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जब खबर बिक गई, और सच हार गया! सत्ता के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता | Pavitra India

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बृज खंडेलवाल

मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी खबर यही है कि खबर अब खबर नहीं रही। वह एक उत्पाद बन गई है ; बिकती है, पैक होकर आती है, सजती-संवरती है, चमकती है, और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार। कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे, जेल जाते थे, मुकदमे झेलते थे, धमकियां सहते थे, पर कलम नहीं झुकाते थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर गई है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खी बन जाता है; जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर व्यक्ति संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। जिस खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, वह अक्सर जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ देती है। भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। इस केंद्रीकरण की सबसे चर्चित मिसाल 2022 के आखिर में उद्योगपति अडानी द्वारा एनडीटीवी और IANS का अधिग्रहण है, जिसे कई पर्यवेक्षक भारतीय मुख्यधारा मीडिया में स्वतंत्र संपादकीय आवाज़ों के सिकुड़ने के प्रतीक के तौर पर देखते हैं। इसी दौर में “गोदी मीडिया” जैसा शब्द भी लोकप्रिय हुआ ; यानी वे चैनल जो सत्ता-पक्ष के प्रति खुला झुकाव रखते हैं। पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 2025 में 180 देशों में 151वें स्थान पर था, जो 2026 के सूचकांक में फिसलकर 157वें स्थान पर आ गया ; यानी भारत अब भी “अत्यंत गंभीर” श्रेणी में गिना जाता है। रिपोर्ट इसकी बड़ी वजहों में मीडिया स्वामित्व का सघन संकेंद्रण, पत्रकारों पर बढ़ती हिंसा और उत्पीड़न, तथा राजद्रोह व मानहानि जैसे औपनिवेशिक दौर के कानूनों के दुरुपयोग को गिनाती है।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम तक पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं। नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं, जबकि किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है। खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक खबर सरकारें गिरा देती थी, बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखते हैं। इसकी एक वजह डर भी है ; मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। ऊपर बताए गए अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से ज़्यादा कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए ; हर शाम वही चेहरे, वही चीख-पुकार, वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है। आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है, तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिल जाती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने इस बीमारी को और बढ़ाया है ; पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है। प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिख रहा है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुज़रती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम, तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम, झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं। हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हज़ारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं, पर अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए, इतिहास और समाज की समझ चाहिए, और सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है। इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तो अफ़वाहें फैलती हैं, समाज खेमों में बंटता है, लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत ; जागरूक नागरिक , धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं, सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाए, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा? सच बोलना कभी आसान नहीं रहा, पर इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते ; जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं, और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है। जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, पर सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान

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