रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26: एआई, ऑटोनॉमस सिस्टम, हाइपरसोनिक हथियार, ड्रोन, डायरेक्टेड एनर्जी वेपन से लेकर क्वांटम और स्पेस तक पर फोकस; खरीद प्रक्रिया को भी छोटा करने की तैयारी
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
भारतीय सेना अब सिर्फ मौजूदा युद्ध जरूरतों के हिसाब से हथियार और उपकरण जुटाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि अगले 20 वर्षों में युद्ध की बदलती प्रकृति को ध्यान में रखकर अपनी सैन्य क्षमता तैयार कर रही है। रक्षा मंत्रालय की ‘वार्षिक रिपोर्ट 2025-26’ के मुताबिक सेना ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ऑटोनॉमस सिस्टम, हाइपरसोनिक हथियार, ड्रोन, डायरेक्टेड एनर्जी वेपन, मशीन लर्निंग, क्वांटम, ब्लॉकचेन, साइबर और स्पेस जैसी तकनीकों को भविष्य के युद्ध में रणनीतिक बदलाव लाने वाली तकनीक के तौर पर चिन्हित किया है।
इन तकनीकों को सेना की क्षमता में शामिल करने के लिए मौजूदा और प्रस्तावित खरीद योजनाओं में बदलाव किया जा रहा है। साथ ही हथियारों और सैन्य तकनीक की खरीद की प्रक्रिया को छोटा करने के लिए मौजूदा प्रक्रियाओं को सरल बनाने और नए अधिग्रहण मार्ग तैयार करने पर भी काम किया जा रहा है।
क्या हैं ये तकनीकें: एआई से क्वांटम और ब्लॉकचेन तक, आसान भाषा में समझिए (नया सब-हेड)
सेना ने आने वाले दो दशकों के युद्ध को पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं माना है। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि तकनीक का प्रभाव युद्ध पर ‘ऑल्टोगेदर न्यू एंड डिसरप्टिव’ यानी बिल्कुल नया और बड़े बदलाव वाला हो गया है। सेना ने जिन तकनीकों को अगले 20 वर्षों में रणनीतिक बदलाव लाने वाली तकनीकों के रूप में चिन्हित किया है, उनमें उक्त तकनीकें शामिल हैं।
एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐसी तकनीक है जो कंप्यूटर और मशीनों को उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण कर उसके आधार पर निर्णय लेने या काम करने में सक्षम बनाती है। युद्ध में इसका इस्तेमाल निगरानी, लक्ष्य की पहचान, सूचना के विश्लेषण और निर्णय लेने में सहायता जैसी भूमिकाओं में हो सकता है। ऑटोनॉमस सिस्टम ऐसे सिस्टम हैं जो सीमित मानवीय नियंत्रण के साथ अपने निर्धारित काम कर सकते हैं। वहीं हाइपरसोनिक हथियार बेहद तेज गति से लक्ष्य की ओर बढ़ने वाली हथियार प्रणालियां हैं।
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन ऐसी हथियार प्रणालियां हैं, जिनमें केंद्रित ऊर्जा का इस्तेमाल किसी लक्ष्य को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। मशीन लर्निंग में कंप्यूटर बड़ी मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों से सीखकर अपने विश्लेषण और अनुमान को बेहतर बनाता है। इसी तरह क्वांटम तकनीक बेहद सूक्ष्म स्तर पर काम करने वाली तकनीक है, जिसके भविष्य में कंप्यूटिंग, संचार और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल की संभावनाएं हैं। ब्लॉकचेन डिजिटल जानकारी को सुरक्षित और छेड़छाड़ से बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक है, जबकि साइबर क्षेत्र कंप्यूटर, डिजिटल नेटवर्क और उनसे जुड़ी सुरक्षा से संबंधित है।
इन तकनीकों को भविष्य की रणनीतिक जरूरतों के संदर्भ में रखा गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि रिपोर्ट में इन सभी तकनीकों को सेना में पहले से पूरी तरह तैनात हथियार प्रणालियां बताया गया है। इन्हें भविष्य के युद्ध में बदलाव लाने वाली तकनीकों के रूप में चिन्हित कर इनके आधार पर क्षमता और खरीद की योजनाएं तैयार करने की बात कही गई है।
हथियारों की खरीद अब भविष्य के युद्ध को ध्यान में रखकर
