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कर्ज में भेदभाव | Pavitra India

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मुसलमानों को ऋण देने से परहेज करते हैं बैंक और एनबीएफसी!

इंट्रो- तहलका की इस बार की पड़ताल में शिकायतों और स्टिंग से पता चला है कि देश के बहुत से बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के द्वारा मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों को कर्ज (ऋण) देने से इनकार किया जाता है, खासकर मस्जिद के आसपास। इसके साथ ही ऋण लेने वाले मुसलमानों से बलपूर्वक ऋण की वसूली भी की जाती है। तहलका की इस पड़ताल से पता चलता है कि किस प्रकार बैंक और एनबीएफसी ऋण उपलब्ध कराने में मुस्लिम बहुल इलाकों के साथ भेदभाव करते हैं, जिससे पक्षपात, भ्रष्टाचार और जबरन वसूली की घटनाओं का खुलासा होता है। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-
9 मार्च, 2005 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन करने के लिए अधिसूचना जारी की। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने 17 नवंबर, 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री को अपनी पहली रिपोर्ट सौंपी। सरकार ने 30 नवंबर को न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर समिति की रिपोर्ट संसद में पेश की।
अपनी अनेक सिफारिशों में सच्चर समिति ने पाया कि कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को बैंकों द्वारा नकारात्मक या रेड जोन के रूप में चिह्नित किया गया था, जहां उन्हें पुनर्भुगतान में चूक का उच्च जोखिम महसूस हुआ, जिसके चलते वे मुसलमानों को ऋण देना नहीं चाहते थे। चिंता की बात यह है कि रिपोर्ट पेश होने के 19 साल बाद इस प्रथा में बदलाव आने की जगह यह भेदभाव और बढ़ा है। आज भी बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले मुसलमानों को ऋण देने से हिचकिचाती हैं।


वास्तव में कई लोगों का मानना है कि 2014 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से देश की स्थिति बदल गई है। सरकार के कई अन्य अंगों की तरह वित्तीय संस्थाएं भी मुस्लिम मुद्दों के प्रति उदासीन दिखाई देती हैं और अक्सर अब और मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं की हिंदुत्ववादी नीति पर चलती हैं। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार, वर्तमान मोदी सरकार के तहत मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों के लिए ऋण तक पहुंच में यूपीए के वर्षों की तुलना में कोई वास्तविक अंतर नहीं आया है, जब सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। सच्चाई का पता लगाने के लिए तहलका ने बैंकों, एनबीएफसी और डायरेक्ट सेलिंग एजेंटों (डीएसए) में जाकर पड़ताल की, जो इन संस्थानों और ग्राहकों के बीच मध्यस्थ के रूप में काम करते हैं।

‘मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद शाहीन बाग, ओखला विहार, जाफराबाद, मुस्तफाबाद और दिल्ली के अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले मुसलमानों के लिए बैंकों और एनबीएफसी की इनकार दर 100 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इससे पहले पिछली सरकार के कार्यकाल में यह इनकार दर 25 प्रतिशत थी। उन्हीं बैंकों और एनबीएफसी को दिल्ली के हिंदू बहुल इलाकों में हिंदुओं को ऋण देने में कोई समस्या नहीं है।’ -एक शीर्ष वित्तीय परामर्श कंपनी (डीएसए) के प्रबंधक शाहरुख मलिक ने तहलका के अंडरकवर रिपोर्टर को बताया।
‘यदि कोई व्यक्ति मस्जिद और मंदिर के सामने मकान खरीदना चाहता है, तो बैंक और एनबीएफसी मस्जिद के पास वाले मकान को ऋण नहीं देंगे। लेकिन वे मंदिर के पास वाले मकान को ऋण दे देंगे; चाहे मकान पंजीकृत संपत्ति हो या नहीं। यदि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र में है, तो कोई ऋण नहीं दिया जाएगा। वजह बताई गई है ईएमआई। अगर कोई मुसलमान ईएमआई नहीं चुका पाता और बैंक की वसूली टीम वसूली के लिए जाती है, तो हो सकता है कि टीम को मुस्लिम बहुल इलाके से भगा दिया जाए।’ -शाहरुख ने बताया।


