Posts

माँ पर कविताएँ रचयिता: आशीष मोहन | Pavitra India

https://ift.tt/HdtA05o

1. माँ के हाथ उपजाऊ लगते हैं

माँ के हाथों में पैसे आने के

चंद अवसर होते हैं

कभी-कभार बेटे रख देते हैं

माँ के हाथों में कुछ पैसे—

“माँ रख लीजिए इन पैसों को, काम पड़ेंगे”

और माह की दो-तीन तारीख को

घर के किरायेदार

अपने हिस्से का किराया

माँ को देकर जाते हैं

इन रुपयों से

माँ करती है पूरे घर की

छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा

त्योहारों पर बहुओं को पहनाती है उनकी पसंद की चूड़ी

और खरीद लाती है बाजार से नई-नई साड़ियाँ

बच्चों के लिए चॉकलेट और आइसक्रीम तो आम बात है

माँ नहीं चूकती बेटों के हाथों में पैसे रखने से,

उनके कहीं अटकने पर

माँ के हाथ बड़े उपजाऊ लगते हैं

माँ के हाथों में चंद पैसे भी फलने-फूलने लगते हैं..!

2. माँ

यूँ तो अनपढ़ है माँ

पर पढ़ लेती है पिता के माथे पर

उभरी चिंता-रेखाएँ

भाई की किताबों का हिसाब

बराबर कर देती है

अपने जेवरों की जरूरतें कम करके

बहन के गुलाबी गाल पर आई अश्वेत रेखा को

समझते देर नहीं लगती उसे

मैं घर में सबसे छोटा हूँ

मुझे पढ़ाती है बेलन का डर दिखाकर

मैं कैसे मान लूँ माँ अनपढ़ है..!

3. माँ का झूठ

देखकर टोकरी में

रोटियों की कम संख्या

अक्सर मैं झूठ बोल दिया करता था—

“बस, माँ अब भूख नहीं है मुझे”

पतीले में कम चावल होने पर

कह देता था—

“मुझे थोड़ा सा ही चावल चाहिए”

मुझे यकीन है

यदि तुलना की गई

तो यह झूठ संसार के सर्वोत्तम

सच से भी दो पायदान ऊपर बैठेगा

मेरे बचपन से लेकर अब तक

माँ ने ऐसे असंख्य झूठ बोले हैं

बिना परवाह

वह जानती थी

झूठ बोलना पाप ही तो है

फिर भी यह झूठ बोलती रही

इसके बरक्स बस यही चाह

कि उसके बच्चे की भूख बाकी न रहे

मेरे मना करने पर भी

मुझे परोसती रही

अपने हिस्से की रोटियाँ

माँ मेरा झूठ जानती थी

मैं बड़ी देर से जान पाया

माँ का झूठ…!

4. कौन याद करता है

कौन याद करता है मुझे

जब मैं उलझन में रहता हूँ

कोई भी तो नहीं सिवाय माँ के

माँ ही है जिसके क्षितिज में चमका

और अब ढल रहा हूँ तन्हा-तन्हा

जौहरी सी

काबिलियत झलकती है उसमें

मैं हीरा तो था मगर पत्थर के माफिक

लोगों ने फेंका, रौंदा क़दमों तले

माँ ने तराशा मुझे जरा-जरा

जादुई दर्पण सी

मालूम पड़ती है वो मुझे

अवगुणों को मेरे छुपाती तो है

पर बिन बताए मुझे बदलने की

कोशिश करती है तरह-तरह..!

5. सुंदरतम पुष्प

दुनिया का सुंदरतम पुष्प

खिलता है माँ के अधरों में

जब तक खिलता रहेगा यह पुष्प

बनी रहेगी आब और हवा में खुशबू

बनी रहेगी पेड़ों में रंगत

और बजता रहेगा झरनों में संगीत..!

6. माँ तुझ सा नहीं कोई आईना

आईना, माँ तुझसा नहीं कोई आईना

बारिश के भीगे चेहरे में आँसू को पहचान ले

हँसी होंठ की अनदेखी कर बात जिगर की जान ले

इसीलिए तो तेरे सिवा माँ चीज कोई भी भायी ना

आईना..

तेरी बोली ऐसी है माँ जैसे बज रही बाँसुरी

तेरे संग-संग मीठी हो जाए बर्तन की धुन बेसुरी

इसीलिए तो तेरे सिवा माँ और कोई धुन गायी ना

आईना..