सेना की योजना सिर्फ नई तकनीक की सूची तैयार करने तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन तकनीकों को सेना की खरीद योजनाओं में शामिल किया जा रहा है। कई खरीद योजनाएं प्रस्तावित हैं और कुछ को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया भी चल रही है। नई तकनीक के मामले में सेना को अलग-अलग इलाकों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा। यानी हिमालय जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्र, रेगिस्तानी इलाकों या दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों में युद्ध की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं और उसी के अनुरूप तकनीकी तथा सैन्य क्षमता विकसित करनी होगी।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य की सैन्य क्षमता का मतलब केवल ज्यादा मारक हथियार हासिल करना नहीं होगा। सेंसर, सूचना, आंकड़ों का विश्लेषण, संचार, स्वचालित प्रणालियां और अलग-अलग हथियारों को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल करने की क्षमता भी युद्ध का अहम हिस्सा बनेगी।
हथियार खरीद की लंबी प्रक्रिया को छोटा करने की तैयारी
भविष्य की तकनीक तेजी से बदलती है। ऐसे में किसी सैन्य तकनीक को सेना में शामिल करने में बहुत ज्यादा समय लगने पर उसके अप्रचलित होने का जोखिम भी रहता है। सेना ने इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए खरीद प्रक्रिया को छोटा करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। रिपोर्ट के अनुसार, हथियार और सैन्य उपकरण हासिल करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा रहा है। इसके साथ ही नए रास्तों से खरीद करने की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि आधुनिक तकनीक को सेना की जरूरतों के अनुरूप अपेक्षाकृत तेजी से हासिल किया जा सके।
सेना के भविष्य के हथियार तंत्र में सिर्फ यह सवाल नहीं होगा कि कौन-सा हथियार सबसे बेहतर है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि नई तकनीक को कितनी तेजी से सेना की जरूरत के अनुरूप विकसित, खरीदा और शामिल किया जा सकता है।
संरचनाः नई पीढ़ी की ब्रिगेड और बटालियन भी तैयार — रुद्र ब्रिगेड से भैरव बटालियन तक
भविष्य के युद्ध के लिए सेना सिर्फ तकनीक नहीं बदल रही, बल्कि अपनी सैन्य संरचना में भी बदलाव कर रही है। रिपोर्ट में रुद्र ब्रिगेड, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी और भैरव बटालियन जैसी नई पीढ़ी की संरचनाओं का उल्लेख किया गया है। इनके साथ नई पीढ़ी के उपकरण और फोर्स मल्टीप्लायर शामिल किए जा रहे हैं। फोर्स मल्टीप्लायर का मतलब ऐसी क्षमता या तकनीक से है, जो उपलब्ध सैनिकों और संसाधनों की प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ाने में मदद करती है।
यह संकेत देता है कि भविष्य की सेना का ढांचा केवल पारंपरिक रेजिमेंट और बटालियन आधारित संरचना तक सीमित नहीं रहेगा। नई तकनीक और नए युद्धक्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से नई सैन्य संरचनाओं को भी जगह दी जा रही है।
2022-32 को ‘ट्रांसफॉर्मेशन का दशक’ बना चुकी है सेना
सेना ने 2022 से 2032 को ‘ट्रांसफॉर्मेशन का दशक’ यानी व्यापक बदलाव का दशक घोषित किया है। इसका लक्ष्य तकनीक से सक्षम, आत्मनिर्भर और भविष्य के युद्ध के लिए तैयार सेना का निर्माण करना है। सेना देश की संप्रभुता की रक्षा करने के साथ अपनी क्षमताओं को मजबूत करने और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य में योगदान देने की दिशा में काम कर रही है।
इस पूरी प्रक्रिया में तकनीक को केंद्रीय भूमिका दी गई है। यानी सेना की दीर्घकालिक तैयारी में हथियारों के आधुनिकीकरण के साथ संगठन, प्रशिक्षण, संचालन और तकनीकी क्षमताओं में भी बदलाव शामिल है।
जंग के भावी मोर्चे: अंतरिक्ष में भी बढ़ेगी सेना की भूमिका, बनेगी अंतरिम अंतरिक्ष कमान
भविष्य की जंग का एक अहम मोर्चा अंतरिक्ष भी माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी को आगे बढ़ाकर अंतरिम अंतरिक्ष कमान के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए चार वर्षों में चार चरणों में काम करने की योजना है। तीनों सेनाओं से अतिरिक्त मानव संसाधन भी इसमें शामिल किया जाएगा। इसमें सेना, वायुसेना और नौसेना के लिए 5:3:2 का अनुपात रखा गया है।
सेना को रक्षा अंतरिक्ष से जुड़ी 75 चुनौतियों में से 10 पर काम करने की जिम्मेदारी मिली है। इनमें नौ चुनौतियां आईडीईएक्स और एक ‘मेक’ श्रेणी में हैं। छह आईडीईएक्स अनुबंध पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, जबकि अन्य तीन आगे के चरण में हैं। अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल संचार, निगरानी, सूचना हासिल करने और सैन्य अभियानों के लिए जरूरी दूसरी क्षमताओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
