
वॉशिंगटन: अमेरिका की एक संघीय अदालत ने H-1B वीजा धारकों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त H-1B वीजा शुल्क को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति प्रशासन को कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का कर (Tax) लगाने का अधिकार नहीं है।
मैसाचुसेट्स के बोस्टन स्थित अमेरिकी जिला न्यायालय के जज लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में कहा कि यह शुल्क वास्तव में एक कर के समान है और इसे लागू करने के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति आवश्यक थी। अदालत ने माना कि प्रशासन ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर यह फैसला लिया था।
यह शुल्क पिछले वर्ष ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किया गया था। सरकार का तर्क था कि इससे अमेरिकी नौकरियों की रक्षा होगी और कंपनियां सस्ते विदेशी श्रमिकों की बजाय स्थानीय कर्मचारियों को प्राथमिकता देंगी। हालांकि कई राज्यों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और उद्योग संगठनों ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे डॉक्टरों, शिक्षकों और तकनीकी विशेषज्ञों की भर्ती प्रभावित हो रही है।
इस बीच, अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार H-1B वीजा पंजीकरण में इस वर्ष 38.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2026 में जहां 3.43 लाख से अधिक आवेदन आए थे, वहीं 2027 के लिए यह संख्या घटकर करीब 2.11 लाख रह गई। प्रशासन ने इसका श्रेय कड़े नियमों और उच्च वेतन वाले आवेदकों को प्राथमिकता देने वाली नई नीति को दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले से भारतीय आईटी पेशेवरों, अमेरिकी कंपनियों और उच्च शिक्षण संस्थानों को राहत मिलेगी। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वह इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है।
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