शक्तिशाली देशों के वर्चस्व, मादुरो के सत्ता प्रेम और तेल के तिजारती खेल से दुनिया की सियासत की तस्वीर बदल गई. देखते ही देखते वक़्त की ठोकरों से तख़्त की तक़दीर बदल गयी. बेशक, दुनिया के अकूत तेल सम्पदा का मालिक, प्रचूर रेयर अर्थ मटेरियल का अधिकारी, एक सम्प्रभु राष्ट्र के निर्वाचित राष्ट्रपति एक झटके में अपने तख़्त से बेतख़्त हो गए तथा हाथों में ज़ंजीर और आंखों पर पट्टी के संग दुनिया के सबसे अमीर और पावरफुल हुक्मरान के जेल की सलाखों के पीछे क़ैद हो गए.
मैं बात तीन जनवरी 2026 की आधी रात की कर रहा हूँ जब ताक़त के आज़माइश में इस दुनिया के इंसाफ़ का बंधन ढीला पड़ गया. मैं बात दक्षिण अमेरिकी महाद्वीपीय देश- वेनेज़ुएला की कर रहा हूँ जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा एक जटील सैन्य अभियान -‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ को अंजाम देते हुए वेनेज़ुएलाई राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेज को गिरफ़्तार कर लिया गया. मैं बात दुनिया में बढ़ते संघर्ष, उभरते सत्तावाद तथा नवयुगीन उपनिवेशवाद के बीच युद्ध और शांति की कर रहा हूँ. मैं क़ायदे, कानून, आज़ादी, मानवाधिकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों की प्रासंगिकता की कर रहा हूँ.
शायद अपनी सार्थकता खोने की आशंका से ही यूएन महावचिव – एंटोनियो गुटेरेश यह बयान जारी करते हैं कि वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के संबंध में अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान नहीं किया गया है. अमेरिका के भीतर और बाहर के कई देशों की सरकार के हवाले से भी विरोध के स्वर सुनायी दिये कि यह अवैध आक्रमण और वेनेज़ुएला की सम्प्रभुता का उल्लंघन है. इस घटनाक्रम पर भारत का भी बयान आता है कि सभी संबंधित पक्ष आपसी मतभेदों को बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाएं.
परन्तु इन तमाम प्रतिक्रियाओं के आने से पहले ही डोनाल्ड ट्रम्प बेखौफ़ और बेबाक यह एलान कर देते हैं कि इस अभियान का उद्देश्य वेनेज़ुएला में उस शासन को समाप्त करना था जिसे वाशिंगटन ‘ नार्को – आतंकवादी’ बताता है. वेनेज़ुएला की आज़ादी का फ़रमान है ये कार्रवाई. जब तक यहाँ ‘ सुरक्षित, उचित और विवेकपूर्ण सत्ता हस्तांतरण, की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक ‘ देश का संचालन ‘ अमेरिका करेगा. मतलब वेनेज़ुएला हम चलाएँगे.
लेकिन विवेचना के नज़रिये से देखा जाय तो एक तरफ़ ट्रम्प प्रशासन यह भुल गए कि दिल की दलिलों पर किसी देश की हुकूमत नहीं चलाए जाते हैं। सल्तनत के फ़ैसले किसी एक व्यक्ति की मर्ज़ी पर नहीं बल्कि उसूलों पर लिए जाते हैं. और दूसरी तरफ़ मादुरो प्रशासन भी यह भूल गए कि कोई भी हुकूमत इंसानियत और मानवाधिकार से बड़ी नहीं होती है. एक हुक्मरान होने के नाते अपने राष्ट्र के सिस्टम को बरकरार रखना शासक का फ़र्ज़ होता है और राष्ट्रीय फ़र्ज़ के आगे एक शासक को अपनी व्यक्तिगत ख्वाहिश तथा ख़्याल की कुर्बानी देनी पड़ती है. बहरहाल देखा जाय तो यह घटनाक्रम सिर्फ़ अमेरिका और वेनेज़ुएला की सियासी लड़ाई का नहीं है बल्कि यह सिलिकॉन वैली और वॉल स्ट्रीट के मुनाफे की भी लड़ाई है. यह मसला केवल अमेरिकी विदेश नीति या लैटिन अमेरिका की क्षेत्रीय राजनीति का नहीं है बल्कि यह मसला पूरी दुनिया की एकता और अम्नो – मुहब्बत का है। क्योंकि इस कार्रवाई ने पूरे यूरोप में अमेरिका की पारम्परिक गठबंधन संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया है. ग्रीनलैण्ड पर ट्रम्प के हमले की धमकी ने तो नाटो सदस्य देशों के बीच सैन्य टकराव का ख़तरा पैदा कर दिया है. दुनिया फिर से संसाधनों और जंगी हथियारों की खुली होड़ के मैदान में पहुंचे गयी है. शांति की क़ीमत संसाधनों से वसूला जा रहा है. कूटनीति की चाल, अंदाज़, बोल – सभी बदल रहे हैं. सहमति का सेतु टूट रहा है. पूरी दुनिया एक अघोषित भय के साए में सांस लेने को विवश हो गई है. और इन हालातों के बीच भारत के ‘ वसुधैव कुटुम्बकम’ का विचार ठहरा हुआ नज़र आ रहा है. यून की आवाज़ घाटी में गूंजती सिर्फ एक ध्वनि बनकर रह गयी है. बहरहाल सवाल यहाँ यह उठता है कि एक देश द्वारा दूसरे सम्प्रभु देश के शासनाध्यक्ष को उसके ही माँद में घुसकर गिरफ़्तार करके उसके संसाधन को अपने क़ब्ज़े में कर लेना क्या उचित है? अगर हां तो फिर अन्तराष्ट्रीय कानून और विश्व व्यवस्था का क्या होगा ? क़ायदे से देखा जाय तो ट्रम्प प्रशासन संयुक्त राष्ट्र नहीं है. इसलिए मादुरो मसले के लिए ट्रम्प प्रशासन को संयुक्त राष्ट्र में जाना चाहिए था. ध्यान न देने पर दुनिया के अन्य देशों का समर्थन जुटाकर दबाव डालते हुए यूएन के जरिये ही इस मसले का समाधान निकालना चाहिए था.
