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8 मार्च आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में अमेरिका के संवेदनशील महिलाओं और पुरुषों के लिए मुक्त चिंतन. | Pavitra India

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20 वी सदी के शुरुआती दौर में अमेरिका की कामकाजी महिलाओं के अधिकारों और समान वेतन और मताधिकारो के लिए अमेरिकन महिलाओं के द्वारा किया गया आंदोलनो से जुडा इतिहास है. इसकी शुरुआत 1908 मे अमेरिकन आर्थिक राजधानी के रूप में मशहूर शहर न्यूयॉर्क से हुई है. जिसे 1911 मे आंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है. और 1975 मे संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे आधिकारिक रूप से 8 मार्च को आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की है. जिसको आज 51 साल पूरे हो रहे हैं. लेकिन इसी अमेरिका से वर्तमान समय में सत्ताधारी राष्ट्रपति और कुछ पूर्व राष्ट्रपतियों के एपिस्टिन के द्वारा चलाए गए सेक्स रॅकेट मे लिप्त होने के प्रमाण सामने आते हूऐ देखकर, मै अमेरिकन सोसायटी के दोहरे चरित्र को देखकर काफी दुःखी हूँ. क्योंकि इसी अमेरिका ने नब्बे के दशक में क्लॅश ऑफ सिविलियजेशन की थेयरी को कॉइन करते हूऐ समस्त इस्लामिक भुगोल को अनसिविलाइज दुनिया बोलते हूऐ, उनके खिलाफ युद्ध शुरू करने के पहले ही दिन ईरान की 165 स्कूली बच्चियों को बमबारी मे मारने से किया जा रहा है. जो थमने का नाम नहीं ले रहा है. और आज एक हफ्ते से अधिक समय से चल रहा ईरान के खिलाफ युद्ध वर्तमान अमेरिका के राष्ट्रपति के तथाकथित अमेरिका फर्स्ट के नारे के पिछे उसके एपिस्टिन वासनाकांड मे लिप्त होने की चर्चाओं से भटकाने के लिए भी यह युद्ध किया जा रहा है, ऐसी चर्चा दबी जुबान मे देख रहा हूँ. इसलिए मैं अमेरिकन महिलाओं को आज 51 वे आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के बहाने से अपिल करना चाहता हूँ, कि इतना चरित्रहीन तथा पर्व्हरटेड आदमी ने अमेरिका के लोगों की इजाजत के बगैर ईरान के खिलाफ युद्ध छेडने के खिलाफ आप सभीको खड़े होने की आवश्यकता है. क्योंकि (1960 -70) के दशक में विएतनाम के खिलाफ अमेरिका के युद्ध के खिलाफ आप सभी की माँओ ने जबरदस्त प्रोटेस्ट किया था. यहां तक कि तत्कालीन अमेरिकि रक्षामंत्री रॉबर्ट मॅकनमारा की बेटी मार्गरेट कैथलीन भी सडकों पर उतरकर तत्कालीन अमेरिकि सरकारको को युद्ध रोकने के लिए मजबूर कर दिया था.वैसा ही प्रोटेस्ट शुरू करना ही सही आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हो सकता है. क्योंकि हजारो सालों का सभी युद्धों में सबसे अधिक महिला तथा बच्चों को ही बली ली जाती है गाजा पट्टी उसका ताजा उदाहरण मौजूद है. और अब ईरान.


भारत को आजाद होकर 78 साल पूरे हो रहे हैं. और 26 नवम्बर संविधान दिवसको 77 साल पूरे हो रहे हैं. और 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस है. इसके अलावा 51 वा आंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी भारत में विशेष रूप से हरसाल 8 मार्च को मनाया जाता है . लेकिन क्या हमारे देश में भी सचमुच महिलाओं की मुक्ति हुई है ? क्योंकि जिस अमेरिका की महिलाओं के आंदोलन में से इस दिवस को 115 सालों से मनाने की शुरुआत हुई है. वहां के राष्ट्रपति से लेकर काफी बडे उद्योगपतियों से लेकर कुछ आंतरराष्ट्रीय राष्ट्रप्रमुखो के एपिस्टिन फाइल्स के कारनामों को देखकर मै हैरान हूँ. पुरुष भले वह सामान्य हो या असामान्य लेकिन महिलाओं को सिर्फ तू चिज बडी है मस्त- मस्त की नजरों से देखते हूऐ ,अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए एक वस्तु के जैसा अपने भोग-विलास के लिए जबतक इस्तेमाल करने का सिलसिला जारी रहेगा तबतक महिलाओं की मुक्ति असंभव है.