‘यदि आप जीएसटी का भुगतान नहीं कर रहे हैं; लेकिन अपना रिटर्न दाखिल कर रहे हैं, तो भी मैं आपके लिए ऋण राशि स्वीकृत करवा सकता हूं। जीएसटी फाइल मत करो, बस मुझे दो साल का आईटीआर दे दो। मैं आपके लिए बैंक या एनबीएफसी से 1.5-2 करोड़ रुपए के बीच ऋण की व्यवस्था करा दूंगा।’ -शाहरुख ने तहलका रिपोर्टर से आगे कहा।
‘मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ऋण प्राप्त करना कठिन है, क्योंकि यदि आवेदक ईएमआई का भुगतान करने में विफल रहता है, तो वसूली कठिन हो जाती है। लोग एकजुट होकर रिकवरी टीम से लड़ते हैं। उन्हें इस बात का डर नहीं है कि समाज क्या कहेगा। दूसरी ओर हिंदू बहुल क्षेत्रों में ऋण आसानी से उपलब्ध हो जाता है, क्योंकि हिंदू समुदाय का कोई व्यक्ति यदि ऋण नहीं चुकाता है, तो उससे वसूली आसान होती है।’ -एक शीर्ष एनबीएफसी के प्रत्यक्ष बिक्री प्रबंधक अनुज पांडे ने कहा।


‘बैंक मुस्लिम ग्राहकों को सीधे तौर पर यह नहीं बताएंगे कि वे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ऋण नहीं देते हैं। इसके बजाय वे तकनीकी या कानूनी मुद्दों जैसे बहाने बनाते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वे मुस्लिम बहुल इलाकों में ऋण देना ही नहीं चाहते।’ -अनुज ने तहलका रिपोर्टर के सामने खुलासा किया।
‘मस्जिद के ठीक सामने स्थित मकान पर कोई ऋण नहीं दिया जाएगा, क्योंकि यदि कल आवेदक उस मकान को मस्जिद को दे देता है, तो ऋण राशि की वसूली मुश्किल हो जाएगी। दूसरी ओर मंदिरों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। यही कारण है कि बैंक मंदिरों के सामने स्थित मकानों पर ऋण जारी करते हैं।’ -अनुज ने आगे बताया।
‘बैंकों द्वारा ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है कि वे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ऋण नहीं देंगे। लेकिन वे ऐसे क्षेत्रों को नकारात्मक घोषित करते हैं, क्योंकि उस क्षेत्र में ऋण चूक के कई मामले होते हैं, जहां वसूली कठिन होती है। बैंक और एनबीएफसी मंदिरों और गुरुद्वारों के पास की संपत्तियों को वित्तपोषित करेंगे, लेकिन मस्जिदों के पास नहीं।’ -आयुष चौहान ने तहलका रिपोर्टर को बताया।
‘मैंने अपना ऋण स्वीकृत करवाने के लिए डीएसए को रिश्वत दी, क्योंकि मैंने जो घर खरीदा था वह मस्जिद के बहुत नजदीक था। बैंक और एनबीएफसी मस्जिद के 500 मीटर के दायरे में स्थित संपत्तियों पर ऋण नहीं देते हैं। यही स्थिति मंदिरों और गुरुद्वारों के साथ भी है। मुसलमानों की तरह हिंदुओं को भी उनके बहुल क्षेत्रों में बैंक ऋण देने में आनाकानी करते हैं।’ -देश के एक शीर्ष निजी बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर लियाकत अली ने कहा।
तहलका रिपोर्टर ने शाहरुख मलिक से दिल्ली के राजेंद्र प्लेस स्थित उनके कार्यालय में मुलाकात की। शाहरुख दक्षिण भारत स्थित एक शीर्ष वित्तीय परामर्श फर्म में काम करते हैं, जिसके देश भर में कई कार्यालय हैं, जहां वे लोगों को सलाह देते हैं और उनके लिए बैंकों और एनबीएफसी से ऋण की व्यवस्था करते हैं। उन्होंने तहलका रिपोर्टर को, जो उनके पास घर का ऋण लेने के लिए एक काल्पनिक ग्राहक के रूप में गए थे; बताया कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ऋण प्राप्त करना असंभव है, क्योंकि यदि उधारकर्ता ऋण नहीं चुकाता है तो वसूली मुश्किल हो जाती है।


शाहरुख के अनुसार, उचित रजिस्ट्री वाली संपत्तियों को भी सिर्फ इसलिए ऋण देने से मना कर दिया जाता है, क्योंकि वे मुस्लिम बहुल इलाकों में स्थित हैं। शाहरुख ने दावा किया कि हिंदू बहुल क्षेत्रों में ऐसी कोई बाधा नहीं आती है और वहां ऋण बिना किसी कठिनाई के स्वीकृत हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बैंकों द्वारा ऋण देने से इनकार करने की दर पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान 25 प्रतिशत से बढ़कर मोदी सरकार के तहत 100 प्रतिशत हो गई है।

