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मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूँ :बिंबों, प्रतीकों और रूपकों से समृद्ध काव्यप्रदेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सशक्त पैरोकारी | Pavitra India

प्रो.ऋषभदेव शर्मा:

अनामिका अनु को जितना मैं उनकी पिछली किताबों और इस पुस्तक ‘मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूँ’ के माध्यम से जान सका हूँ, उससे यह बात स्पष्ट होती है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की घोर पैरोकार हैं। वे लोकतांत्रिक मूल्यों पर बल देती हैं। अपने वक्तव्यों में भी और अपने लेखन में भी—चाहे उनका गद्य हो या पद्य, कहानी हो या कविता—वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित दिखाई पड़ती हैं।

उन्होंने एक बहुत सुंदर बात कही है कि आत्म-अभिव्यक्ति के साथ-साथ दूसरों की अभिव्यक्ति का भी सम्मान होना चाहिए। यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम आत्म-अभिव्यक्ति की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन वास्तविक आवश्यकता आत्म के साथ अन्य अभिव्यक्तियों का भी सम्मान करने की है। अनामिका अनु आत्म और अन्य—दोनों की अभिव्यक्ति का सम्मान करने वाली कवयित्री हैं।

जब हम इस पुस्तक की बात करते हैं, उसके शीर्षक की बात करते हैं या शीर्षक कविता की चर्चा करते हैं, तो ‘दीवार’ और ‘खिड़की’ के माध्यम से उन्होंने संकेतों में ही यह कह दिया है कि यह केवल एक दीवार नहीं है; दीवारें अनेक हैं। उसी प्रकार खिड़की भी एक नहीं, अनेक खिड़कियाँ हैं। विभिन्न प्रकार की विसंगतियाँ, नीति-नियम, कानून और परतंत्रताएँ—ये सब हमें कैद करने वाली दीवारें हैं। इन दीवारों में एक रोशनदान, एक खिड़की, एक जाली या एक दरवाज़ा—यही कविता है। यह उसकी एक व्याख्या हो सकती है। लेकिन मनुष्य की मुक्ति के जितने भी प्रयास हैं, वे सभी इन खिड़कियों के समान हैं, और कवयित्री स्वयं को इन प्रयासों के साथ खड़ा करती हैं। इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।

हाशिए पर खड़े, निराश लोगों के बीच उम्मीद जगाने की बात उन्होंने बड़े संकेतपूर्ण ढंग से कही है। मजदूरों, स्त्रियों, आम लोगों, छोटे बच्चों आदि की चर्चा उनकी कविताओं में मिलती है। इससे स्पष्ट होता है कि यदि हम समकालीन विमर्शों की भाषा में देखें, तो आज के लगभग सभी हाशिए के विमर्श किसी न किसी रूप में उनकी रचनाओं में उपस्थित हैं।

अनामिका अनु ने मजदूरों, स्त्रियों, आम लोगों, प्रदेशों और स्थानों से लेकर जीवन के विविध पक्षों पर कविताएँ लिखी हैं। उनकी कविताओं का विषय-क्षेत्र अत्यंत व्यापक है।

अनामिका अनु पहले से ही लंबी कविता की सिद्धहस्त कवयित्री के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। इस संग्रह में उन्होंने छोटी कविताएँ लिखी हैं। हम सभी ने इस बात की ओर ध्यान दिया कि वे भाषा के प्रयोग में अत्यंत सरल शब्दों के माध्यम से अधिकतम अर्थ व्यक्त करने की सामासिक शक्ति से संपन्न कवयित्री हैं।

मैं कहना चाहूँगा कि शैली की दृष्टि से वे अत्यंत सजग रचनाकार हैं। वे किसी एक झोंक या आवेग में नहीं लिखतीं। उनकी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि वे शब्दों को गहराई से मथती हैं, उन्हें सावधानीपूर्वक चुनती और परखती हैं, तब कहीं जाकर उन्हें कविता में स्थान देती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ बिंबों, प्रतीकों और रूपकों से समृद्ध हैं।

कविता के संबंध में संभवतः शुक्ल जी ने कहा है कि कविता में अर्थ-ग्रहण से पहले बिंब-ग्रहण होता है। उस दृष्टि से यदि हम इन रचनाओं को देखें, तो ये बिंब-प्रधान रचनाएँ हैं और इन्हें उसी रूप में देखे जाने की आवश्यकता है। अर्थ तो अपने-आप खुलते जाते हैं। जब आप रचना को पढ़ते हैं, तो उसके संदर्भ और अर्थ क्रमशः उद्घाटित होते जाते हैं।

