ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि चार नए लेबर कोड मजदूरों के अधिकार छीनने का काम कर रहे हैं। इन कानूनों से यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार कमजोर हुआ है। हड़ताल करने की प्रक्रिया को भी कठिन बना दिया गया है। संगठनों का कहना है कि इससे मालिकों को फायदा और मजदूरों को नुकसान होगा। ठेका प्रथा को बढ़ावा मिलने से स्थायी नौकरियों की संख्या घटेगी और असुरक्षा बढ़ेगी।
मजदूर संगठनों ने सरकार से चारों लेबर कोड वापस लेने की मांग की है। इसके साथ ही उनका कहना है कि मनरेगा को मजबूत किया जाए, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जाए और निजीकरण की नीति पर रोक लगे। यूनियनों का आरोप है कि रेलवे, बिजली, बैंक, बीमा, बंदरगाह और दूसरे सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी हाथों में देने की तैयारी हो रही है, जिससे रोजगार पर खतरा पैदा हो रहा है।
हड़ताल की मांगों में ड्राफ्ट सीड बिल और बिजली संशोधन बिल को वापस लेने की बात भी शामिल है। संगठनों का कहना है कि ये कानून किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ हैं और बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के बजट में कटौती पर भी विरोध जताया गया है।
ट्रेड यूनियनों का दावा है कि इस हड़ताल में बैंकिंग, परिवहन, कोयला, फैक्ट्री, निर्माण, बीमा, डाक विभाग और ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूर शामिल होंगे। कई राज्यों में प्रदर्शन, रैलियां और सभाएं भी आयोजित की जाएंगी। छात्र और युवा संगठनों से भी इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की गई है।
सरकार का कहना है कि लेबर कोड सुधारों का मकसद उद्योगों को आसान बनाना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। लेकिन मजदूर संगठनों का तर्क है कि इससे सिर्फ कॉरपोरेट कंपनियों को फायदा होगा और आम कामगारों की सुरक्षा खत्म हो जाएगी।
अब सबकी नजर 12 फरवरी पर टिकी है। अगर यह हड़ताल बड़े पैमाने पर सफल होती है तो देश के कई हिस्सों में कामकाज प्रभावित हो सकता है। मजदूर संगठनों का कहना है कि यह आंदोलन मजदूरों, किसानों और आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।
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