निम्नलिखित बातचीत में शाहरुख ने स्पष्ट रूप से बताया कि संपत्तियों की वैध रजिस्ट्री होने के बावजूद बैंक और एनबीएफसी दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों में ऋण देने से साफ इनकार कर देते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अतीत के विपरीत अब इस तरह के मामले पूरी तरह बढ़ गए हैं। इससे यह धारणा सामने आती है कि मुसलमानों को जोखिमपूर्ण ऋणधारक माना जाता है, भले ही उनमें से कई ऋण चुकाने में ईमानदार भी हैं, जबकि हिंदुओं को इस तरह के व्यापक भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है। टिप्पणी में अस्वीकृतियों की बढ़ती संख्या को सीधे तौर पर मोदी सरकार के कार्यकाल से जोड़ा गया है।

शाहरुख : टोटल मुस्लिम होते हैं ना जहां, वहां (लोन) देते ही नहीं। 

रिपोर्टर  : कोई बैंक नहीं देता, ,,,प्राइवेट, सरकारी, कोई नहीं?

शाहरुख : ओखला में तुम रजिस्ट्री चालू करवा दो, …देंगे ही नहीं।

रिपोर्टर : ओखला विहार में?

शाहरुख  : ओखला, शाहीन बाग, सीलमपुर… कहीं भी, …जाफराबाद, मुर्शिदाबाद…। 

रिपोर्टर  : चाहे रजिस्ट्री हो, तब भी नहीं?
शाहरुख  : हां।

रिपोर्टर  : वजह?

शाहरुख  : वजह यहां टोटल मुस्लिम हैं।

रिपोर्टर  : मुस्लिम क्या ईएमआई नहीं दे सकता?

शाहरुख  : देते हैं, ..बहुत लोग देते हैं।

रिपोर्टर  : उसमें क्या दिक्कत है?

शाहरुख  : मगर देंगे नहीं ना। अगर कभी ईएमआई नहीं दी और कोई पैसे लेने गया, तो उसको नष्ट कर दिया…।
रिपोर्टर  : ये हिंदू के इलाके में नहीं होता क्या? …हिंदू डोमिनेटेड?

शाहरुख  : न।

रिपोर्टर  :वहां कर देते हैं लोन?
शाहरुख  : हां।

रिपोर्टर  : इतना बुरा माहौल हो गया है? …ये अभी हुआ है, …मोदी (गवर्नमेंट) के आने के बाद?

शाहरुख : पहले 20-25 परसेंट था, ,,,अब 100 परसेंट हो गया है।

इस बातचीत में शाहरुख ने तहलका रिपोर्टर को मस्जिद के पास मकान न खरीदने की सलाह दी और कहा कि इससे ऋण मिलना मुश्किल हो जाएगा। शाहरुख ने यह भी कहा कि यदि घर मंदिर के पास हो, तो ऋण प्राप्त करना अधिक आसान होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बैंक और एनबीएफसी किस प्रकार संपत्तियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वे मस्जिद या मंदिर के पास स्थित हैं। उनका कहना है कि मंदिरों के पास तो आसानी से ऋण दे दिया जाता है, लेकिन मस्जिदों के पास ऋण देने से मना कर दिया जाता है।

रिपोर्टर  : अच्छा ये बताओ, मस्जिद के पास लोन नहीं है क्या? मस्जिद और मंदिर के पास?

शाहरुख : मंदिर के पास होगा, मस्जित के पास नहीं होगा।

रिपोर्टर : मंदिर के पास हो जाएगा?

शाहरुख : हां।

रिपोर्टर  : मस्जिद के पास नहीं, क्यूं?

शाहरुख  : मुस्लिम इश्यू।

रिपोर्टर  : ये पहले से था या अभी हुआ?

शाहरुख  : अब ज्यादा क्रेज हो गया है, मोदी (गवर्नमेंट) के बाद ज्यादा हो गया है।

इसके बाद शाहरुख ने रिपोर्टर को एक ग्राहक के बारे में बताया, जिसके लिए उन्होंने एक एनबीएफसी से ऋण की व्यवस्था करने में कामयाबी हासिल की, जबकि उस ऋण लेने वाले ने जो घर खरीदा था वह एक मस्जिद के बहुत करीब था। शाहरुख ने कहा कि बैंकों और एनबीएफसी के पास मुस्लिम बहुल इलाकों या मस्जिदों के पास रहने वाले मुसलमानों को वित्त पोषण करने के खिलाफ कोई लिखित नियम नहीं है। उन्होंने बताया कि मस्जिद के बहुत नजदीक स्थित संपत्तियों- कभी-कभी तो 50 मीटर के भीतर भी, को स्वतः ही अस्वीकार कर दिया जाता है, जबकि मंदिरों के निकट ऋण लेने पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होता।
शाहरुख  : रमेश पार्क में भी तो है इनका, बस एक छोटी सी बात है; …मस्जिद के पास कर लिया तो इससे बड़ी क्या चीज होगी। मस्जिद से कम से कम 200-300 मीटर दूर होना चाहिए घर और उसका 50 मीटर भी नहीं है।

रिपोर्टर  : पर आपने लोन करवा दिया?