एक प्रयोग की ओर मैं विशेष रूप से ध्यान दिलाना चाहता हूँ। असल में, हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग हैं और हमें कुछ शब्दों के ऐसे प्रयोग या मुहावरे मिले होते हैं, जो मन में चिपक जाते हैं। हमारे यहाँ एक मुहावरा है—”उम्मीद से होना।” इसका अर्थ गर्भवती होना माना जाता है। अर्थात् “अमुक उम्मीद से है” यानी वह गर्भवती है। यहाँ “उम्मीद” का अर्थ है—संभावना।

यह बहुत सुंदर प्रयोग है कि गर्भ जैसे रूपक को, जाने-अनजाने, कवयित्री ने संभावना के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘पानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती है’ कविता में उन्होंने इसे किसान, खेत, फूल और रोशनी के साथ जोड़ते हुए प्रेम और विरह की बात कही है।

एक और महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने कही कि इन सब रचनाओं के केंद्र में कोई-न-कोई एक बिंदु है और कवयित्री उसी बिंदु के साथ खेलती है। यह बिंदु कभी दो-चार पंक्तियों तक सीमित रहता है और कभी एक-दो पृष्ठों तक विस्तृत हो जाता है।

उन्होंने किसान के बोए हुए खेत की बात की। यह बड़ा अच्छा प्रयोग है। खदान-मज़दूर के फेफड़े की बात उन्होंने कही। चित्रों की जो चर्चा थी, उसी क्रम में “वह मौत को जी जाएगा” जैसा प्रयोग भी आता है। यह किसी खतरनाक कविता की तरह अत्यंत काव्यात्मक प्रयोग है। ऐसे अनेक काव्यात्मक प्रयोगों से भरी हुई इस रचना के लिए मैं अनामिका अनु को बधाई देता हूँ।

हर कवि कविता के बारे में एक वक्तव्य अवश्य देता है—चाहे वह नया कवि हो या पुराना, छोटा हो या बड़ा। इसे अपने-आप में एक अलग विधा समझिए, जिसे हम मेटा-पोएट्री कहते हैं। अर्थात् कविता के बारे में कविता।

असल में, यही किसी रचनाकार की कसौटी भी होती है कि कविता के संबंध में उसकी जो मान्यताएँ हैं, उन्हीं पर उसकी रचनाओं को रखकर देखा जाना चाहिए।

इस दृष्टि से यदि मैं इनकी मेटा-कविताओं की बात करूँ, तो खंड दो की शीर्षक कविता “मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूँ” इस संग्रह की केंद्रीय कविता है। इसमें कवयित्री स्वयं कविता-लेखन की प्रक्रिया को रूपकात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। यहाँ दीवारें विभिन्न प्रकार की सीमाएँ हैं—दमन हैं, यथार्थ हैं या यथास्थिति (स्टेटस क्वो) हैं; जबकि खिड़कियाँ संभावनाएँ हैं, रोशनी हैं और प्रतिरोध हैं। यह पूरी कविता कविता-लेखन के कार्य को ही अपना विषय बनाती है। अनामिका अनु के इस संग्रह की कविताएँ उनकी स्वयं दी हुई इसी कसौटी पर खरी उतरती हैं।

दूसरी कसौटी मुझे उनकी मेटा-पोएट्री के रूप में खंड तीन के शीर्षक में मिलती है—”कविता ज़िंदगी का लिखत ही तो है।” यहाँ “लिखत” शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अर्थात् जीवन का लिपिबद्ध किया जाना ही कविता है। अब यहाँ यह प्रश्न ही समाप्त हो जाता है कि वह पद्य है या गद्य। जीवन को जब आपने लिपिबद्ध कर दिया, तो वह कविता हो जाता है।

यह पूरा खंड स्वयं एक मेटा-पोएट्री है। इसमें कविता को जीवन की रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। यदि हम इसे इस बात से जोड़ें कि कवयित्री ने कविता या साहित्य की ओर आने का निर्णय किन क्षणों में किया था, तो यह बात उससे सीधे-सीधे जुड़ जाती है।

