेखक का जन्म उसी भूमि पर हुआ है, जहाँ ईश्वर के चुने हुए लोगों की मान्यता है। और 51 वर्ष के नोआ हरारी उन सभी मान्यताओं को खारिज करते हुए, हम सभी मनुष्य जीव कैसे एक ही मां की संतान हैं, यह दिखाते हैं। तब हिंदू, मुस्लिम, यहूदी, ईसाई, बौद्ध, जैन या जाति, रंग और स्त्री-पुरुष के ये सभी भेद अर्थहीन हो जाते हैं।

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