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हमारे देश के गणतंत्र पर मंडराते हुआ संकट | Pavitra India

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कल हमारे देश को गणतंत्र दिवस की शुरुआत होने को 76 साल हो रहे हैं. और भारत में संसदीय राजनीति की शुरुआत 13 मई 1952 के दिन पहले संसदीय सत्र से शुरू हुआ है. 1951-52 मे पहला आमचुनाव संपन्न होने के बाद यह सिलसिला शुरू हुआ था. 74 सालों की यात्रा मे आपातकाल का ( 25 जून 1975 – 21 मार्च 1977 तक ) के दौरान मे इस देश के संसदीय जनतंत्र पर 21 महिनो का संकट आया था. लेकिन 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार से संकट दूर हो गया था. लेकिन 26 मई 2014 को भाजपा की सरकारने सत्ता की बागडोर सम्हालने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘एकचालकानुवर्त’ ( किसी एक आदमी का नियंत्रण ) के सिध्दांत के अनुसार पिछले 12 सालों से वर्तमान सरकार का नियंत्रण अघोषित आपत्काल की दिशा में चल रहा है.

और उसके लिए सरकारने हमारे देश के संविधान की प्रस्तावना में से समाजवादी और सेक्युलर शब्दों को हटाने से लेकर डेमोक्रेटिक प्रक्रिया चलाने के लिए बनाया गया इलेक्शन कमिशन को नियुक्त करने की प्रक्रिया को भी अपनी सुविधा के अनुसार बदलने से शुरू कर दिया है. अपने दल का बहुमत बनाने के लिए 2023 को भारतीय चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में जिसमें पहले प्रधानमंत्री संसद के विरोधी दल के नेता और मुख्य न्यायाधीश की कमीटी के लिए बनाया गया (1991) के कानून मे दिसंबर 2023 के संसद के शितकालिन सत्र मे विरोधी दलों के सौ से अधिक संसद सदस्यों को लोकसभा गृह से निष्कासित करते हुए 20 से अधिक संसदीय बिलो को पास करने का दुःसाहस करते हूऐ देखकर मुझे उसी समय लगा की यह हमारे संसदीय जनतंत्र को अपने मनमर्जी से चलाने की शुरुआत हो गई है. चुनाव आयोग के चयन प्रक्रिया में बदलाव करते हूए प्रधानमंत्री और संसद में विरोधी दल के नेता को रखते हुए, मुख्यन्यायाधीश को हटाकर उसकी जगह पर मंत्रीमंडल के सदस्य को ले कर अपने ही दल का बहुमत करते हूऐ बदलाव करने के बाद चुनाव आयोग के किसी भी सदस्य के उपर राष्ट्रपति के इजाजत के बगैर कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं करने का कानूनी प्रावधान संशोधन (CIASE-16,CEC & E-BILL – 2023) करने के बाद चुनाव आयोग के किसी भी सदस्य के उपर उनके जिवितकाल तक कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. यह बदलावों को देखकर आनेवाले चुनाव सिर्फ़ एक औपचारिकता मात्र रह जायेगी. और रिपब्लिक ऑफ इंडिया मतलब हमारे संविधान की प्रस्तावना में के जनतंत्र को अपने पार्टी के तंत्र में करते हूऐ (DEMOCRATIC) शब्द को भी खत्म करने का काम किया गया है. लेकिन इस एकतर्फा कमेटी मे कांग्रेस के तरफ से लोकसभा के विरोधी दल के नेता का कमेटी मे शामिल होने का क्या औचित्य है ? मतलब अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 सालों से ‘एकचालकानुवर्त’ के सिध्दांत के अनुसार ही देश में शासन चलाने के लिए की जा रही कोशिश मे शामिल होना है.

ऐसा शक्तिमान चुनाव आयोग बनाने के पिछे वाली मानसिकता को किसी भी विरोधी दलों के नेताओं ने क्यों इस तरह का एकतरफ़ा बदलावों को लेकर सशक्त विरोध नहीं किया ? उसके बाद इस विवादस्पद चुनाव आयोग के द्वारा आननफानन मे की जा रही एस. आई. आर. को लेकर सिर्फ ‘वोट चोर – वोट चोर’ का हंगामा करने का विरोधी दलों का कोरस “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” वाली बात है. मुलतः भाजपा की मातृसंस्था आर एस एस को भारतीय संविधान ही मंजूर नहीं है. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 के दिन संविधानको देशवासियों को अर्पण करने के बाद आर. एस. एस. का अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनायझर’ मे भारतीय संविधान को नकारते हूऐ, लिखा है कि “स्पार्टाकस और सोलन के भी हजारों वर्ष पहले ही ऋषि मनू द्वारा लिखित ‘मनुस्मृति’ जैसा नायाब संविधान के रहते हूऐ इस देश-विदेशो की संविधानों की नकल करते हूऐ बनाया गया गुदड़ी जैसे संविधान, जिसमें भारतीयता का कुछ भी समावेश नहीं है. और भारत के तिरंगे राष्ट्रध्वज की आलोचना करते हूऐ उसके तीन रंगों को अशुभ बोलते हूऐ, उसकी जगह पर हिंदुधर्म के भगवा ध्वज की मांग की है. भारत के संविधान से लेकर भारत के राष्ट्रध्वज को नकारने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक ईकाई भाजपा ने 26 साल पहले जब अटलबिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे उस समय उन्होंने (1 फरवरी 2000) को ( NCRCWC) संविधान समिक्षा के लिए न्यायमूर्ती एम. एन. वैंकटचलैया की अध्यक्षता में संविधान समिक्षा समिति का गठन किया था.और आयोग को एक साल के भितर सिफारिश करने के लिए कहा गया था. लेकिन तीन बार समय विस्तार के बाद आयोग ने 31 मार्च 2002 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें दो खंडो मे 1979 पृष्ठों की सूचनाएं दी गई है.