पृष्ठ 92 पर एक पंक्ति है—”जिसने भी लिखी है एक अच्छी कविता, वह उम्मीद से है।” अब इस “अच्छी” की कसौटी क्या है, यह देखना पड़ेगा। इसकी कसौटी यही है कि वह उम्मीद से है; अर्थात् उसमें भविष्य की अनगिनत संभावनाएँ हैं। पूरे संग्रह की यह सबसे स्पष्ट मेटा-पंक्ति है—”जिसने भी लिखी है एक अच्छी कविता, वह उम्मीद से है।” यहाँ कविता को निराशा या यथार्थवाद से नहीं, बल्कि उम्मीद से जोड़कर देखा गया है।

इसी संदर्भ में एक और पंक्ति है—”यह रात उसे कविताओं के साथ गुजारनी है।” यहाँ कविताओं को जीवन जीने, उसमें डूबने और अस्तित्व को भरने का माध्यम बताया गया है।

इसी प्रकार—”वह मौत को एक खतरनाक कविता की तरह जी जाएगा।” यह जीवन और मृत्यु—दोनों को कविता के रूप में देखने का अत्यंत सुंदर मेटा-प्रयोग है।

एक और रचना है—”सलगी सिल गई।” उसमें एक अत्यंत सुंदर पंक्ति है—”इतने कलात्मक तरीके से दुःख या तो पृथ्वी सिलती है या कविता।” दुःख के कारण जो फटाव आ जाते हैं, उन्हें सिलने का काम कविता करती है। यह अत्यंत शक्तिशाली पंक्ति है। इसमें कविता को दुख को कलात्मक रूप देने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है।

कविता में भी वह कहती हैं— “जब तक लिखोगी, तभी तक जियोगी।” यहाँ “लड़की” शब्द हटा देना चाहिए, क्योंकि यह बात केवल स्त्री के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए है। अर्थात्— “जब तक लिखोगे, तभी तक जियोगे।” यहाँ कविता-लेखन को अस्तित्व और जीवित रहने से जोड़ दिया गया है।

एक अन्य कविता में पंक्ति आती है— “तुम मेरे साथ ख़्वाब में पीना काली कॉफ़ी।” इसी कविता में आगे कहा गया है— “मुझे याद करते हुए तुम कविता लिख सकती हो।” यहाँ स्मृति और कविता के गहरे संबंध को स्थापित किया गया है। कविता स्मृति और विरह का माध्यम बन जाती है।

व्यक्ति-आधारित कविताओं में संत जनाबाई पर लिखी कविता भी उल्लेखनीय है। उसमें जनाबाई अपनी कविता को हथेली पर लिखकर बैकुंठ तक ले जाने की कल्पना करती हैं। यह कल्पना कविता को आध्यात्मिक तथा अमर बनाने वाले मेटा-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करती है।

इस प्रकार अनामिका अनु की कविताओं में मेटा-पोएट्री छिटपुट नहीं, बल्कि व्यापक रूप में उपस्थित है। वे बार-बार कविता लिखने की क्रिया, उसके उद्देश्य, उसकी शक्ति—दीवार को तोड़कर खिड़की बनाना, दुःख को सिलना और उम्मीद पैदा करना—जैसे प्रश्नों को विषय बनाती हैं। इसलिए यह संग्रह मेटा-पोएट्री से अत्यंत समृद्ध है।

संग्रह के तृतीय खंड का शीर्षक “वह उम्मीद से है” तथा “सलगी सिल गई” जैसी कविताएँ मेटा-पोएट्री के सबसे शुद्ध उदाहरण हैं। कवयित्री केवल कविता नहीं लिख रही हैं, बल्कि यह भी निरंतर विचार कर रही हैं कि कविता क्या है, वह क्या करती है और उसे क्यों लिखा जाता है।

अनामिका अनु इक्कीसवीं शताब्दी की कवयित्री हैं। पहली दृष्टि में उनकी कविताएँ छोटी और सरल प्रतीत हो सकती हैं, किंतु उन्हें समझने के लिए हमें कविता की अपनी पारंपरिक समझ को मानो शीर्षासन कराना पड़ता है। जैसा कि गोपाल शर्मा जी कहा करते हैं, इन रचनाओं का धैर्यपूर्वक विखंडन करने तथा उन्हें उत्तर-आधुनिक विमर्श की कसौटी पर परखने की आवश्यकता है।