मै खुद ज्योंतिबा फुले , डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के महान महाराष्ट्र से हूँ. और मेरा जन्म मराठा समाज में हुआ है. और आजसे 70 वर्ष पहले हमारा परिवार संयुक्त परिवार था. जिसमें मेरे पिता और उनके तीन भाई तथा दो बहनों मेसे एक ब्याह कर अपने ससुराल में रहती थी. और हमारी सबसे बड़ी दुसरी बुआ के पती शादी के बाद ही साधू बनकर घर छोड़ कर कहीं निकल गए थे. जीनका कभी भी आता-पता नही चलने की वजह से बडी बुआ जो भाइयों मे भी सबसे बडी थी. और हमारे साथ ही रहती थी. इस तरह हमारे घर में छ महिलाओं के अलावा हमारे पीताजी और उनके तीन भाई और उन सभी के बच्चों को पकडकर घर में 25-30 लोगों का सयुंक्त परीवार था. हमारे घर की महिलाओं को दिन में कभी भी पुरूषों के सामने से आते-जाते नहीं देखा है. मेरे माता-पिता को आपसमे बात करते हुए नहीं देखा है. और महिलाओं को सभी पुरुष और बच्चों के खाने के बाद जो भी कुछ बचा – खुचा होता था उसी पर पांचों महिलाऐ खाना खाती थी. मैंने कभी नहीं देखा कि उनके लिए खाना कम है तो उन्होंने फिरसे पकाकर खाया हो. इसलिए हमारे घर की सभी महिलाओं को शारीरिक रूप से एनिमिक और अंडर वेज ही देखा हूँ. जबकि हिंदूओं मे महिला को अन्नपूर्णा देवी का दर्जा दिया गया है. लेकिन हमारे घर की सभी अन्नपूर्णा देवीयां कुपोषण की शिकार थी.


हम मुस्लिम सभी महिलाओं के हुकुक की चिंता तो करते हैं. लेकिन दिया तले अंधेरा वाली बात मैंने देखी है.मेरे गाँव का समावेश सत्यशोधक समाज के इतिहास में सत्यशोधक गाँव के रूप में दर्ज है . और मैंने अपने आँखो से तथाकथित सत्य शोधक नेता हमारे अपने ही नातेरिश्तेदारो के घरों की महिलाओं को दिन के समय में भी गाँव में इधर-उधर आते-जाते नहीं देखा हूँ. हालाँकि यह 70 साल पहले की बात है.अब कुछ परिवर्तन हुआ है मेरी खुद की बहनों ने मेरे आग्रह के कारण ग्रॅज्युएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद शिक्षिका का काम किया है. क्योंकि मेरी मान्यता है कि जबतक कोई भी महिला आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं होती तब – तक वह सही मायने में मुक्त नहीं हो सकती है. लव-जेहाद की बात चल रही है, तो याद आया कि हमारे गाँव में एक मराठा किसान परिवार था. शायद उस महाशय ने सुनहार जाती कि महिला से शादी की थी, तो सोनारीन को रखा है. ( मतलब रखैल ) और एक मराठा प्रोफेसर ने कुलकर्णी नाम के मैडम से शादी की थी, तो उसको भी बामनीन को रखा है, यही शब्द प्रयोग इस्तेमाल किया करते थे. यह मेरे जन्मस्थान खान्देश के धुलिया जिले के मालपूर नाम के सत्य शोधक गाँव की कहानी है.