दूसरी तरफ़ ट्रम्प प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ़्तारी के बाद क्या वेनेज़ुएला की जनता मादुरो के समर्थन में सड़कों पर उतरी है? अगर हां तो सवाल उठता है कि मादुरो को हटाने का फ़ैसला वेनेज़ुएला की जनता का होना चाहिए या किसी बाहरी सरकार का? और अगर जनता सड़क पर नहीं है तो सवाल यह भी उठता है कि क्या वाकई में वेनेज़ुएला की जनता मादुरो शासन से छुटकारा पाना तो नहीं चाह रही थी? क्योंकि जनता की ख़ामोशी अपनी आज़ादी का एलान कर रही है. बिना किसी अप्रिय घटना के उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज देश की अन्तरिम राष्ट्रपति बन जाती है. जनता के बीच बेहद लोकप्रिय मुख्य विपक्षी नेता मारिया माचाडो जेल से निकालकर शांति नोबेल पुरस्कार लिए व्हाइट हाउस पहुंच जाती है. सत्ता मोह में पड़े मादुरो द्वारा जिस तरह से गुज़रे चुनाव में धांधली करना, निष्पक्षता की अनदेखी करना, ट्रांसपेरेंसी, नागरिक की आज़ादी और लोकतंत्र रिफॉर्म्स के लिए काम करने वाली मारिया माचाडो की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी रद्द करवा देना, बी.बी.सी. तथा टाइम मैगज़ीन का चेहरा, वाक्लाव हॉवेल मानवाधिकार पुरस्कार, सखारोव पुरस्कार तथा नोबेल शांति पुरस्कार पाने के बावजूद मारिया माचाडो को जेल में बंद किये रहना, लाखों नागरिकों को देश से पलायन करने पर विवश कर देना, दवा, खाना तथा नौकरी को संघर्ष बना देना, मानवाधिकार का गला घोंट देना – जैसी हरकतों ने शायद मादुरो को जनता के दिल से निकाल बाहर फेंका है. यूएन की रिपोर्ट कहती है कि आज वेनेज़ुएला के अन्दर पिछले कई वर्षों से जारी आर्थिक पतन, दमन और अस्थिरता के हालात में लगभग 80 लाख लोगों को मानवीय सहायता की ज़रूरत है. बेहतर जीवन हालात की तलाश में लगभग 79 लाख लोग देश से बाहर चले गए हैं. मादुरो शासन में तक़रीबन 20 हज़ार के ज़्यादा लोगों की हत्याएँ की गई है. देश में मीडिया पर कठोर प्रतिबंध है. इसलिए सवाल उठता है कि किसी भी देश की जनता अपनी ज़रूरतों का डिमांड किससे करेगी – अपनी हुकूमत से या ग़ैर हुकूमत से? जनता की मांग को पूरा करना उसके हुक्मरान का काम है या दूसरे हुक्मरान का? कायदे का जवाब कहता है कि देशी हुकूमत का. तो फिर लगभग तेरह वर्षों की मादुरो सरकार आख़िर कर क्या रही थी जो देश के अन्दर गृह युद्ध जैसे हालात हो चले थे ?
इल्ज़ाम के कटघरे में तमाशा देखने वाली विश्व बिरादरी भी है जिनके सामने यह प्रश्न खड़ा है कि जिस मुल्क के विचारों को नोबेल शांति पुरस्कार के काबिल समझा गया, वहां की जनता को क्या हमेशा एक ग़ैर ज़िम्मेदार शासक के आसरे ही भय और संघर्ष का जीवन जीना होगा? अगर हाँ तो दुनिया के जिन राष्ट्रों के कंधों पर इस मसले को सुलझाने की ज़िम्मेदारी थी, उन्हें क्या समय रहते एक राउण्ड टेबल पर बैठकर विचार करने की ज़रूरत नहीं थी? बहरहाल दोषी कौन है – ट्रम्प प्रशासन या मादुरो शासन ? विश्व बिरादरी या संयुक्त राष्ट्र ?
लेखक : दिलीपअरुण तेम्हुआवाला
-------------------------------
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें। Pavitra India पर विस्तार से पढ़ें मनोरंजन की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
Facebook | Twitter | Instragram | YouTube
-----------------------------------------------
. . .