अनामिका अनु का संग्रह “मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूँ” समकालीन हिंदी कविता में उत्तर-आधुनिक संवेदना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। उत्तर-आधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) मुख्यतः ग्रैंड नैरेटिव्स (महावृत्तांतों) के विखंडन, भाषा की अनिश्चितता, बहुलता (प्लूरैलिटी), इंटरटेक्स्चुअलिटी, आयरनी, सेल्फ-रिफ्लेक्सिविटी, हाइब्रिडिटी तथा हाशिये की आवाज़ को केंद्र में रखने पर बल देती है। अनामिका अनु की कविताएँ इन विशेषताओं पर खरी उतरती हैं। हालाँकि वे पश्चिमी पोस्टमॉडर्निज़्म की नकल नहीं हैं, बल्कि भारतीय और स्त्री-केंद्रित संदर्भ में उसकी स्वदेशी अभिव्यक्ति हैं।

एक-दो उदाहरण देखिए। उत्तर-आधुनिकता ग्रैंड नैरेटिव्स को तोड़ती है और सत्य की अनिश्चितता, अर्थात् एम्बिग्यूइटी (धुंधलापन), को स्वीकार करती है। यह धुंधलापन उत्तर-आधुनिक कला की एक प्रमुख विशेषता है। उत्तर-आधुनिकता प्रगति, प्रेम की शाश्वतता, राष्ट्र और धर्म जैसी महान कथाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

संग्रह के प्रथम खंड में प्रेम को अनुपस्थिति और स्मृति के रूप में देखा गया है। कविता “तुम कभी विदा नहीं हुए” पारंपरिक विरह और प्रेम की महान कथा का विखंडन करती है। यहाँ प्रेम अब निरंतर और शाश्वत नहीं रह जाता, बल्कि खंडित, असंभव और भाषा-निर्भर अनुभव बन जाता है।

कवयित्री पूछती हैं— “मैं प्रेम कैसे करती?” उत्तर में शरीर, अंधापन और मैराथन जैसे विखंडित बिंब सामने आते हैं। “मैं ज्यां पाॅल सार्त्र” जैसी कविता अस्तित्ववाद को इंटरटेक्स्चुअल रूप में ग्रहण करती है, किंतु साथ ही उसका डीकंस्ट्रक्शन भी करती है। सार्त्र, सिमोन, स्वतंत्रता और नास्तिकता—सब कुछ यहाँ तरल (फ्लूइड) और संदिग्ध हो जाता है। इसलिए मैं इसे जटिल संरचना वाली कविता मानता हूँ।

यदि हम विखंडन (फ्रेगमेंटेशन) और बहुलता (प्लूरैलिटी) की बात करें, तो ये कविताएँ अक्सर टुकड़ों में बिखरी हुई प्रतीत होती हैं। छवियाँ, स्मृतियाँ, संवाद और यथार्थ एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।

उदाहरण के लिए कविता कहती है— “चलो, सब मिलकर रोते हैं।” इसे पढ़ते समय मुझे भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पंक्तियाँ याद आती हैं—

“आवहु सब मिलि रोवहु भाई,
हा! हा! भारत-दुर्दशा देखी न जाई।”

यहीं इंटरटेक्स्चुअलिटी का सुंदर उदाहरण उपस्थित होता है।तो चलो, सब मिलकर रोते हैं। सामूहिक दुख के ग्रैंड नैरेटिव को अस्वीकार कर यह कविता व्यक्तिगत, क्षुद्र व्याधियों और रुदन की बहुलता (Plurality) पर ज़ोर देती है।

“मछलियों ने नई ज़मीन तलाश ली है।” मछली यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। रूपकात्मक रूप में वह परिवर्तन और विद्रोह का संकेत देती है, लेकिन कोई निश्चित यूटोपिया नहीं रचती; केवल संभावना का संकेत करती है।

अनामिका अनु की कविताएँ, जैसे “अबोध” और “राधाकृष्णन”, छोटे-छोटे टुकड़ों में यथार्थ को फ्रैगमेंटेड स्नैपशॉट्स की तरह प्रस्तुत करती हैं। यहाँ इंटरटेक्स्टुअलिटी और पेस्टीश (Pastiche) का भी प्रयोग मिलता है। पेस्टीश का अर्थ है—विभिन्न स्रोतों के टुकड़ों या पैबंदों को जोड़कर एक नई रचना तैयार करना।