तकनीकी स्टार्टअप से लेकर एमएसएमई तक पर दांव: iDEX से जुड़े 676 स्टार्टअप-एमएसएमई, 551 अनुबंध
भविष्य की सैन्य तकनीक विकसित करने के लिए सेना और रक्षा मंत्रालय स्टार्टअप तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई को भी तेजी से जोड़ रहे हैं। मार्च 2026 तक आईडीईएक्स के तहत 14 डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज और चार एडीआईटीआई संस्करण आयोजित किए गए। इनके माध्यम से कुल 673 समस्या विवरण जारी किए गए। इन चुनौतियों के तहत 676 स्टार्टअप और एमएसएमई विजेताओं को जोड़ा गया और 551 आईडीईएक्स अनुबंध किए गए।
इसके अलावा 61 मामलों में लगभग 4,216 करोड़ रुपये की ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ यानी एओएन दी गई। एओएन का मतलब है कि संबंधित सैन्य जरूरत के लिए खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की औपचारिक मंजूरी। रिपोर्ट के मुताबिक, 2,657 करोड़ रुपये मूल्य के 48 खरीद अनुबंध भी किए गए हैं। मार्च 2026 में रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों यानी डीपीएसयू ने ‘दृष्टि’ चुनौतियों के तहत 101 समस्या विवरण भी जारी किए। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र की वास्तविक जरूरतों के समाधान के लिए नई कंपनियों और तकनीकी संस्थाओं को जोड़ना है।
डीआरडीओ के 317 प्रोजेक्ट, ₹1.32 लाख करोड़ की लागत: भविष्य का क्षमता विकास
भविष्य के युद्ध के लिए नई तकनीक और हथियार विकसित करने में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ की भूमिका भी अहम है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में डीआरडीओ के 73 नए प्रोजेक्ट मंजूर किए गए। इनकी कुल लागत 8,856.86 करोड़ रुपये थी। 31 मार्च 2026 तक डीआरडीओ के 317 प्रोजेक्ट चल रहे थे, जिनकी कुल लागत 1,32,285.88 करोड़ रुपये थी। इनमें 11 प्रमुख कार्यक्रम ऐसे हैं जिन्हें सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति यानी सीसीएस से मंजूरी मिली है। इनकी कुल लागत 73,041.63 करोड़ रुपये है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी ने डीआरडीओ द्वारा विकसित प्रणालियों के लिए 1.29 लाख करोड़ रुपये से अधिक की 22 ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ दी। इसके अलावा करीब 26,000 करोड़ रुपये मूल्य के 11 खरीद अनुबंध उत्पादन भागीदारों के साथ किए गए।
सिर्फ हथियार नहीं, पूरी युद्ध प्रणाली बदलने की तैयारी
सेना की इस दीर्घकालिक योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भविष्य के युद्ध को केवल मिसाइल, टैंक, तोप या लड़ाकू विमान की संख्या से नहीं देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में कौन बेहतर जानकारी जुटाता है, कौन उस जानकारी का तेजी से विश्लेषण करता है, कौन उसे सुरक्षित तरीके से साझा करता है और कौन उसके आधार पर सबसे पहले प्रभावी कार्रवाई करता है, यह भी सैन्य बढ़त तय कर सकता है। यही वजह है कि सेना ने एआई, मशीन लर्निंग, ऑटोनॉमस सिस्टम, ड्रोन, साइबर, क्वांटम और अंतरिक्ष जैसी तकनीकों को अपनी भविष्य की तैयारी से जोड़ा है। साथ ही नई सैन्य संरचनाएं, स्टार्टअप आधारित तकनीकी विकास, डीआरडीओ के बड़े अनुसंधान कार्यक्रम और तेज खरीद प्रक्रिया इस बदलाव के दूसरे हिस्से हैं।
सैन्य ऑपरेशन के अनुभवों से अब आगे की प्लानिंग
वार्षिक रिपोर्ट में सेना की व्यापक आधुनिकीकरण और तकनीकी तैयारी के साथ हालिया सैन्य अभियानों से हासिल अनुभवों का भी उल्लेख है। रिपोर्ट में नई पीढ़ी के उपकरणों, फोर्स मल्टीप्लायर और भविष्य की तकनीकों पर जोर उसी व्यापक बदलाव के संदर्भ में सामने आता है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट है कि भविष्य की क्षमता विकसित करने के लिए सेना नई तकनीक, नई सैन्य संरचना और तेजी से बदलते युद्धक्षेत्र को एक साथ ध्यान में रख रही है।
यानी अगले 20 साल की तैयारी का फॉर्मूला सिर्फ ज्यादा हथियार नहीं, बल्कि ज्यादा ‘स्मार्ट’ युद्ध क्षमता है – जहां एआई से लेकर क्वांटम, ड्रोन से लेकर स्वचालित सिस्टम और जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक, हर क्षेत्र को सैन्य क्षमता का हिस्सा बनाने की तैयारी है।
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