पानी में दूध की, दूध में पानी

पता नहीं माँ क्या है कहानी

इस तरह तू दिल में समायी, चीज कोई भी समायी ना

आईना..!

कविताओं पर साहित्यकारों की विस्तृत टिप्पणियाँ

माँ को देखने की घरेलू रोशनी : आशीष मोहन की कविताएँ

आशीष मोहन मेरे प्रिय कवि हैं। उनकी कविताओं के प्रति यह प्रियता केवल भावुकता के कारण नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि के कारण है, जिसमें कविता किसी दूर के संसार से नहीं, घर-आँगन की छोटी-छोटी चीजों से जन्म लेती है। प्रस्तुत कविताओं में माँ केंद्र में है, लेकिन वह किसी आदर्श प्रतिमा की तरह नहीं आती। वह पैसे सँभालती है, रोटियाँ परोसती है, जेवर कम करती है, बच्चों की जरूरत पहचानती है और चेहरे पढ़ती है। इसी घरेलू संसार में कवि उसकी विराटता खोजता है।

‘माँ के हाथ उपजाऊ लगते हैं’ में पैसा कविता का केंद्रीय रूपक है। बेटे के हाथ से माँ के हाथ में पहुँचा पैसा घर की जरूरतों, बहू की चूड़ी, साड़ी, बच्चों की चॉकलेट और संकट में पड़े बेटे की मदद में बदल जाता है। ‘उपजाऊ’ शब्द यहाँ खास अर्थ ग्रहण करता है—माँ के हाथ में पैसा केवल खर्च नहीं होता, रिश्तों में फलता है।

‘माँ’ में शिक्षा की पारंपरिक परिभाषा पर सहज प्रश्न है। माँ अनपढ़ है, फिर भी पिता की चिंता पढ़ती है, भाई की पढ़ाई के लिए अपने जेवरों की जरूरत घटाती है और बहन के चेहरे की पीड़ा पहचान लेती है। “मैं कैसे मान लूँ माँ अनपढ़ है..!” इस कविता का स्वाभाविक निष्कर्ष है।

‘माँ का झूठ’ इन कविताओं में अधिक मार्मिक और भीतर तक उतरने वाली रचना है। बच्चे का भूख से इनकार और माँ का अपने हिस्से की रोटी उसे खिला देना—दोनों ‘झूठ’ हैं, लेकिन दोनों में प्रेम का अलग अर्थ है। “माँ मेरा झूठ जानती थी / मैं बड़ी देर से जान पाया / माँ का झूठ” कविता का सबसे सधा हुआ बिंदु है।

‘कौन याद करता है’ में माँ की भूमिका व्यक्तित्व-निर्माता की है। ‘जौहरी’ और ‘हीरे’ का बिंब माँ के हाथों व्यक्तित्व के धीरे-धीरे तराशे जाने के संदर्भ में प्रभावी लगता है।

‘सुंदरतम पुष्प’ और ‘माँ तुझ सा नहीं कोई आईना’ अधिक गीतात्मक कविताएँ हैं। पहली में माँ के अधरों का पुष्प प्रकृति की खुशबू, रंग और संगीत से जुड़ता है। दूसरी में माँ ऐसा आईना है जो चेहरे से अधिक मन पढ़ता है।

आशीष मोहन की भाषा सहज और घरेलू है। रोटी, चावल, पैसे, जेवर, चूड़ी, साड़ी और बर्तनों की धुन जैसे सामान्य तत्व उनके यहाँ कविता का पदार्थ बनते हैं। इन कविताओं में माँ का संसार मूलतः अदृश्य श्रम और दिखाई न देने वाले प्रेम का संसार है। वे बस उन परिचित दृश्यों को फिर से देखने के लिए विवश करती हैं, जिनका अर्थ हम अक्सर बहुत देर से समझते हैं। अंत में एक परामर्श देना भी मेरी जिम्मेदारी है कि वह शब्दों को कम खर्च करें और कविताओं को कसें।

— ब्रज श्रीवास्तव (विदिशा, म.प्र.)

