जब हम, प्रवासी कुकु पक्षी का हर वसंत में कुहूँ – कहुँ की किलकारियाँ सुनते हैं. और सलमोन और हिलसा (इलिश) मछली साल में एक बार समुद्र से हरसाल मीठे पानी के तरफ प्रवास करती है.तो हम होमोसेपियन्स यह भूल जाते हैं कि, हमसे ज्यादा प्रवासी प्राणी, पृथ्वी पर कोई और दुसरा नही है. और विश्व के गोरे, काले, पिले तथा विभिन्नताओं के नाक-नक्शो के जो भी लोग हैं. और जिस किसी भी भूभाग में, वर्तमान समय में, निवास कर रहे हैं. सभी के सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं. जिसे मानववंशशास्त्र की भाषा में होमो सेपिएन्स कहा जाता है. वह शुरुआत में अपने आपको अनाथ समझते थे. लेकिन वास्तव में पुच्छहिन वानर या कपि (ग्रेट एप्स) नामसे पहचानें जाने वाले प्राणी के हम वर्तमान सदस्य हैं. इनमे से फिलहाल जिवंत चिपांझी, गोरिला, ओरांग – उटांग इनका शुमार होता है. चिपांझी अपने सब से नजदीक पारिवारिक सदस्यों में से एक है. अंदाजन साठ लाख वर्ष के पहले महावानरो की मादी को दो लड़कियां हुई उसमे से एक के वंशज चिपांझी बने तो दूसरी हमारी दादी मां बनी जिसका नाम लुसी है. जिसके शरीर के अवशेष एक लाख साल पहले अफ्रीकी देश केनिया में मिले हैं. मतलब हमारी ग्रेट – ग्रेट दादी मां के हम सभी विश्व के लोग एक ही वंश के है. और केनिया से प्रवासी मजदूरों के जैसे पूरे विश्व में फैले हैं. और वहां की आबोहवा और खानपान की वजह से हमारे शरीर के रंग आकार तथा नाक-नक्शो में फर्क पड़ा है. अन्यथा हमारी सभी के डीएनए परीक्षण के बाद जो तथ्य सामने आए हैं. उनके हिसाब से वर्तमान समय में विश्व भर में जो भी लोग रह रहे हैं. वह सभी के सभी होमोसेपिएन्स है. आसाम के विद्वान विष्णु प्रसाद राभा के संशोधन के अनुसार, आसाम के पहले कोलंबस बोले जाने वाले लोग, कर्बि जाती के आदिवासी है. उनके पहले खासी जाती के, उसके भी पहले दक्षिण पूर्व एशिया कांम्पुचुआ और लाओस के पहाडियों से आकर बसे हैं. जिन्हें मॉम खमेर बोला जाता है. वैसे ही मिसिंग वंश के लोग अरुणाचल से होते हुए आसाम मे बस गए हैं.
आज सबसे ज्यादा चर्चा में जो बोडो लोग हैं. वह भी तिब्बत से नेपाल, भुतान और उत्तर बंगाल से होते हुए आसाम में आकर बसे हैं. और सबसे प्रभावी ओहोम 13-15 शताब्दी में जिन्होंने छ सौ साल इस क्षेत्र पर राज किया था. वह बारहवीं शताब्दी के अंत में, उनके युद्ध कौशल के वजह से मंगोलिया से आकर आसाम में आकर लगभग छह सौ वर्ष राज किए है.

इसके अलावा बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश तथा पडोसी बंगाल से भी विभिन्न प्रकार के कामों के लिए काफी बडी संख्या में लोग अपने जीवन यापन करने के लिए आसाम जैसे विलक्षण प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रदेश में बस गए हैं. उदाहरण के लिए सिर्फ चाय बागान के कामों से संबंधित, आसाम के लिये आए हूए लोगों की जनसंख्या तीन करोड़ आसाम की आबादी में, बिहार – झारखंड तथा छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुल लोगों की संख्या एक करोड़ से अधिक है.
1980 के दशक में, आसाम के आसु नामके विद्यार्थियों के संघठन ने, आसाम में मुल निवासियों के अलावा, और भी लोगों के आसाम में आकर बस जाने के खिलाफ इस आंदोलन की शुरूआत की थी. क्योंकि आसाम घने जंगलों, और सदियों पुरानी चाय के बगानो की खेती और लकड़ियों को प्रक्रिया करते हुए, उनसे प्लाइवुड बनाने के कारखाने, और बाद में नैसर्गिक तेल की खोज में, तेल मिलने की वजह से, तेल तथा अन्य खनिज पदार्थों के खनन के लिए, शेकडो सालों से आसाम के बाहरी राज्यों से मजदूरों को लाकर उनसे यह सब काम करने के लिए, कम-से-कम आसाम की आधी से भी अधिक आबादी आसामियो से ज्यादा हो गई है.