शाहरुख  : हां।
रिपोर्टर  : तभी तो आपके पास भेजा है, …अच्छा ये बैंक का रिटिन (लिखित) रूल है या कोई रूल नहीं है?

शाहरुख  : नहीं, राइटिंग में नहीं है, मुंह जुबानी, ….मगर आप कुछ कर भी नहीं सकते। ये उनकी पॉलिसी है, ,,,दें या नहीं दें आपको। ओके, तो नहीं किया न उन्होंने, …वो तो कह देगा मैंने चेक किया था मिल ही नहीं रहा, पैसे देने चाहिए, नहीं दिए…।
रिपोर्टर  : और मंदिर के पास दे देंगे?

इस बातचीत में शाहरुख ने हमें आश्वासन दिया कि अगर हम जीएसटी का भुगतान नहीं भी कर रहे हैं, तो भी वह हमारे लिए ऋण की व्यवस्था कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि औपचारिक जीएसटी फाइलिंग के बिना भी ऋण की व्यवस्था कैसे की जा सकती है। उन्होंने बताया कि केवल दो साल के आईटीआर से 1.5-2 करोड़ रुपए का ऋण दिलाया जा सकता है।
रिपोर्टर  : मतलप, बिना जीएसटी के, बिना आईटीआर के आप करा दोगे?

शाहरुख  : हां।

रिपोर्टर  : बिना जीएसटी के कितना हो जाएगा अमाउंट?

शाहरुख  : आईटीआर दे देना दो साल की…।

रिपोर्टर : आपने अलग-अलग चीजें बताई हैं, बिना जीएसटी, बिना आईटीआर…?

शाहरुख : अगर आईटीआर है, तो जीएसटी नहीं चाहिए, …फिर तो आप ले लो 1.5-2 करोड़।

रिपोर्टर : बिना जीएसटी फाइल करे तो आप, ले लें 2 करोड़, …करवा दोगे? आईटीआर के साथ? ठीक है।

शाहरुख ने दिल्ली के एक अनधिकृत क्षेत्र में मकान खरीदने के लिए तहलका रिपोर्टर के लिए ऋण की व्यवस्था करने के लिए दो प्रतिशत कमीशन की मांग की। शाहरुख ने कहा कि ऐसे क्षेत्रों में कोई भी बैंक हमें ऋण नहीं देगा; वे (ऋणदाता) हमें (ऋण लेने के इच्छुक व्यक्ति को) कई बार बैंक के चक्कर लगाने को कहेंगे, लेकिन अंत में नहीं कह देंगे। शाहरुख के अनुसार, एक डीएसए के रूप में वह कहीं भी निश्चित कीमत पर ऋण की व्यवस्था कर सकते हैं।
शाहरुख के बाद तहलका रिपोर्टर ने उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक शीर्ष एनबीएफसी में डायरेक्ट सेल्स मैनेजर अनुज पांडे से मुलाकात की। अनुज के सामने भी रिपोर्टर ने ऋण लेने की इच्छा जाहिर की, जो कि एक फर्जी सौदा थी। रिपोर्टर ने अनुज से कहा कि हमें दिल्ली में घर खरीदने के लिए होम लोन की जरूरत है। अनुज ने रिपोर्टर को बताया कि कोई भी बैंक या एनबीएफसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में ऋण नहीं देगा, क्योंकि वहां वसूली मुश्किल है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ऋण नहीं चुका पाता है, तो प्रायः पूरा समुदाय उसके समर्थन में आ जाता है, बिना यह सोचे कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के मामले में ऐसा नहीं है, यही कारण है कि उन्हें ऋण आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
रिपोर्टर  : अच्छा, दूसरा ये बताइए, मुस्लिम एरिया में हो जाएगा लोन?

अनुज  : पूरा मुस्लिम एरिया नहीं चाहिए। थोड़ा हिंदू भी होना चाहिए।

रिपोर्टर  : जैसे जामा मस्जिद हो गया, जामिया, शाहीन बाग हो गया…?