आदरणीय आशीष जी की कविताएं सरल, सहज हैं। ये भावात्मक रूप से बनी हुई, हरेक के मन की बात कहती हैं। बीत चुके क्षण की पुरानी सौंधी-सौंधी महक कविताओं से आती है। माँ के शब्दों और व्यक्तित्व को कविता रूप में लाकर उस अनुभव और संवेदना को प्रगट किया है। आपको बधाई! 💐

— डॉ. मौसमी परिहार

आशीष मोहन की ये छहों कविताएँ माँ के त्याग, ममता, समझदारी और निःस्वार्थ प्रेम के विविध रूपों को सामने लाती हैं। सरल भाषा और घरेलू जीवन के सहज चित्रों के माध्यम से कवि ने माँ के विराट व्यक्तित्व को भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है। ये कविताएँ माँ के प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता का भाव जगाती हैं।

— व्ही. के. जैन

माँ के विविध रूपों का सजीव चित्रण

आशीष मोहन जी की ये छह रचनाएँ माँ के प्रेम, त्याग और समर्पण के अलग-अलग रूपों को सहजता से अभिव्यक्त करती हैं।

‘माँ के हाथ उपजाऊ लगते हैं’ में सीमित पैसों से पूरे घर की जरूरतें पूरी करने वाली माँ की कुशलता और उदारता मन को छूती है। ‘माँ’ में उसकी सहज बुद्धिमत्ता और ‘माँ का झूठ’ में बच्चों की भूख मिटाने के लिए स्वयं अभाव सहने का भाव विशेष रूप से मार्मिक है। ‘कौन याद करता है’ में माँ संतान की खूबियों को पहचानकर उसे सँवारने वाली पारखी है, वहीं ‘सुंदरतम पुष्प’ में उसकी मुस्कान को प्रकृति की सुंदरता से जोड़ा गया है। ‘माँ तुझ सा नहीं कोई आईना’ माँ की उस संवेदनशीलता को सामने लाती है, जो बिना कहे ही मन की पीड़ा पहचान लेती है।

इन रचनाओं की भाषा सहज और भावनाएँ आत्मीय हैं। कवि ने माँ के महत्त्व को बड़े उपदेशों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों में तलाशा है। आशीष जी को अशेष शुभकामनाएँ!

— रश्मि वैभव गर्ग

दरकते रिश्तों के दौर में सम्बन्धों को बांधती कविताएं हैं। बहुत स्वाभाविकता और अपनत्व का आभास इनमें दिखाई देता है।

— आशीष दशोत्तर

सृजन या सर्जना की पर्याय कही जाने वाली माँ पर यूं तो बहुत लिखा गया, पर नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर आदरणीय आशीष मोहन जी की सूक्ष्म दृष्टि जहाँ तक पहुंची वहाँ तक विरले कवि भी नहीं पहुंच पाये। बच्चों को महान बनाने के लिए माँ बेलन भी चलाती है, तराशने का ये सोशल उपक्रम कोई इंजीनियरिंग पढ़ा व्यक्ति भी इतना सफलतापूर्वक परीक्षण नहीं कर सकता, जितना अनपढ़ होकर एक माँ अपनी सूझ-बूझ और सीमित संसाधनों में करती है। माँ का मन एक सर्वोच्च मनोविज्ञान है। आदरणीय आशीष मोहन जी की लेखनी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! 💐🙏

— पंकज राठौर

आशीष जी की कविता का स्वागत है। आपकी कविता पिछले कई सालों से पढ़ रहा हूं, आशीष छोटी कविता की पहचान बन चुके हैं। थोड़े में समूचे कथ्य को बांध पाना उनके सामर्थ्य को दिखाता है। उनकी कविता केवल आवेग से आगे नहीं बढ़ती बल्कि भावों की बाढ़ उतर जाने का इंतजार करती है। अपनी कविता “मां के हाथ उपजाऊ हैं” में वे माँ का वह रूप गढ़ते हैं जो धरती का सादृश्य ला खड़ा करता है। आपकी अच्छी कविता तथा प्रस्तुति के लिए सभी का आभार।

— मिथिलेश रॉय

माँ शब्द जिसमें पूरा ब्रह्माण्ड समाया होता है, वह बच्चों के जीवन की प्रथम पाठशाला होती है… माँ के जीवन का यथार्थ सशक्त चित्रण में भावों की मर्मस्पर्शिता और गहराई से व्यक्त होती संवेदनाएँ मन को छूती हैं। सच है माँ तुझसा और कोई नहीं… बहुत-बहुत बधाई, सर!

