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गुजरात की कहानी डॉ. सुरेश खैरनार की जुबानी. | Pavitra India

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साथियों आजसे दो दिन बाद गुजरात दंगों को 24 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मैनें यह पोस्ट लिखने का मन बनाया. 27 फरवरी 2002 के दिन सुबह के समय गोधरा स्टेशन पर खडी साबरमती एक्सप्रेस की कुल 1100 प्रवासी ढोने की क्षमता थी. लेकिन उस दिन 2000 प्रवासी थे. और उनमें 1700 कारसेवक थे. एस – 6 कोच में 72 प्रवासीयो की क्षमता थी. लेकिन 27 फरवरी 2002 के दिन पूरा कोच खचाखच भरा हुआ था. साबरमती एक्सप्रेस को ग्यारह कोच लगे हुए थे. और दो हजार की संख्या में प्रवासी पूरी ट्रेन में खचाखच भरे हुए थे. और बाहर स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर भी दो हजार की संख्या में गोधरा के मुसलमानों ने ट्रेन को घेरने के बावजूद सिर्फ एक कोच जिसका एस – 6 नंबर था. उसी को आग लगा दी यह बात सोचना जरूरी है ? एस – 6 कोच के 59 अधजले शवो में से 26 महिलाओं के शव थे, 12 बच्चों के थे, और 21 पुरुषों के थे. 43 लोगों को चोटों के कारण, उनमें से पांच गोधरा के अस्पताल में, जिन्हें इलाज के लिए भर्ती कराया गया उन पांच में से एक की अस्पताल में मौत हो गई. और बचें हुए लोगों को, तिनचार दिन के बाद, छुट्टी दे दी गई. 59 अधजले शवो को पहचानना मुश्किल था. इतने बुरी तरह से जल चुके थे.


तत्कालिन मुख्यमंत्री श्री. नरेंद्र मोदीजी और स्वास्थ्य मंत्री श्री. अशोक भट और अन्य मंत्री गण को गांधीनगर से निकलते हूऐ अपने साथ लेकर गोधरा की कलेक्टर श्रीमती जयती रवि से 27 फरवरी को दोपहर के दो बजे के आसपास, मिलने के बाद नरेंद्र मोदीजी ने उसी ट्रेन से उन शवो को लेजाने का निर्णय लिया. जिसका कलेक्टर साहीबा ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से उन अधजले शवो को गोधरा से अहमदाबाद ले जाने के निर्णय का विरोध किया. अंत में नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी मंत्रीयो के आग्रह पर गुजरात वीएचपी के अध्यक्ष श्री. जयेश पटेल के हवाले करने की कार्रवाई गोधरा के मामलेदार की मदद लेकर की गई ? क्या यह कृती नरेंद्र मोदी जी ने 10 अक्तूबर 2001 के दिन गांधीनगर में पहली बार मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेते हूऐ कहां था कि “मै नरेंद्र दामोदरदास मोदी आज से गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री के पद ग्रहण करते हूऐ हमारे देश के संविधान के अनुसार गुजरात राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के जानमाल की सुरक्षा बगैर किसी भेदभाव से करने की शपथ लेता हूँ. ” क्या गोधरा से अधजली लाशों को गुजरात विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष श्री. जयेश पटेल को सौपना और दुसरे दिन 28 फरवरी को गुजरात प्रदेश विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के तरफ से गुजरात बंद की घोषणा के बावजूद उन लाशों का जूलूस अहमदाबाद के सडकोपर निकालने की कृति को कौन से कानून के अंतर्गत होने दिया गया था ? और किस उद्देश्य से होने दिया गया था ? यह सवाल आज भी अपनी जगह बना हुआ है.


उन अधजले शवो को खुले ट्रकों के उपर लादकर, पहले अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल में लेकर गए. इस तरह एक जिलाधिकारी, और वह भी एक महिला के विरोध की अनदेखी करने की वजह से उनके कनिष्ठ अधिकारी के द्वारा जल्दीबाजी करते हूऐ, गोधरा से 200 किलोमीटर दूर अहमदाबाद में अधजले शवो को ले जाने के पीछे, क्या कारण हो सकता है ? क्योंकि उनमेसे किसी भी शव को पहचानने जैसी स्थिति नहीं थी. और नही उनके किसी नाते – रिश्तों में से किसी एक ने कोई मांग की थी ? कि हमें शव दिया जाए. और सबसे अहं बात जयेश पटेल के परिवार के किसी भी सदस्य का शव उन लाशों मे नही था. उसके बावजूद उनके कब्जे में शवों को देकर, उनका शवों को खुले ट्रकों के उपर डालकर अहमदाबाद की सड़कों पर जुलूस निकालने के पीछे का उद्देश्य क्या हो सकता है ?


