-ममता सिंह, पूर्वोत्तर मामलों की जानकार।
इंफाल/नई दिल्ली। नफरत की आग ने मणिपुर की मिट्टी को फिर लहूलुहान कर दिया है। उखरूल जिले के दो गांवों में बीते दिन हुई भारी गोलाबारी ने राज्य के भविष्य पर एक गहरा काला साया डाल दिया है। यहां कुकी गांव मुल्लम और नगा गांव सिनाकेइथेई गांवों में हुई दो समुदायों के बीच गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हो गई। यह घटना केवल एक झड़प नहीं, बल्कि मणिपुर के संघर्ष में एक खतरनाक मोड़ है। अब तक कुकी और मैतेई समुदाय के बीच जारी इस खूनी संघर्ष से नगा समुदाय ने खुद को दूर रखा था। लेकिन अब नगा और कुकी संगठनों के बीच शुरू हुई यह सीधी जंग बताती है कि हिंसा की लपटें अब उन क्षेत्रों को भी अपनी चपेट में ले रही हैं जिन्हें सुरक्षित माना जा रहा था। यह नया घटनाक्रम सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। नगा समुदाय का इस विवाद में सीधे तौर पर खिंच आना राज्य को एक विनाशकारी त्रिकोणीय संघर्ष की ओर धकेल सकता है।
बिष्णुपुर जिले के मोइरांग त्रोंगलाओबी में इसी माह के प्रथम सप्ताह में हुई दो बच्चों की दुःखद मौत के बाद पूरी घाटी में लोगों का आक्रोश और तनाव कम हुआ ही नहीं था कि नागा बहुल जिले उखरूल से आई खबर ने मानवता को शर्मसार कर दिया। बीते घटनाक्रम पर नजर डालें तो यह बात स्पष्ट होती है कि तमाम सरकारी मशीनरी के साथ ही सुरक्षा एजेंसियों के मजबूत घेरे में बीच भी व्यक्ति अपने घरों के भीतर भी सुरक्षित नहीं है। हुआ यूं कि 6-7 अप्रैल की दरमियानी रात को मोइरांग त्रोंगलाओबी इलाके में एक घर पर संदेहास्पद बम या रॉकेट से हमला किया गया। रिहायशी इलाके पर किए गए इस बम हमले में दो मासूम बच्चों की मौत हो गई। यानी पांच साल का एक बालक और महज छह महीने की एक बच्ची, जो अपनी मां की आंचल में सुरक्षित होने चाहिए थे, नफरत के बारूद में स्वाहा हो गए। इस हृदयविदारक घटना ने मैतेई समुदाय के सब्र का बांध तोड़ दिया है। घाटी के जिलों में उबाल है। लोग सड़कों पर हैं। सरकार ने पांच जिलों में कर्फ्यू लगा दिया है और इंटरनेट सेवाएं बंद हैं। हालांकि, बीच बीच में नियम में सरलीकरण भी किए जा रहे हैं, जैसे कर्फ्यू-इंटरनेट सेवाएं खोली और बंद की जा रही हैं। पाबंदियों का यह दौर बताता है कि राज्य में लोकतंत्र की वापसी और नई सरकार के गठन के बावजूद जमीन पर स्थिति अब भी अनियंत्रित है।
नगा और कुकी समुदायों के बीच जारी तनाव पर स्थानीय संगठनों से बातचीत के बात जो बातें सामने आ रही हैं उसके अनुसार, दोनों ही समुदाय एक-दूसरे को जिम्मेदार बता रहे हैं। बताया जा रहा है कि मणिपुर के उखरुल जिले का लिटान गांव (Litan Village) में फरवरी 2026 में कुकी और नागा जनजातीय समूहों के बीच हिंसक झड़पों के कारण गंभीर तनाव का केंद्र बना रहा। लिटान गांव जो इंफाल और उखरुल के बीच स्थित है, फरवरी में यहां 30 से अधिक घरों को आग लगा दी गई, जिससे व्यापक अशांति पैदा हुई। इस हिंसा के कारण क्षेत्र में यातायात भी हफ्तों बाधित रहा।
कुकी-नगाओं के बीच बढ़ रहे तनाव पर स्थानीय लोगों की मानें तो पहले तनाव में दोनों समुदाय के विलेज वालंटिरर्स निशाने पर रहे, फिर गांव बूढ़ा यानी ग्राम प्रधान तक बात पहुंची और फिर आमजन भी जुड़ते गए और जब मामला तोड़फोड़ और आगजनी तक पहुंचा तो दोनों ही समुदायों से जुड़े विद्रोही संगठनों ने कमान संभाल ली। सबसे चौंकाने वाली बात जो देखने को मिल रही है कि विद्रोदी संगठन के लोग सैनिक वर्दी में सशस्त्र निगरानी करते हुए से प्रतीत होते हैं!