— बबीता गुप्ता

माँ : संवेदना का केंद्रीय लोक

आशीष मोहन जी की ये सभी रचनाएँ केवल कविताएँ नहीं, एक पुत्र के हृदय की आत्म-स्वीकृति हैं।

  1. भाव-पक्ष की गहराई: कवि ने माँ को बहुत अलग-अलग कोणों से देखा है। कहीं वह ‘उपजाऊ’ लगती है, कहीं वह ‘झूठ’ बोलती है—वह शाश्वत झूठ कि ‘मैंने खा लिया’ जबकि थाली खाली ही रह गई। यह झूठ सबसे बड़ा सत्य बन जाता है।

  2. वैराग्य और जीवन-दर्शन: ‘कौन याद करता है’ में आधुनिक जीवन की विस्मृति पर चोट है, वहीं ‘सुंदरतम पुष्प’ जीवन के सौंदर्य-बोध को माँ की देन मानता है।

  3. भाषा और शिल्प: भाषा में कोई बनावट नहीं है। सीधे दिल से निकले हुए शब्द हैं। घरेलू बिंबों से ही कविता को बड़ा बनाया गया है।

निश्चित ही, यह संग्रह मातृत्व पर लिखी गई हिंदी की संवेदनशील कविताओं में अपना विशेष स्थान रखेगा।

— प्रमोद कुमार चौहान

आशीष मोहन की कविता यात्रा कुछ सालों से देख रही हूँ, दिन पर दिन निखार की ओर अग्रसर है। माँ पर अनावश्यक बोझ न डाल कर अपने पास बिठा कर उनकी सरलता की व्याख्या करना प्रशंसनीय है। मासूम, भोली सी कविताओं के लिए बधाई आशीष।

— मधु सक्सेना

कविताएँ बहुत ही भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी हैं। आशीष मोहन जी ने माँ के प्रेम, त्याग, समझ और उस अदृश्य जादू को बहुत सहज और सच्चे शब्दों में बाँधा है। इतनी संवेदनशीलता और सादगी से लिखना आसान नहीं। बहुत सुंदर लेखन!

— सुधीर देशपांडे

माँ विषय को अपनी कविताओं में विन्यस्त कर, आशीष मोहन ने माँ के प्रति जो भावनाएँ प्रकट की हैं वे हम सभी के बहुत निकट सी हैं। कविताएँ पढ़ते हुए माँ से जुड़ी यादें और प्रसंग जीवंत हो उठते हैं।

— ख़ुदेजा खान

आज आशीष मोहन जी की कविताएँ माँ पर केंद्रित हैं। अनगिन भावों से भरी संवेदनशील लगीं। जीवन जगत को अनुभव से जानने-समझने वाली माँ अनपढ़ नहीं होती। प्रथम ‘माँ के हाथ…’ और अंतिम ‘माँ तुझ सा नहीं…’ के शीर्षक विशेष लगे।

— अनिता रश्मि

माँ पर लिखा गया साहित्य हमेशा चाव और आत्मीयता के साथ पढ़ा जाता है। आशीष जी की पहली कविता में आर्थिक गतिविधियों का सजीव चित्रण है, दूसरी में माँ का जीवन-विवेक, तीसरी में प्रेम की पारस्परिकता, चौथी में संबल, पाँचवीं में सौंदर्य और छठी कविता मस्ती से छंदबद्ध मिठास घोलती है।

— सत्येंद्र कुमार रघुवंशी

आशीष अपनी माँ के दुलारे बेटे हैं, यह इनकी कविताओं ने साबित कर दिया। जब भी भावों की धार बहती है तो घर, आँगन, गाँव और माँ का स्वाभाविक चित्रण आता है जो बनावटी नहीं लगता। अच्छी कविताओं के लिए बधाई!

— ज्योति खरे (छिंदवाड़ा, म.प्र.)

अगर विषयों की सूची बनाई जाए तो माँ पर सबसे अधिक कविताएँ लिखी गई होंगी, फिर भी आशीष जी ने बहुत सरल शब्दों में बहुत प्यारे भाव व्यक्त किए और भावुक कर दिया। उत्कृष्ट सृजन के लिए शुभकामनाएँ! 💐🙏

— दुष्यंत तिवारी

प्रिय युवा कवि आशीष जी की सभी कविताएँ माँ के विराट व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बड़े ही विशिष्ट अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं। शुष्क पुलिस विभाग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए भी अपने अंदर की संवेदनाओं को अनवरत सृजन प्रक्रिया में बदलना सराहनीय है।