जबकि इस तरह की कोई भी घटना घटने के बाद, कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति सबसे पहले कानून और व्यवस्था की चिंता करेगा. और राज्य के मुख्यमंत्री और जो राज्य के गृहमंत्रालय की भी जिम्मेदारी सम्हाल रहे थे. उन्होंने इस तरह का निर्णय लिया था. तो फिर गुजरात दंगों के जांच करने वाले कमिशन ने इस बात का सज्ञान लेते हुए क्या जांच की है ? क्यों कि इस तरह शवों को खुले ट्रकों में डाल कर, अहमदाबाद शहर में बंद होने के बावजूद जुलूस निकालने की इजाजत किसने दी थी ? और इस तरह लोगों को भड़काने की कृती के कारण गुजरात में जो आग की तरह दंगों को फैलाने में मददगार सिद्ध हुआ है. उसका सज्ञान लेते हुए, अबतक किसे और कौन सी सजा सुनाई गई है ?


बजरंग दल और वीएचपी के लोगों के 28 फरवरी 2002 के दिन गुजरात बंद की घोषणा के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात बंद की घोषणा करते हैं. और बंद होने के बावजूद अधजले शवो को खुले ट्रकों के उपर रखकर अहमदाबाद शहर में जुलूस निकालने के पिछे की वजह क्या हो सकती है ? और यह जलूस गुजरात की शांति – सद्भावना के लिए कितना काम में आया है ? अब चौबीस सालों के बाद ही सही लेकिन इन सब बातों का मुल्यांकन होने की आवश्यकता है. क्योंकि अगले साल इस घटना को 25 साल पूरे होने जा रहा है. इसलिए गुजरात दंगों का मुल्यांकन करने की आवश्यकता है. क्योंकि आज भी रोज नये – पुराने चेहरे हिंदू – मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिए “एक हिंदू लडकी के साथ, अगर किसी मुसलमान लड़के ने शादी की तो उसे लवजेहाद बोलते हूऐ दस मुस्लिम लड़कियों को जबरदस्ती से उठाकर हिंदूओ ने मुसलमानों को सबक सिखाने का काम करना चाहिए”. जैसे हेटस्पिच लगातार दिए जा रहे हैं. जैसे लड़की हिंदू हो या मुसलमान उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है. वह एक चिज है. जिसका इस्तेमाल दोनों समाजो के स्वघोषित ठेकेदारों के तरफ से सिर्फ ध्रुवीकरण की राजनीति करने के लिए, एक जलावन का सामान हो गया है. अठारह साल के बाद लड़की हो या लडका इस देश के नागरिकों की हैसियत से मतदान में हिस्सा लेने की उम्र के हो गए हैं. हमारे देश के संविधान के अनुसार वह अपने जीवन को लेकर कोई भी निर्णय हमारे संविधान के अनुसार लेने के लिए संविधानिक अधिकार प्राप्त नागरिकों की हैसियत रखने के बावजूद, यह कौन ठेकेदार जगह – जगह पैदा हो गए ? जो एक की जगह दस लड़कियों को उठाने की बात करते हैं ? क्या यह हमारे देश की आधी आबादी महिलाओं के अपमान की बात नहीं है ? और हमारे देश की महिलाएं क्या सिर्फ 8 मार्च आंतरराष्ट्रीय महिला दिन मनाने के अलावा इस तरह की हरकतों को रोकने का काम नहीं करेगी ?


क्या गुजरात के दंगों से यही चिरशांती का संदेश मिला है ? कबतक आम लोगों की मौत के उपर अपनी राजनीतिक रोटीया सेंकने का काम करेंगे ? आंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजो के हाथों में देश की संपत्ति औने-पौने दामों में बेचना बहुत बडी देश भक्ति चल रही है ? उसकी पोल खुल गई तो वह भी देश के उपर हमला बोल रहे है. और सबसे हैरानी की बात वर्तमान सत्ताधारी दल के कुछ मंत्रियों ने भी हमारे देश के उपर हमला बताया है. अगर एक आंतरराष्ट्रीय स्तर का विश्व का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला करने वाले आदमी को इस तरह देशभक्ति की आडमे छुपाने में मददगार करने वाले मंत्रियों को भी शामिल देखकर लगता है, कि यह देश 140 करोड जनसंख्या के लोगों का न होकर केवल कुछ चंद घोटालेबाजों ने अपने बाप की जागीर के रूप में कब्जा कर लिया है.
इसिलिये सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का पिछले बारह सालों से लगातार चल रहा षडयंत्र का पर्दाफाश करते हुए दोबारा गुजरात के दंगों के जैसा तांडव नहीं होने देना ही सही गुजरात दंगों के 24 साल पूरे होने का संकल्प हो सकता है .

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