मैंने पहले भी लिखा है कि “ज्यां पाॅल सार्त्र’ वाली कविता एक इंटरटेक्स्चुअल कृति है। उसमें सार्त्र, सिमोन द बोउवार,फर्डिनेंड,सोरेन कीर्केगार्ड,,लुमुम्बा,फ्रांज़ फ़ैशन,रूसो,काण्ड,सीगेल, मार्क्स आदि अनेक स्रोतों का पेस्टीश दिखाई देता है, मानो अनेक पैबंदों को एक साथ सिल दिया गया हो।

इसी प्रकार “कादंबिनी गांगुली मुझे पसंद है” कविता में मेहदी हसन, गिरिजा देवी, काफ्का, नेरूदा, फ़्रीडा काहलो, नेल्सन मंडेला, मधुबाला और स्मिता पाटिल—सभी एक ही कविता में उपस्थित हो जाते हैं। इन सबके मिश्रण से जो अमलगम तैयार होता है, वह हाई आर्ट और पॉपुलर कल्चर के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देता है। एक ओर मेहदी हसन और गिरिजा देवी हैं, तो दूसरी ओर मधुबाला। यह रचना उसी ब्लरिंग का उदाहरण है।

“राजस्थान” कविता में स्थानीय भूगोल—सिरोही, पुष्कर और अजमेर—व्यक्तिगत इच्छाओं के साथ एक हाइब्रिड रूप में सामने आते हैं।

यदि दृष्टि की बात करें तो शरीर, देह और सीमांत (मार्जिन) का विमर्श बार-बार दिखाई देता है। उत्तर-आधुनिकता मार्जिन को केंद्र में लाती है। कवयित्री स्त्री-शरीर, स्पर्श, छूटे हुए स्पर्श, चुंबकत्व, प्रेम की असंभावना और “घर–बेघर” होने की अनुभूति को केंद्र में रखती हैं। “मेरा कोई घर नहीं” जैसी पंक्ति फ्लुइड आइडेंटिटी और परफ़ॉर्मेटिव स्त्रीवादी दृष्टि को रेखांकित करती है, जो एसेंशियलिस्ट स्त्रीवाद से भिन्न है।

“महामारी”, “बंद स्कूल, मैं और बिल्ली” जैसी कविताएँ महामारी के समय हाशिए पर पड़े बच्चे, बिल्ली और गरीब की आवाज़ बनती हैं। वे किसी हीरो नैरेटिव के बजाय रोज़मर्रा के संघर्ष और जीवित रहने की जिजीविषा को सामने लाती हैं।

“राधाकृष्णन” कविता श्रमिक की थकान को बिना रोमानी बनाए, कच्चे और फ्रैगमेंटेड रूप में चित्रित करती है।

भाषा की दृष्टि से “मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूँ” स्वयं एक मेटाफिक्शनल शीर्षक है। कविता यहाँ दीवार पर खिड़की लिखने का कार्य बन जाती है। भाषा को सत्य का वाहक नहीं, बल्कि खेल और निर्माण का माध्यम माना गया है।

“तुम्हारी खुसफुसाहटों की नन्ही-नन्ही पोटलियाँ”—ऐसे छोटे-छोटे भाषिक बिंबों में ही कविता की वास्तविक शक्ति निहित है। किसी ग्रैंड नैरेटिव या कथावस्तु में नहीं, बल्कि इन भाषिक प्रयोगों में।

अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि अनामिका अनु का यह संग्रह स्त्री-दृष्टि से लिखा गया है, जो पारंपरिक भारतीय और पितृसत्तात्मक प्रेम-धारणाओं को चुनौती देता है। वे प्रेम को विवाह, पवित्रता, त्याग, एकतरफ़ा समर्पण या सामाजिक स्वीकृति की चौखट में बाँधने से इनकार करती हैं। कोई उनसे सहमत हो या असहमत, यह अलग बात है।

वे प्रेम को अनुपस्थिति और अपूर्णता में जीती हैं। पारंपरिक दृष्टि में प्रेम का अर्थ मिलन, विवाह, स्थायी साथ और पूर्णता है; जबकि कवयित्री प्रेम को अनुपस्थिति के आधार पर परिभाषित करती हैं। “तुम कभी विदा हुए ही नहीं” जैसी कविता वास्तविक मिलन की अपेक्षा स्मृति और कल्पना में प्रेम के अस्तित्व पर बल देती है।

“मैं प्रेम कैसे करती?” कविता शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता—कटे हाथ-पाँव या जन्मजात अंधेपन—के बावजूद प्रेम की संभावना को स्थापित करती है। यहाँ प्रेम की पूर्णता और सुखद मिलन वाला ग्रैंड नैरेटिव टूट जाता है।