अनुज  : बहुत मुश्किल है।

रिपोर्टर  : कोई नहीं करेगा? …एनबीएफसी?

अनुज  : एनबीएफसी में हैं बहुत, जो कर सकते हैं।

रिपोर्टर  : ऐसा क्यूं?
अनुज  : रिकवरी नहीं हो पाती। …चेक बाउंस हो जाता है, …वहां लड़ाई-झगड़ा का महौल ज्यादा हो जाता है।
रिपोर्टर  : अच्छा, हो चुका है पहले?

अनुज  : हां, अब मान लो जहां ज्यादा जनसंख्या में हैं, वहां रिकवरी वाले 4-5 जाएंगे ना! …हमनारे में क्या है, चलो देना है। थोड़ा समाज के डर से, इज्जत से, कुछ न कुछ दबाव पड़ जाता है। आदमी दे ही देता है पैसा। उनमें क्या है, लड़ाई-झगड़ा कर लेंगे।

रिपोर्टर  : उनको समाज का डर नहीं है?

अनुज  : टेंशन फ्री हैं।

रिपोर्टर  : अगर हिंदू डोमिनेटेड एरिया हो, उसमें हो जाएगा?

अनुज  : हां, हिंदू में तो कर देंगे हम, उसमें कोई दिक्कत नहीं है।

शाहरुख की तरह अनुज ने भी रिपोर्टर को बताया कि मस्जिद के पास बने घर के लिए कोई होम लोन नहीं मिलेगा, क्योंकि अगर भविष्य में वह घर मस्जिद को बेच दिया गया, तो बैंक के लिए अपना लोन वसूलना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मंदिर के पास स्थित मकानों के लिए गृह ऋण उपलब्ध है, लेकिन मस्जिद के पास स्थित मकानों के लिए नहीं। इसी प्रकार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को ऋण मिलने की संभावना कम है, जबकि हिंदू बहुल क्षेत्रों में ऐसी कोई समस्या नहीं है। अनुज के अनुसार, हिंदू बहुल क्षेत्रों में ऋण देना बैंक के लिए कोई मुद्दा नहीं है।

रिपोर्टर  : मैंने ये भी सुना है मंदिर के मस्जिद के पास लोन नहीं होता?

अनुज  : नहीं, मस्जिद के पास तो मैक्सिमम लोन नहीं होता, मंदिर के पास एक बार को हो जाता है। मस्जिद में दिक्कत थोड़ी ज्यादा आ जाती है। कल को मस्जिद बड़ा दिए, …आप लोन भरना बंद कर दोगे, तो हम कुछ कर भी नहीं सकते। कल को मस्जिद बड़ी कर रहे हो, कहेगा भाई ये दे दो अपना पैसा ले लो, ….आप पैसा लेकर अलग हो गए, उसने मस्जिद बड़ा कर दिया, …मस्जिद पहले छोटी थी, अब बड़ी हो गई, फिर क्या होगा? इसलिए हम लोग नहीं करते। मंदिर का क्या है, हम लोग जमीन दे दें तब भी पैसा देने वाला कोई नहीं है…।
रिपोर्टर  : मतलब, मंदिर के पास घर पर लोन कर दोगे, मस्जिद पर नहीं करोगे?

अनुज  : हां, नहीं करेंगे।

रिपोर्टर  : और मुस्लिम डोमिनेटेड में भी नहीं होगा, ..हिंदू में हो जाएगा?

अनुज  : हिंदू में हो जाएगा। …हिंदू जहां ज्यादा हैं, वहां दिक्कत नहीं है।

अनुज ने बताया कि बैंकों को मुसलमानों से कोई समस्या नहीं है; समस्या मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की है। यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में घर खरीदता है, तो उसे आसानी से ऋण मिल सकता है। लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बैंक सीधे तौर पर नहीं कहने के बजाय ऋण देने से बचने के लिए झूठी कानूनी या तकनीकी बाधाएं पैदा करते हैं।
अनुज  : मुस्लिम बहुमत में दिक्कत है, वहीं कस्टमर अगर शकरपुर में खरीद रहा है तो दे देंगे।

रिपोर्टर  : हां, तो पहले ही एक्सपीरिएंस खराब रहा होगा ना आपका?

अनुज  : हां, इसलिए पहले ही रिजेक्ट मार देते हैं, बोल देते हैं नहीं हो पाएगा। ..कुछ भी बता देंगे, …लीगल में दिक्कत है, टेक्निकल वजह से नहीं हो पाएगा…।

रिपोर्टर  : मतलब, बहाना लगा देंगे?