उस वजह से मुल निवासीयो में असुरक्षा की भावना पैदा होने की वजह से, 1980 में आसाम स्टुडंट्स युनियन ( आसु ) जो 1980 में आसाम की सब से प्रभावशाली युवा संघठन था. यहातक की गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भी उसिका दबदबा था. हम अस्सी के दशक में पहली बार आसाम सिर्फ आसु द्वारा जारी आंदोलन को देखने समझने के लिए, विशेष रूप से, गुवाहाटी विश्वविद्यालय के होस्टल में आंदोलनकारियों के साथ रह रहते हूऐ सभी प्रकार के विद्यार्थियों के साथ बातचीत करने के लिए हम भी उसी होस्टल में ठहरे थे.
एक असमिया वरिष्ठ प्रोफेसर से बातचीत में, उन्होंने कहा कि “हम असमिया लोग बहुत ही आराम पसंद लोग हैं. सभी प्रकार के मेहनत का काम गैर असमिया लोग ही करते हैं. जिस दिन यह सभी चले जायेंगे, उस दिन के बाद हम लोग भुके रह जायेंगे. “
आसाम के प्रकृति में सुपारी का उत्पादन बहुत बडी मात्रा में होता है. लेकिन सुपारी के ब्यापारी ज्यादा तर मारवाड़ी लोग ही है. वैसे ही चाय बागान जो लाखों हेक्टेयर भूमि पर आसाम के प्राकृतिक सौंदर्य में वृद्धि करते हैं. उनके भी ज्यादा तर मालिक मारवाड़ी समाज के लोगों ही है. और इनमें से शायद ही कोई आसाम में रहते हैं. ज्यादा तर कोलकाता में ही रहते हैं. और इसिलिये टी बोर्ड का कार्यालय भी कोलकाता में ही है. वहीं हाल प्लाइवुड उद्योग का उसके भी ज्यादा तर मालिक मारवाड़ी ही हैं. और इन सभी उद्योगों में मजदूर वर्ग के लोग भी ज्यादा तर आसाम के बाहर के हैं. बंगाल आसाम का पड़ोसी राज्य होने की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादातर बंगाली लोगों की संख्या अधिक है. वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर, शिक्षक तथा विभिन्न सरकारी विभागों में बाबुओं से लेकर उनके अफसरों में भी बंगाली लोग अधिक है. इस कारण असमिया भाषा बंगाली लिपि में लिखी जा रही है. और असमिया भाषा में बंगाली शब्दों का प्रयोग काफी मात्रा में किया जा रहा है.
भारत की आजादी के बाद कम-अधिक प्रमाण में भारत के काफी प्रदेशों में प्रादेशिक भावना हिलोरें मारने लगी तो मद्रास प्रांत के विभाजन के बाद, आंध्र प्रदेश का निर्माण हुआ. वैसे ही मराठी अस्मिता साठ के दशक में आंदोलन की शक्ल लेने की वजह से, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक इन तीनों राज्यों की निर्मिति हुई. फिर बाद में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश. और इक्कीसवी शताब्दी के शुरु में छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, आसाम के विभाजन से मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल जैसे राज्यों की निर्मिति हुई.
स्वतंत्रता के बाद लगभग दोगुना राज्य हमारे देश में बने. लेकिन बेरोजगारी, गरीबी, भाषाई तथा सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर कमअधिक प्रमाण में भारत के सभी प्रदेशों में असंतोष जारी है. और वर्तमान समय में मणिपुर की समस्या कुकीआदिवासी और मैती गैरआदिवासीयो की दिन-प्रतिदिन उग्र से – और उग्रता की तरफ बढते जा रही है. अब तक तीन हजार से अधिक संख्या में लोगों की मृत्यू हुई है.

और प्रवासी मजदूरों की समस्या कोरोना के समय संपूर्ण विश्व के सामने उजागर हुई है. सरकार आंकड़ों को जानबूझकर छुपाने की कोशिश कर रही है. लेकिन अन्य सुत्रो के मुताबिक यह आँकडा कम-से-कम दस करोड़ के आसपास का है. जो आजादी के 79 साल के बावजूद हर राज्य अपने राज्य के लोगों को पर्याप्त मात्रा में रोजगार नहीं दे पाने की वजह से लोगों को मजबूर होकर अपने जन्मस्थान से हजारों किलोमीटर दूर बिहार से केरला बंगाल से महाराष्ट्र तथा दक्षिणी प्रदेशों में. और वही हाल दक्षिणी प्रदेश के लोगों को अन्य प्रदेशों में अपने उपजीविका के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाने के लिए मजबूर होना पड रहा है.
और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा इस परिस्थिति का फायदा उठाकर असली सवाल लोगों को रोजगार तथा संसाधनों के अधिकार देने की जगह उन्हें जाति – धर्म की आड़ में मातृभूमि और पितृभूमि के गैरवैज्ञानिक पचडो मे उलझाकर राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं. लेकिन इससे ज्यादा लंबा सफर नहीं कर सकते .
जैसे अमेरिका में ट्रंप ने दोबारा सत्ता में आने के बाद तुरंत अप्रवासी तथा टेरिफ युध्द शुरू कर दिया है. लेकिन जैसे ही चीन मेक्सिको तथा कॅनडा ने जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी तो आज ही ट्रंप को यू-टर्न करना पडा था. और अब तो अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने गैरकानूनी करार दे दिया है. नब्बे के दशक में सम्पूर्ण विश्व ही एक है के नारे के साथ ग्लोबलायझेशन की शुरुआत करने वाले भी अमेरिका और पश्चिमी देश ही है. और उससे दूर हटकर सिर्फ अमेरिका की बात करते हूए विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर यूएनओ तथा कई आंतरराष्ट्रीय संस्थानों से निकलने के निर्णय खुद अमेरिका के लिए आत्मघाती होने की संभावना है . इसलिए सिर्फ पितृभूमि – मातृभूमि की गैरवैज्ञानिक लफ्फजी लोगों को भड़काने के लिए अपने राजनीतिक नाकामियों को छुपाते हूऐ, ध्रुवीकरण करने की राजनीति करना हर तरह से गलत है. जो वर्तमान समय में भाजपा के नेता और प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री भी कर रहे हैं. यह हमारे संविधान के खिलाफ है. और इस तरह की चर्चा से देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं.
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