यह बात निश्चित तौर पर चिंता में डालने वाली है कि में जब पहले से ही कुकी-मैतेई समुदाय का तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा और अब कुकी और नगा समुदाय के लोगों के बीच भी तनाव बढ़ने की स्थिति है ऐसे में नई सरकार और मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के लिए इस त्रिकोणीय होते संघर्ष को रोकना आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती दिख रही है। चुनाव के बाद उम्मीद थी कि राज्य में संवाद का दौर शुरू होगा, लेकिन हकीकत इसके उलट है।

मासूमों का लहू और नगा समुदाय की एंट्री से दहकती घाटी: Tronglaobi killing incident के संबंध में न्याय की मांग करते मशाल निकालतीं महिलाएं। Photo Credit: ANI/File
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विद्रोही संगठनों तक पहुंचने वाले आधुनिक हथियारों की सप्लाई लाइन को काटना है। रिहायशी इलाकों में ड्रोन और रॉकेट का इस्तेमाल होना यह साबित करता है कि विद्रोही संगठनों के पास अब सैन्य स्तर के साजो-सामान मौजूद हैं। जब तक इन हथियारों की आवक नहीं रुकती, तब तक कोई भी शांति समझौता स्थायी नहीं हो सकता। इसके अलावा, नई सरकार के लिए नगा समुदाय को इस हिंसा से दूर रखना एक बड़ी प्रशासनिक और कूटनीतिक चुनौती है। यदि नगा समुदाय पूरी तरह इस संघर्ष का हिस्सा बनता है, तो मणिपुर की जटिल जनसांख्यिकी इसे संभालना नामुमकिन बना देगी।
मणिपुर में शांति की राह अब केवल बंदूकों और सुरक्षाबलों के साये में नहीं तलाशी जा सकती। राज्य में विश्वास का पूरी तरह से अकाल पड़ चुका है। मैतेई समुदाय अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित है, तो कुकी समुदाय अपनी अलग पहचान और प्रशासनिक स्वायत्तता की मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब इस समीकरण में नगाओं की सक्रियता ने उलझन को और अधिक पेचीदा बना दिया है। सच तो यह है कि नई सरकार की नीतियां अब तक केवल आग बुझाने तक सीमित रही हैं, जबकि जरूरत उस जड़ को खोजने की है जहां से नफरत का यह पौधा खाद-पानी पा रहा है। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और अस्थिरता को हवा देने वाले बाहरी तत्व इस आग को बुझने नहीं देना चाहते।

सुलगता मणिपुर: राज्य में शांति बहाली की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन करते लोग।… Photo Credit: PTI/File
बहरहाल, मणिपुर अब उस दोराहे पर है जहां से वापसी का रास्ता केवल साझा संवाद की मेज से होकर गुजरता है। नगा समुदाय, जो अब तक इस संघर्ष की परिधि पर था, उसका प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल होना पूरे पूर्वोत्तर के लिए एक ‘डेंजर सिग्नल’ है। शांति की कागजी अपीलें अब बेअसर हो चुकी हैं; अब जरूरत एक ऐसे ‘त्रिकोणीय शांति फार्मूले’ की है जिसमें मैतेई, कुकी और नगा यानी तीनों समुदायों की सुरक्षा और पहचान की गारंटी हो। सरकार को समझना होगा कि जब तक मोइरांग के उन दो मासूमों के कातिलों को सजा और उखरूल की पहाड़ियों को सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक जनता का भरोसा बहाल नहीं होगा। मणिपुर को बचाने के लिए कड़े फैसलों के साथ-साथ एक ऐसे मरहम की जरूरत है, जो नफरत की इस आग को बुझा सके। यदि अब भी सामूहिक प्रयास नहीं हुए, तो नगा-कुकी-मैतेई का यह अनसुलझा तनाव मणिपुर को उस अंधेरे युग में धकेल देगा जहां से वापसी संभव नहीं होगी। मणिपुर को केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली राजनीति से ही बचाया जा सकता है।
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