अनुज : हां, बहाना लगा देंगे।

अनुज के बाद तहलका रिपोर्टर ने नोएडा के डीएसए आयुष चौहान से मुलाकात की, जिनके सामने रिपोर्टर ने यही झूठा सौदा पेश किया कि हमें दिल्ली में होम लोन की जरूरत है। आयुष ने भी रिपोर्टर को यही बताया कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ऋण प्राप्त करना कठिन है, जबकि मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में ऋण आसानी से मिल जाता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बैंकों को अपना ऋण वसूलने में कठिनाई होती है और वे आमतौर पर बहुत कम राशि का ऋण देते हैं।
रिपोर्टर  : थोड़े बहुत में क्या-क्या, जैसे?

आयुष  : थोड़े बहुत डोमिनेटेड में, जैसे आपकी कम्युनिटी है, हमारी कम्युनिटी है, या किसी की भी कम्युनिटी है, उसमें क्या होता है 100 परसेंट होते हैं।

रिपोर्टर : मतलब हिंदू-मुस्लिम मिक्स होगा, उसमें हो जाएगा?

आयुष : मिक्स थोड़ा-बहुत।

रिपोर्टर  : टोटल मुस्लिम होगा, तो लोन नहीं होगा, ऐसा क्यूं?
आयुष  : होता है लोन, मगर कम होता है। थोड़ा बहुत अमाउंट पर हो जाता है, ज्यादा बड़े अमाउंट पर नहीं होता।

रिपोर्टर  : ऐसे क्यूं? रीजन, वजह?

आयुष : रीजन ये होता है कि रिकवरी नहीं हो पाती।

आयुष चौहान के अनुसार, ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है कि बैंक मुस्लिम बहुल इलाकों में ऋण नहीं देंगे। हालांकि उन्होंने भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को नकारात्मक के रूप में चिह्नित किया है, जिसका कारण उन्होंने ऋण चूक के कई मामले होना बताया, जहां वसूली मुश्किल है। आयुष ने कहा कि बैंक और एनबीएफसी मंदिरों और गुरुद्वारों के पास की संपत्तियों के लिए ऋण प्रदान करते हैं, लेकिन मस्जिदों के पास की संपत्तियों के लिए नहीं।
निम्नलिखित बातचीत में आयुष ने रिपोर्टर से दिल्ली के एक अनधिकृत क्षेत्र में घर के लिए ऋण स्वीकृत कराने के लिए दो प्रतिशत कमीशन की मांग की, जहां अधिकांश प्रमुख बैंक ऋण देने से इनकार करते हैं। उन्होंने बताया कि इसमें बैंक के प्रतिनिधि की भूमिका भी शामिल है, जो सभी औपचारिकताओं का प्रबंधन करता है। इस बातचीत से यह उजागर होता है कि ऋण प्रणाली में किस प्रकार अतिरिक्त लागतें शामिल की जाती हैं।
रिपोर्टर : मुझे कितना देना होगा आयुष भाई आपको?

आयुष  : मोटा-मोटा दो परसेंट का खर्चा है, यहां से बंदा वहां लाएगा सारी चीजें करेगा।
रिपोर्टर  : लोन वाला, बैंक का ही बंदा होगा?

आयुष  : हां।

रिपोर्टर  : मतलब, जो टोटल लोन होगा, जैसे 20 लाख, उसका दो परसेंट 40 के (हजार) हो गया?

आयुष  : हां।

एक एनबीएफसी प्रतिनिधि, एक वित्तीय सलाहकार और एक डीएसए से मिलने के बाद तहलका रिपोर्टर ने दिल्ली में भारत के शीर्ष निजी बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर लियाकत अली से मुलाकात की। लियाकत ने तहलका रिपोर्टर से बातचीत में कबूल किया कि उसने खुद एनबीएफसी के माध्यम से अपने घर के लिए ऋण स्वीकृत कराने के लिए एक डीएसए को रिश्वत के रूप में पांच प्रतिशत कमीशन दिया था। उनके अनुसार, उन्हें रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया, क्योंकि उन्होंने जो घर खरीदा था वह एक मस्जिद के नजदीक था और कोई भी बैंक या एनबीएफसी मस्जिद के इतने नजदीक स्थित संपत्तियों के लिए ऋण नहीं देता है।
रिपोर्टर  : मैंने तुमसे कहा था कोई जुगाड़ वाला बताओ?