उल्टा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोग, सभी याने स्री-पुरूष दोनों ही कुपोषण के शिकार होते हैं. क्योंकि खाने-पीनेके मामले में दोनों एक जैसा ही खाना खाते हैं. उल्टा तथाकथित संपन्न लोगों मे महिलाओं को पैदा होने से ही, घुट्टी में पिलाया जाता है, कि तू लडकी है, यह एहसास कदम- कदम पर दिया जाता है. इसके लिए सिमाॅन द बुआर की ‘सेकंड सेक्स’ नाम कि किताब बहुत ही बेहतरीन और बायोलोजी से लेकर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलुओको देखकर लीखि है. हर सार्वजनिक काम कर रहे पुरुष और महिला को उसे पढने की जरूरत है. और नाम भी कितना यथायोग्य है’ सेकंड सेक्स’. अस्सी के दशकके शुरूआती दौर में बिहार में जेपी आंदोलन के कारण आना-जाना शुरू हुआ था. और वहाँ पर तो हमारे समाजवादी, गाँधी-विनोबा के अनुयायी मित्रों के घरों में पहुंचने के बाद देखा कि खाना, चाय-पानी सब कुछ बराबर आ रहा है, लेकिन बनाने वाले हाथ कही नहीं दिखाई देते थे. आज भी पचास साल से अधिक समय हो रहा है. और हमनें हमारे कुछ मित्रों की जीवन संगिनीयों के दर्शन नहीं किया है.
हालाँकि बिहार आंदोलन के नेता जयप्रकाश नारायण और उनकी पत्नी प्रभावतीजी की जोड़ी महात्मा गाँधी-कस्तूरबा जैसा ही, बिहार के सार्वजनिक जीवन में लोगों ने देखा है. लेकिन यह अपवाद छोड़ दे तो बिहार -उत्तर भारत के सभी प्रदेशों में महिलाओं की स्थिति आज भी बहुत अलग नहीं है. एक समाजवादी नेताजी की अभी कुछ लोग जोरशोर से शताब्दी मना रहे हैं. वह कभी कुछ समय के लिए देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी चले गए थे. और उनके पुश्तैनी घर पर मृणाल ताई गोरे और कुछ महिलाओं को जाने का मौका मिला था. मृणाल ताई गोरे ने मुझे बताया कि बैठक के कमरे में शामिल हम कुछ बाहरी महिलाओं को छोड़कर औरतों की कमी मुझे खल रही थी, तो मै महिला होने का फायदा उठाकर घर के अंदर चली गई थी. और घर की महिलाओं के साथ जानबूझकर मिली. और बातचीत से पता चला कि उसमें कोई एम ए तो कोई ग्रेजुएट थी. लेकिन उन्हें बैठक में आने की मनाही थी. और आपको भी याद आ रहा होगा कि उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनकी पत्नी को कभी भी किसी सार्वजनिक जीवन में नहीं देखा होगा. हालाँकि वह उत्तर भारत के आचार्य नरेन्द्र देव के और जयप्रकाश नारायण जी के मानस पुत्र खुद को कहलाते थे.


भागलपुर दंगेके बाद का काम करते वक्त 1990-91 के दरम्यान हमारे टीम को ज्यादा समय मुस्लिम बस्तियों में अक्सर जाना पडता था. क्योंकि सबसे ज्यादा तबाही मुसलमानों की ही हुई थी. औरतो को वहां के घरों के झरोखे से कुछ आँखे हम लोगों को बहुत ही गौर से देखने के लिए इकट्ठा होते हुए हमनें देखा था. लेकिन उन्हे पडदे मे रहने की वजह से हमने उन महिलाओं को कभी भी नहीं देखा. लेकिन वहा की खातिरदारी मे कोई कमी नहीं होती थी. लेकिन व्यंजनों को बनाने वाले हाथ कभी दिखाई नहीं दिए.
भागलपूर दंगो के बाद (1990) हम लोगों के साथ शांति सद्भावना के लिए कलकत्ता और शांतिनिकेतन से मिलकर अक्सर आना – जाना करने वाली महिलाओं में शामिल मनीषा बॅनर्जी, वाणी सिन्हा, शामली खस्तगिर और वीणा आलासे ने मिलकर एक बार मुझे कहा कि राजपूर नाम के मुस्लिम बहुल गाँव में एक्सक्लूसिव रूपसे सिर्फ महिलाओं की बैठक किसी के घरके छत पर श्याम को आयोजित की गई है. और उस बैठक को संबोधित करने का काम मुझे सौंप दिया गया था. मैंने छत पर चढने के बाद देखा कि मनीषा, बाणीदी, श्यामलीदी और वीणादी छोडकर बाकी सभी महिलाओं ने बुर्का पहना हुआ था. लेकिन मेरे संबोधन की शुरुआत होते ही मैनें देखा कि, लगभग सब बुर्के के चेहरे पर से बुर्के का कपड़ा सर पर उठाया हुआ, और मेरी तरफ गौर से देख रहीं हैं. यह नजारा देखकर मै खुद झेंप गया था. और बादमे अंधेरा होने तक हमारी बैठक बहुत ही सुंदर और काफी खुशनुमा माहौल में चली थी. और सबसे अहम बात उस बैठक में शामिल काफी महिलाओं ने हमें घरों में बैठ कर कुछ ऐसा काम चाहिए जिससे कि हम हमारे परिवार को चलाने के लिए सक्षम हो सकेंगे.