जिसे तत्कालीन विधीमंत्री अरुण जेटली ने स्विकार किया था. लेकिन विरोधी दलों के विरोध को देखकर अटलबिहारी वाजपेयी ने उसे छुपाकर रखा था. वर्तमान सरकारने बहुत ही चतुराई के साथ चुंहे के जैसे संविधान को संविधान संशोधन की आड़ में संविधान को बदलने की शुरुआत कर दी है . जिसमे भारतीय दंड संहिता से लेकर, वनविधेयक तथा किसानों से लेकर मजदूरों से लेकर पर्यावरण संरक्षण, जमीन अधिग्रहण, रोजगार गारंटी से लेकर स्वास्थ- शिक्षा तथा चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया तक के प्रावधानों को बदलने की शुरुआत संविधान संशोधन करते हूऐ अपने मनमर्जी का संविधान पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिए संविधान बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. क्योंकि 26 नवंबर 1949 के दिन डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा पेश किया गया सविंधान के तहत चल रहे संसदीय जनतंत्र को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सपनों का ‘एकचालकानुवर्त’ बनाने के अभी हाल ही में संपन्न हूऐ दो प्रदेशों के विधानसभा तथा स्थानीय निकायों के चुनावों में महाराष्ट्र राज्य विधानसभा और बीहार राज्य विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया बदलने के उद्देश्य साफ दिखाई दे रहे हैं. और इसके बाद पश्चिम बंगाल, आसाम, तमिळनाडू, केरल मे भी यही नजारा देखने को मिलेगा इतना तय है.

सबसे संगिन बात हमारे संविधान निर्माताओं ने आदिवासियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए पांचवीं और छठवी सूची का हमारे संविधान में विशेष प्रावधान करके रखा हुआ है. इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी आदिवासी शब्द को नहीं मानते हूए वनवासी शब्द का प्रयोग करता है. जिसमें हमारे देश की लगभग दशप्रतिशत आदिवासी आबादी को जल – जंगल – जमीन के अधिकारों को अक्षुण्ण बनाऐ रखने के लिए यह प्रावधान किया गया है. लेकिन भाजपा इन प्रावधानों की परवाह नहीं करते हूऐ ‘फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट’ के नाम से मतलब शक्कर की चाशनी मे जहर और ‘बायोडायव्हर्सिटी एक्ट’ के नाम पर हमारे देश का बचाखूचा जंगल को अपने पसंद के पूंजीपतियों को यह क्षेत्र सौपने की तैयारी चल रही है. 1980 के वनविधेयक से आदिवासीयों को दिये गए अधिकारों को खत्म करते हूए'”न रहेगा बांस न बजे गई बांसुरी” कहावत के अनुसार भारत के बचेखुचे जंगल को कार्पोरेट सेक्टर को सौप रही है. जलवायु परिवर्तन की परवाह नहीं करते हूऐ बडी मुश्किल से 15 % बचा हुआ जंगल क्षेत्र को उजाड़ने का काम कर रहे हैं.