— विश्वनाथ कदम

आशीष मोहन जी की यह कविता माँ के प्रति अपने समर्पण भाव एवं अथाह स्नेह को प्रदर्शित करती है। प्रतीकों का ताना-बाना एवं शब्दों की जादूगरी काफी प्रभावशाली है।

— वशिष्ठ मुकेश

सभी कविताएँ माँ के विविध रूपों और भूमिकाओं पर बहुत सुंदर और सरस बनी हैं। इन्हें पढ़ते हुए लगा कि हम माँ और उनके त्याग को कितना कम जानते हैं। विषय पुराना होने पर भी नूतन ढंग से लिखा है। खूब बधाई!

— कमला सिंह नरवरिया

घरेलू बिंबों का प्रयोग (टोकरी में रोटियाँ, पतीले में चावल, चूड़ियाँ, साड़ियाँ, बेलन का डर, बर्तनों की धुन) कविताओं को अत्यंत आत्मीय और विश्वसनीय बनाता है। उपजाऊ हाथ, जौहरी, जादुई दर्पण, सुंदरतम पुष्प जैसे रूपक सरल होते हुए भी प्रभावशाली हैं।

— आनंद सौरभ उपाध्याय

माँ के साए में पनपीं, कूपल सी कविताएँ… आशीष मोहन की इन कविताओं ने बचपन को पुनः लौटाया है। ‘माँ का झूठ’ कविता ने अमरकांत की कहानी ‘दोपहर का भोजन’, ‘मदर इंडिया’ की नरगिस और लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जबसे आँख खुली है’ की याद दिला दी। भूख का भी अपना शास्त्र है जिसे केवल माँ ही पढ़ना जानती है।

— मीरा गौतम 👌🙏

आशीष मोहन अपनी जमीन पर खड़े होकर चलते हैं, आसमान नहीं ताकते। उनके लिए कविता के लिए विषय का चुनाव करना कोई बड़ी बात नहीं है; वे घर की छोटी-मोटी बातों को लेकर विषय चुन लेते हैं। समकालीन हिंदी कविता में आशीष मोहन ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

— हरगोविंद पुरी

आशीष जी की इन कविताओं से गुज़रना अपने ही घर के आँगन, रसोई और माँ के पुराने आँचल की चिर-परिचित गंध से होकर गुज़रना है। यहाँ माँ कोई अलौकिक देवी नहीं, बल्कि हाड़-मांस की बनी जीती-जागती धुरी है। भाषा में कोई बौद्धिक आडंबर नहीं है। माँ को समर्पित इन भावपूर्ण कविताओं के लिए बधाई!

— शिरीन भावसार (इंदौर, म.प्र.)

(१२/१०/२०२६)

यहाँ भाव है, काव्य कौशल है और कथ्य भी है। माँ के विषय पर लिखते समय दोहराव से बचना कठिन होता है, पर कवि ने अपनी संवेदना से इसे सँभाला है। कवि से विशिष्ट दृष्टि और नवाचार की अपेक्षा सदैव बनी रहेगी। हार्दिक बधाई!

— प्रदीप

आशीष जी हमेशा जमीं से जुड़ी कविताएं लिखते रहे हैं, जिनमें कोमलता के साथ मन को छूने वाली मासूम सी अभिव्यक्ति छुपी होती है। आपकी प्रभावशाली कलम निरंतर चलती रहे! 🙏🙏🙏

— अर्चना नायडू

-------------------------------

 ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें। Pavitra India पर विस्तार से पढ़ें मनोरंजन की और अन्य ताजा-तरीन खबरें 

Facebook | Twitter | Instragram | YouTube

-----------------------------------------------

.  .  .

About the Author

Pavitra India (पवित्र इंडिया) Hindi News Samachar - Find all Hindi News and Samachar, News in Hindi, Hindi News Headlines and Daily Breaking Hindi News Today and Update From newspavitraindia.blogspit.com Pavitra India news is a Professional news Pla…
Cookie Consent
We serve cookies on this site to analyze traffic, remember your preferences, and optimize your experience.
Oops!
It seems there is something wrong with your internet connection. Please connect to the internet and start browsing again.
AdBlock Detected!
We have detected that you are using adblocking plugin in your browser.
The revenue we earn by the advertisements is used to manage this website, we request you to whitelist our website in your adblocking plugin.
Site is Blocked
Sorry! This site is not available in your country.