वैसेही पंद्रह साल पहले अलिगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ‘मौलाना आजाद स्मृति भाषण’ के लिए गया था, तो मुख्य भाषण केनेडी हाल ही में हुआ था,और मैंने देखा की सभी विद्यार्थियों को निचेके हाल में और विद्दार्थीनिया उपर की गैलरी में बैठी थी. उपर नजर दौडाई तो बाल्कनी में मुझे तो सिर्फ बुर्के ही बुर्के नजर आ रहे थे. दूसरा दिन मेरे पास अतिरिक्त था तो मैंने विश्वविद्यालय देखने की इच्छा जाहिर की. मुझे मेरे मेहमान नवाजी के लिए कोई प्रोफेसर साहब की विशेष ड्यूटी लगाई गई थी. और वह सुबह के नास्ते के बाद मुझे विश्वविद्यालय की गाडी में बैठाकर घुमा रहे थे. तो सर सैय्यद अहमद साहब की मजार पर भी लेकर गये थे. और वहा से पैदल चल कर वापस आ रहे थे, तो एक शेरवानी पहने हुए बुजुर्ग सज्जन आकर बहुत ही विनम्रता से दुआ-सलाम कर ने के बाद बोले कि “मै इस्लामिक स्टडीज़ के डिपार्टमेंट का हेड हूँ, और कल के आपके भाषण से बहुत प्रभावित हूँ. क्या आप अभी व्यस्त ना हो तो हमारे डिपार्टमेंट में कुछ देर गुफ्तगू के लिए आ सकते ?” तो मैंने कहा कि “आज मै सिर्फ विश्वविद्यालय में तफरीह कर रहा हूँ. तो चलिए आपके डिपार्टमेंट में भी कुछ समय के लिए आता हूँ . ” और इसतरह ऊनके साथ हो लिया, और जब उनके डिपार्टमेंट में पैर रखा तो बहुत ही छोटा-सा हाल में बुर्के मे बैठी हुई विद्यार्थीयों से कमरा खचा – खच भरा हुआ था. और हेड ने कहा कि ” कल आपने पूरे विश्व के ही मुसलमानों को कैसे एक योजना बद्ध तरीके से पोलिटिकल इस्लाम के नाम पर टारगेट किया जा रहा है. और यही कारण है कि हमारे डिपार्टमेंट की यह बच्चीया जो कल आपका भाषण गैलरी से सुनने के बाद आपके भाषण के मजमून को लेकर कुछ सवालात पुछना चाहती हैं. इसलिए जैसे ही मैंने आपको मरहूम सर सैयद साहब की मजार पर जाते हुए देखा तो आपको यहां चलने की जहमत उठाने की तकलीफ दी है. ” मैंने कहा ” तकलीफ नहीं आपने मेरे उपर उपकार किया है. क्योंकि 20 सालो से हिंन्दू-मुस्लिम के मसले पर ही मेरा भागलपुर दंगेके बाद का काम होने के कारण और उसमें भी विशेष रूप से महिलाओ पर मेरा ज्यादा ध्यान है. क्योंकि किसी भी दंगेके और युद्ध के जख्म महिलाओं को ज्यादा सहने पडते हैं. और मैंने देखा की यहाँ के हॉल में भी सभी बच्चियों ने अपने बुर्के चेहरे पर के उपर उठा दिए थे. और सभी लडकियों के साथ कम-से – कम दो घंटे से ज्यादा समय के लिए बहुत ही गंभीर बहस चली थी. जबकि मेरे होस्ट प्रोफेसर साहब ने जब मुझे बताया कि टीचिंग स्टाफ के साथ आपके दोपहर के खाने और उनके साथ बातचीत का समय हो गया है. तब कहीं उन बच्चियो के साथ लगातार बात चल रही थी. सभी बच्चियां एम ए की थी और उनमे से कुछ बच्चियों ने कहा कि हमे बादमे भी रिसर्च करना है. इसलिए उन्होंने मेरे ईमेल और फोन नंबर भी लिए थे. दुनिया कि आधी आबादी महिलाओं की होने के बावजूद कम-अधिक प्रमाणमे सभी जगहों पर महिलाओं की स्थिति आज भी काफी गैरबराबरी की है.