आज के इंडियन एक्सप्रेस मे अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने दाओस मे चल रहे औद्योगिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र के विश्व भर के नेताओं की चल रही बैठक को लेकर पूरे विश्व में ही चल रहा पर्यावरण विनाश के बारे में आर्थिक आंकडों के साथ कहा है कि ” अमेरिका के तरफ से लादा जा रहा टेरिफ की तुलना में भारतीय शहरों की दिन-प्रतिदिन बिघडती जा रही प्रदूषित हवा यह सबसे बड़ा संकट है उन्होंने कहा कि ट्रंप के द्वारा लगाया जा रहा टेरिफ से ज्यादा आर्थिक संकट हमारे देश का बिघडते जा रहा पर्यावरण है पर्यावरण सिर्फ कुछ पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे लोगों पर छोड़ कर नहीं चलेगा क्योंकि बिगड़ता पर्यावरण का संकट आर्थिक है. प्रदूषित हवा की वजह से सभी नागरिकों के स्वास्थ्य मे गंभीर रूप से होने वाले परिणम की वजह से अपने काम से ले रहे छुट्टीयों की वजह से हो रहा काम का नुकसान उसके स्वास्थ्य के लिए हो रहा खर्च की वजह से देश के जीडीपी का हो रहा नुकसान के आंकड़े हैरानी वाले हैं दुनिया भर के नागरिकों के उदाहरण के साथ उन्होंने कहा कि सिर्फ उनके उपर हो रहा दवा – दारू का खर्च पर साल मे 5 लाख 70 हजार करोड डॉलर ( 52 लाख 25 हजार करोड़ रुपये ) इतना बड़ा बजेट खर्च हो रहा है. यह खर्चा विश्व जीडीपी का4-8% है. मतलब पूरी दुनिया का जीडीपी इसकी वजह से इतना कम हो रहा है. भारत में हरसाल 17 लाख लोगों की मृत्यू सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण के कारण हो रही है. यह अनुपात भारतीय कुल मृत्यू होने वाले लोगों मे 18 % है. सिर्फ प्रदूषित हवा की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को हरसाल 15000 करोड डॉलर का नुकसान हो रहा है. प्रदूषित हवा – पानी की वजह से भारत का जीडीपी का 1-7 % हिस्सा इसपर ही निकल जाता है. मतलब हमारे देश के जीडीपी का एक चौथाई से भी अधिक हिस्सा इस संकट की वजह से खर्च हो रहा है. और यह संकट न ट्रंप ने निर्माण किया नही जवाहरलाल नेहरू या मुस्लिम, अर्बननक्सली यह शतप्रतिशत सरकार निर्मित है और उल्टा ऐसे विकास विनाशकारी विकास को विरोध करने वाले लोगों को विकास विरोधी तथा देशद्रोही करार दिया जा रहा है. तथाकथित विकसित देशों ने अविकसित देशों के पर्यावरण के प्रति अज्ञानता का फायदा उठाते हूऐ यहां पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले उद्दोग शुरू किए जिसमें भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कारखाना (25 साल पहले की भोपाल गॅस ट्रॅजेडी ) एक उदाहरण मात्र है. लगभग सभी उद्योगों का उत्पादन अविकसित देशों में किऐ जा रहे हैं जो दाओस मे हमनें इतने बड़े उद्योगों को भारत में निवेश करने के दावे किए जा रहे हैं.

अभी एक महिने पहले ही हमारे देश की राजधानी दिल्ली की प्रदूषित हवा और विकसित देशों के राजधानियों की प्रदूषित हवा का अनूपात दिल्ली में 400 %था तो उस समय लंदन का एक था स्वास्थ्य के लिए कम-से-कम 50%होना चाहिए. अब इस बात का ध्यान खिचने वाले लोगों को भारत विरोधी बोलने से नुकसान किसका हो रहा है ? माधव गाडगीळ से लेकर विश्व के 200 से अधिक संख्या में वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग के संकट को लेकर चेतावनी दी है. जिसमें हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर, अंटार्कटिका के बर्फ पिघलने के कारण विश्व के तापमान वृद्धि से लेकर, ऋतूचक्र के बिघडने की वजह से भयावह प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन तथाकथित विकास अंधी दौड़ में शामिल होकर विश्व कि सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के खोखले दावे कर रहे हैं. जो कभी भी संभव नहीं हो सकता. लेकिन हमारे प्रजासत्ताक देश की जनता को गुमराह करते हूए पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए हमारे संविधान को बदलने की प्रक्रिया को रोकने का संकल्प हमारे देश के 76 वे प्रजासत्ताक दिवस का सही सम्मान हो सकता है. क्योंकि हमारे देश के संविधान सौपने के समय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है. इस एतिहासिक ंक्षण मे सभी नागरिकों के लिए न्याय (सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक) स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व की प्रतिबद्धता की घोषणा 26 जनवरी 1950 के दिन की है. इसलिए हम पिछले 76 सालों से लगातार प्रजासत्ताक दिवस मनाने की शुरुआत की है.

THE PREAMBLE TO THE CONSTITUTION OF INDIA IS AN INTRODUCTORY STATEMENT OUTLINE THE GUIDING PURPOSE, PRINCIPLE, AND PHILOSOPHY OF THE DOCUMENT. ADOPTED ON 26 NOVEMBER 26, 1949, AND EFFECTIVE 26 JANUARY 1950, IT DECLARES INDIA A SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR, DEMOCRATIC REPUBLIC AIMING TO SECURE JUSTICE, LIBERTY, EQUALITY AND FRATERNITY FOR ALL CITIZENS.

क्या सचमुच हमारे देश में हमारे संविधान निर्माताओं ने आजसे 76 साल पहले सौपा हुआ संविधान के अनुसार वर्तमान सरकारके चाल – चलन और चरित्र दिखाई दे रहा है ?

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