लियाकत  : सर! वो दिया तो था, …बहुत बढ़िया है, मेरा उसने कराया था, मस्जिद की वजह से मुझे 5 परसेंट देना पड़ गया था। मेरा हो नहीं रथा था।

रिपोर्टर  : मस्जिद क्या?

लियाकत  : मस्जिद जस्ट सामने है मेरे, 500 मीटर में अगर मस्जिद होगा, तो एनबीएफसी लोन नहीं देगा।

रिपोर्टर  : कौन सा बैंक लोन नहीं देता?

लियाकत : एनबीएफसी बैंक तो वैसे ही नहीं करता।

रिपोर्टर  : क्यूं?

लियाकत  : कहते हैं रिकवरी में दिक्कत आती है।

रिपोर्टर  : मंदिर-मस्जिद पास में हो अगर, 500 मीटर पर?

लियाकत  : मंदिर-मस्जिद या वो क्या बोलते हैं, गुरुद्वारा जहां पर 90 परसेंट जैसे माइनॉरिटी होती है ना, हिंदू है ये,,, मुस्लिम है या सिख है, वहां लोन नहीं करते।
रिपोर्टर  : किस बैंक से करा दिया लोन?

लियाकत  : बैंक से नहीं सर! एनबीएफसी से हुआ था। XXXX हाउसिंग करके है एक।

रिपोर्टर  : कितना पैसा लिया इसने? 

लियाकत  : 5 परसेंट लिया था।

रिपोर्टर  : टोटल का?

लियाकत : 5 बोला था सर! लेकिन दिया मैंने चार।

इस बातचीत में रिपोर्टर ने यह सवाल उठाया कि क्या मुसलमानों को ऋण प्राप्त करने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है? और  मुसलमानों को उनके बहुल क्षेत्रों में ऋण क्यों नहीं मिल रहा है? तो लियाकत ने कहा कि मुसलमान बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। दिल्ली के कुछ मुस्लिम इलाकों में तो व्यक्तिगत ऋण मिलना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि बैंक मुस्लिमों की तुलना में हिंदू बहुल क्षेत्रों में हिंदुओं को अधिक आसानी से ऋण प्रदान करते हैं. हालांकि उन्होंने बताया कि कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं को ऋण प्राप्त करने में कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्टर  : अच्छा, मुस्लिम को लोन नहीं हो रहा?

लियाकत  : थोड़ा तो दिक्कत हो जाती है। 

रिपोर्टर  : मोदी सरकार में?

लियाकत  : नहीं, ऐसी बात नहीं है।

रिपोर्टर  : वो तो कह रहा था, …शाहरुख।

लियाकत  : सर! वो एनबीएफसी की बात कर रहा था, बैंक ये चीज नहीं सोचेगा, एनबीएफसी कर रहा है।

रिपोर्टर  : एनबीएफसी लोन नहीं दे रहा?

लियाकत  : हां, एनबीएफसी लोन नहीं दे रहा मुस्लिम को। …वो एनपीए ज्यादा करते हैं।

लियाकत (आगे…) : ये जाकिर नगर में लोन लेना ज्यादा मुश्किल हो जाता है।

रिपोर्टर :ऐसी तो बहुत सारी जगह हैं?

लियाकत : जामिया ओखला में पर्सनल लोन देना मुश्किल हो जाता है। …एनपीए हो जाता है।

रिपोर्टर  : और हिंदू एरिया में हो जाता है?

लियाकत  : हां, मिल जाता है। कुछ नेगेटिव एरिया हिंदू एरिया में भी नहीं मिलेगा। जैसे बुराड़ी।

रिपोर्टर  : वो ये कह रहा था पहले 25 परसेंट था, अब 75 परसेंट लोन नहीं मिलता, ऐसा क्यूं?

लियाकत  : सर! एनपीए ज्यादा करते हैं हम लोग।

जब लियाकत से पूछा गया कि वह कैसे दावा कर सकते हैं कि मुसलमान एनपीए के लिए जाने जाते हैं? तो लियाकत ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उनकी मुलाकात एक मुस्लिम व्यक्ति से हुई, जिसने ऋण लिया था। लियाकत ने बताया कि उस आदमी ने मेरे सामने कबूल किया कि उसने कर्ज नहीं चुकाया है और जब बैंक की रिकवरी टीम पैसे वसूलने आई, तो उसे इलाके से भगा दिया गया। जब उससे पूछा गया कि क्या ये टीमें बाहुबलियों का इस्तेमाल करती हैं? तो उसने हाँ में सिर हिलाया।
रिपोर्टर  : तुम्हें कैसे पता मुस्लिम ज्यादा डिफाल्ट करते हैं?