और उसकी ही उपज सेक्स ट्रेड हा यह एक इंडस्ट्री में तब्दील हो गया है. मुझे याद आ रहा है (1993-94) मे नेपाल की राजधानी काठमांडू मे ह्यूमन राइट्स ( हूँरोन ) के संमेलन में शामिल होने का मौका मिला था. और उसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरीजा प्रसाद कोईराला ने कीया था. और मुझे भी बोलने का मौका मिला था. तो मैंने मेरे भाषण में सिर्फ अन्य वक्ता राजशाही, पुलिस, सेना की ज्यादतियों को लेकर बोले रहे थे. इसलिए मेरी बारी आई तो मैंने कहा कि ” आप ने मेरे पहले के सभी वक्ताओ को सरकार, राजपरिवार और उनके द्वारा किया जा रहा जुल्म, अत्याचार एवं शोषण के अनेकानेक निंन्दनीय कृत्यों से अवगत कराया गया है. लेकिन मै भारत से आया हूँ, और कलकत्ता से हूँ. और मुलताह महाराष्ट्र से हूँ. मैंने एक बात बचपन से ही नोटिस की है, कि भारत के कस्बे से लेकर कलकत्ता, मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों के वेश्यालयों में काफी बडी संख्या में नेपाल की बच्चीयोको देखा हूँ. और हूरोन के चिंता-चिंतनके आसपास भी मैनें इस विषयपर किसी को भी नहीं देखा क्या महिलाऒं का इस्तेमाल के इस तरह सेक्स ट्रेड के लिए चल रहा है. क्या यह भी मानवाधिकार का हनन नहीं हो रहा है? यह मेरे लिए बहुत ही हैरानी की बात लगती है. और अब तो राणाशाही खत्म हो चुकी है. और जनतंत्र की शुरुआत हुई है. तो मै माननीय प्रधानमंत्री महोदय से उम्मीद करता हूँ कि अब इन सभी महिलाओं का व्यापार बंद करने के लिए विशेष रूप से प्रयास होना चाहिए.
तो मेरे भाषण के तुरंत बाद ही फिरसे प्रधानमंत्री गिरीजा प्रसाद कोईराला जीने माईक पर आकर मेरा नाम लेकर घोषित कर दिया की “मै डाॅ. सुरेश खैरनार जी को आश्वासन देता हूँ कि यह प्रथा समाप्त करने के लिए विशेष रूप से मेरे सरकार के तरफसे मै कोशिश करूँगा.” और रातको खाने के निमंत्रण के साथ नेपाल महिलाओं के संघठन ने कहा कि डॉक्टर सुरेश आप पहले ही व्यक्ति को हमने इस अधिवेशन में नेपाल की महिलाओं के सवाल पर बोलते हुए देखा इसलिए हम आपको विषेश रूप से हमारे संघठन मे बोलने और उसके बाद रात के खाने के लिए आपको आना है .


वैसे ही कश्मीर और फिलिस्तीन में मैंने महिलाओं को हर क्षेत्र में काम करते हुए देखा है. और वह कहीं भी पुरुषों से कम नहीं लगी. वही इराक, इराण और टर्की के कुर्दिश बहुल त्रिकोण के इलाके जो टोटल कुर्दिसस्थान भी कहा जाता है, वहां से हमारी यात्रा जाते हुए हमनें देखा है. और महिलाओं को जीन्स- टी शर्ट पहने हुए लडाई से लेकर गाडी-घोडे पर आसीन होकर चलाते हुए देखा है. और वह भी जीवन के हर क्षेत्र में काम करते हुए देखा है. और वह आजकल इसीस के सेना के साथ भी लोहा ले रही है. अबू बक्र बगदादि के सेना को पहले इन्ही कुर्रदिश महिलाओं ने पछाड कर पीछे ढकेला था. तो मैंने उनका अभिनंदन का मेल किया था तो तुरंत उन्होंने लिखा था कि वहाँ बैठे-बैठे सिर्फ अभिनंदन ही करेंगे ? हमारे साथ आइये. तो मैंने जवाब में लिखा था कि मै 60 पार कर चुका हूँ.

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