शरीर, कामना और स्पर्श को कवयित्री पूरी स्पष्टता से स्वीकार करती हैं। मैं इसे “बोल्डनेस” नहीं कहूँगा, बल्कि उनकी वैचारिक स्पष्टता कहूँगा। पारंपरिक नैतिकता स्त्री की कामना को छिपाने, शारीरिक इच्छा को पाप या लज्जा का विषय मानने और स्पर्श को केवल वैवाहिक संबंधों में वैध ठहराने की कोशिश करती है। कवयित्री की कविताएँ इस नैतिक ढाँचे को तोड़ती हैं।

“जिन स्पर्शों से हम चूक गए”, “कामनाओं से भरी आँखें”, “देह में सोया वसंत जागना” जैसी अभिव्यक्तियाँ चुंबन और स्पर्श को प्रकृति के सुंदर बिंबों के माध्यम से अर्थ और सौंदर्य प्रदान करती हैं।

“मैं हर बार तुम्हें लज्जा से बचा लूँगी”—यहाँ प्रेम के क्षणों में आने वाली लज्जा से पुरुष को बचाने वाली शक्ति स्त्री बन जाती है। कामना को इंकलाबी नारा, चुंबन को भँवरा और स्पर्श को आकाश कहकर कवयित्री पवित्रता और नैतिकता की पारंपरिक भाषा को उलट देती हैं।

“चुंबकत्व” कविता में शारीरिक आकर्षण को भौतिकी के सार्वभौमिक नियम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार नैतिक संकोच के स्थान पर प्रकृति और विज्ञान का रूपक सामने आता है।

नियम बनाकर नैतिक संकोच को हटाती है। एक बहुत सुंदर पंक्ति है—”स्पर्श पूर्ण विराम है।” स्पर्श को विराम, समाप्ति और पूर्णता का प्रतीक बनाना, स्त्री को कामनारहित, निरीह या केवल त्यागमयी—उस परंपरागत ‘महान’ भूमिका—से मुक्त करता है।

“स्वतंत्रता, संशय और असमानता का स्वीकार”, “तुम और तुम्हारे संशय”—ये कविताएँ पुरुष के संशय, मौन और जटिलता को बिना किसी आदर्शीकरण के सीधे-सीधे नाम देती हैं।

“तुम मिलना, मैं बुखार का बहाना नहीं करूँगी।” यहाँ पारंपरिक नखरों या संकोच के स्थान पर प्रत्यक्ष और साहसी इच्छा का चित्रण है।

“तुम मेरे साथ ख़्वाब में पीना काली कॉफ़ी।” मैंने पहले भी इसकी चर्चा की है। प्रेम में पूर्ण समर्पण या मालिकाना हक़ के बजाय स्वतंत्रता और कलात्मक दूरी बनाए रखने का आग्रह यहाँ दिखाई देता है।

“सपने में मिलूँगी।” प्रेम को स्वयंभू और उम्मीद से जोड़ने वाली यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पंक्ति है। मैं कहना चाहूँगा कि यह पूरी पुस्तक अनेक सूक्तियों से भरी पड़ी है। “प्रेम स्वयंभू होता है।” प्रेम को किसी बाहरी वैधता—जैसे विवाह या समाज—पर निर्भर न रखकर स्वतःसिद्ध बताना इस कविता की विशेषता है। प्रेम को नैतिक रूप से नियमित संबंधों से अलग, उम्मीद और रचनात्मकता का विषय कवयित्री बनाती है।

फिर से मैं “ज्यां-पॉल सार्त्र” वाली कविता पर आऊँगा। इस कविता में प्रेम को ईर्ष्यारहित, स्वतंत्रतापूर्ण और बौद्धिक समानता वाले रिश्ते के रूप में देखा गया है, जो पारंपरिक पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका के पदक्रम को चुनौती देता है।

इस प्रकार ये कविताएँ पारंपरिक नैतिकता की दीवारों पर खिड़कियाँ लिखती हैं। यहाँ स्त्री न तो शिकार है, न पूज्य देवी; बल्कि वह एक स्वतंत्र, कामनायुक्त, चिंतनशील और रचनात्मक प्रेमी है।

यह काव्यसंग्रह समकालीन स्त्री-विमर्श की एक सशक्त अभिव्यक्ति है।

 प्रो.ऋषभदेव शर्मा

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