लियाकत  : अरे सर! हम मिलते रहे हैं, …हम जाते रहते हैं। विजिट करते रहते हैं। एक बंदे ने बताया था, हमने भगा दिया जब रिकवरी टीम आई थी। …इसलिए दिक्कत हो गई।

रिपोर्टर  : रिकवरी टीम में तो गुंडे होते हैं?

लियाकत  : हां।

लियाकत ने तहलका रिपोर्टर से बातचीत में बैंक वसूली एजेंटों की भूमिका की बात स्वीकार की। उन्होंने कहा कि वे गुंडे और दबंग लोग हैं, जो ऋण वसूलने के लिए अपमानजनक तरीके अपनाते हैं, जिससे ग्राहक अवसाद में चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बैंक ऋण वसूली में कानून के नियमों और निष्पक्ष आचरण का पालन किया जाना चाहिए तथा वसूली एजेंटों द्वारा बाहुबल या आक्रामक रणनीति के प्रयोग पर सख्ती से रोक लगाई गई है। 2024 में एक अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने बैंक रिकवरी एजेंटों को गुंडा गिरोह तक कह दिया था।
लियाकत  : एक आया था रिकवरी लाला बंदा, वो रिटारयर्ड था पुलिस से। …वो कह रहा था, भाई कोई पैसे न दे, तो हम बेझिझक घर में घुस जाते हैं। अगर कोई पैसे नहीं दे रहा है, लड़ाई में आ गया है, तो हम बिना लड़े पीछे नहीं हटते।

रिपोर्टर  : वो क्या करते हैं जाकर?

लियाकत  : गाली-गलोज, घर में जाकर कहना, आस-पड़ोस में कहना, फोर्स करेंगे इतना, ….डिप्रेशन में डाल देंगे।

रिपोर्टर  : अच्छा जी!

तहलका की पड़ताल में बैंक अधिकारियों, एनबीएफसी प्रतिनिधियों, वित्तीय सलाहकारों और डीएसए ने स्वीकार किया कि यूपीए सरकार के समय से ही दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों में ऋण प्राप्त करना बेहद मुश्किल, ज्यादातर असंभव रहा है और यह प्रवृत्ति मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी जारी है। बढ़ती चूक और खराब वसूली संभावनाओं के कारण सरकार, निजी बैंकों और एनबीएफसी द्वारा इन क्षेत्रों को नकारात्मक घोषित किया गया है।
ऋण मामलों से संबंधित लोगों ने कहा कि वित्तीय संस्थाओं को मिश्रित इलाकों में रहने वाले या अपने समुदाय के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों से बाहर रहने वाले मुसलमानों को ऋण देने में कोई समस्या नहीं आती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जहां मंदिरों या गुरुद्वारों के पास की संपत्तियों पर आसानी से ऋण मिल जाता है, वहीं मस्जिदों के पास की संपत्तियों को ऋण देने वाली संस्थाओं से कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। एक बैंक प्रतिनिधि ने तो यह भी स्वीकार किया कि बैंक और एनबीएफसी कुछ हिंदू बहुल क्षेत्रों में हिंदुओं को ऋण देने से बचते हैं।
पड़ताल के दौरान ऋण स्वीकृत करने में भ्रष्टाचार का भी मामला सामने आया। एक रिलेशनशिप मैनेजर (आरएम) ने खुलासा किया कि उसे एक मस्जिद के पास स्थित घर के लिए एनबीएफसी से ऋण स्वीकृत कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ी थी। दो अन्य प्रतिनिधियों ने दिल्ली के अनाधिकृत क्षेत्रों में, जहां प्रमुख भारतीय बैंक काम नहीं करते हैं; गृह ऋण (होम लोन) स्वीकृत कराने के लिए रिपोर्टर से खुलेआम कमीशन की मांग की।
इस पड़ताल में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का भी खुलासा हुआ, जिसमें एक आरएम ने बताया कि वसूली दल अक्सर गुंडों की तरह काम करते हैं। घरों में घुस जाते हैं और ऋण लेने वालों को डराते-धमकाते हैं और उनके परिवार को अवसाद में धकेल देते हैं।
इस तरह के खुलासे न केवल भेदभाव को उजागर करते हैं, बल्कि भ्रष्टाचार और अभद्रता के साथ जबरदस्ती ऋण वसूली की प्रक्रिया को भी उजागर करते हैं, जो ऋण देने वाले पारिस्थितिकी तंत्र को लगातार प्रभावित कर रही है।

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