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ग्राम पंचायतों ने नहीं सुने योगी के निर्देश! | Pavitra India

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सुनील कुमार

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुछ माह पूर्व ही भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिये थे; मगर भ्रष्टाचारियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। अधिकांश ग्रामीण कहते हैं कि उनका कोई भी कार्य बिना घूस के नहीं होता है। इसके अतिरिक्त जो कार्य ग्रामीण विकास के लिए किये जाते हैं, उनमें भी भ्रष्टाचार चरम पर रहता है। गाँवों के कई कार्य तो काग़ज़ों में ही हो जाते हैं; मगर धरातल पर कुछ नहीं होता।

अधिवक्ता संतोष कहते हैं कि छोटे पदाधिकारी भ्रष्टाचार तभी करते हैं, जब उन्हें ऊपर से भ्रष्टाचार करने का संकेत मिलता है। भ्रष्टाचार की काली कमायी ऊपर तक इकट्ठी होकर जाती है, जिसके चलते भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती है। अगर भ्रष्टाचार की पोल खुल जाए, तो निचले पदों पर कार्य करने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को निलंबित करके इतिश्री कर ली जाती है; मगर किसी बड़े भ्रष्टाचारी के विरुद्ध एक रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं होती।

ग्राम पंचायत के भ्रष्टाचार की निकट से देखने वाले एक ग्राम पंचायत सदस्य नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहते हैं कि ग्राम पंचायतों में ईमानदारी अब सतयुग की गाथा जैसी लगती है। ग्राम पंचायतों में जो ईमानदार सदस्य अथवा पदाधिकारी हैं, उनको कोई नहीं पूछता एवं उन्हें आगे भी नहीं बढ़ने दिया जाता है। खड़ंजे पड़ने, नालियाँ बनने, किसी ग्रामीण को सब्सिडी मिलने का कार्य तक में भ्रष्टाचार होता है। मगर ग्राम पंचायत के एक सदस्य वीरेंद्र कहते हैं कि पंचायतों में कोई भ्रष्टाचार व्याप्त नहीं है। कुछ लोग ग्रामीणों का काम कराने के बदले चाय पानी की माँग कर देते हैं, जिसके कारण सब बदनाम हैं। वीरेंद्र के पड़ोसी ने बताया कि वीरेंद्र झूठ बोल रहा है। उसके पास ग्राम पंचायत सदस्य बनने से पहले ऐसे ठाटबाट नहीं थे, जैसे अब हैं। एक पूर्व प्रधान नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहते हैं कि ईमानदारी से कार्य करने वालों को चुनाव तक नहीं जीतने दिये जाते हैं। वह कहते हैं कि ईमानदारी दिखाएगा भी कोई क्यों? चुनाव बिना पैसे के जीत नहीं सकते। आजकल ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ने के लिए पहले तो टिकट नहीं मिलता। अगर कोई निर्दलीय लड़ भी ले, तो भी उसे चुनाव लड़ने के लिए कम-से-कम चार-छ: लाख रुपये चाहिए। चुनावों में प्रतिद्वंद्व इतना बढ़ गया है कि ग्राम पंचायत के सदस्य का चुनाव जीतने के लिए लोग दो से तीन लाख रुपये तक उड़ा देते हैं। ग्राम प्रधान बनने के लिए लोग 10 से 20 लाख का बजट रखकर चलते हैं। चुनाव ही ईमानदारी से नहीं होते, तो काम ईमानदारी से कैसे होंगे। जो व्यक्ति चुनाव जीतकर आता है, वह अगले चुनाव को जीतने के लिए चुनावी व्यय के लिए दोगुनी धनराशि इकट्ठी करता है एवं अपने जीवन स्तर को उच्चस्तरीय बनाने में लगा रहते है। उसे ग्रामीण विकास की चिन्ता से अधिक अधिकारियों से अच्छे सम्बन्ध रखने की रहती है; क्योंकि वही ग्रामीण विकास के लिए योजनाओं का बजट पास करते हैं। अंदर की बात बताऊँ, ग्रामीण विकास में होने वाले भ्रष्टाचार का पैसा मंत्रियों तक जाता है।

पूर्व ग्राम प्रधान का यह बयान सिद्ध करता है कि भ्रष्टाचार की कड़ियाँ ऊपर तक जुड़ी हुई हैं। उत्तर प्रदेश में जल जीवन योजना के तहत बनी हुई टंकियों के एक एक करके गिरने से बड़ा इसका प्रमाण और क्या हो सकता है। मगर ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार शासन तक व्याप्त है, ऐसा कहना कठिन है; क्योंकि शासन ने ही अनेक बार ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार को पकड़ा है। मगर इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ग्राम पंचायतों में विकास की कोई भी योजना आती है, तो उसका बंदरबाँट पहले ही आरंभ हो जाता है। भ्रष्टाचार का हाल यह है कि ग्रामीण स्तरीय सुविधाओं को भी तरस रहे हैं।

भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी

आरोप प्रत्यारोप को छोड़ भी दें; मगर उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें घूस लेना, विकास कार्यों में गड़बड़ी एवं वित्तीय अनियमितताएँ देखी गयी हैं। ग्राम पंचायतों में होने वाले भ्रष्टाचार में अधिकांश सदस्यों से लेकर ग्राम पंचायत अधिकारी, ग्राम प्रधान एवं सरपंच ही भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं। बीते वर्षों में भ्रष्टाचार के सामने आये अनेक मामलों से पता चला है कि ग्राम पंचायतों के विकास का दारोमदार सँभालने वाले पंचायत राज विभाग में भी भ्रष्टाचार चरम पर है। बीते वर्ष शासन ने पाया कि फ़तेहपुर सीकरी की 13 ग्राम पंचायतों के सचिवों ने घर बैठकर 24.63 लाख रुपये का भुगतान कर लिया। शासन की तत्परता के चलते पंचायती राज निदेशालय ने आईपी एड्रेस ट्रेस करके इस भ्रष्टाचार को पकड़ा एवं प्रशासन को भ्रष्ट सचिवों के विरुद्ध कार्रवाई के आदेश दिये। जनपद के कुल 15 विकास खंडों में से आठ विकास खंडों में यह भ्रष्टाचार हुआ।

बीते कुछ ही वर्षों में शासन ने ग्राम पंचायतों के कई भ्रष्टाचार पकड़े हैं। भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि हैंपपंपों खड़ंजों गाँवों में बनने वाली सीमेंट की सड़कों पानी की टंकियों स्वच्छ भारत योजना के तहत बनने वाले शौचालयों प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले घरों के लिए दी गयी सब्सिडी ग्रामीणों को मिलने वाले ऋणों क्रेडिट कार्डों, मनरेगा एवं दूसरी अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार होने के अनेक उदाहरण अब तक सामने आ चुके हैं। स्थिति यह है कि ग्राम पंचायतों चुने गये सदस्यों प्रधानों सचिवों से लेकर ब्लॉक स्तर तक बैठे सदस्य एवं अधिकारी तक घूस लिये बिना किसी का कोई कार्य नहीं करते हैं।

लखीमपुर खीरी में बीते दिनों जल जीवन योजना के तहत बनी टंकी गिरी थी। इससे पूर्व वहाँ डीपीआरओ के निरीक्षण में बिजुआ ब्लॉक के कंजा गाँव के अधिकांश हैंडपंप बंद मिले, जबकि शासन से इन हैंडपंपों को ठीक करने के लिए धनराशि मिल चुकी थी। मनरेगा के तहत भी भ्रष्टाचार चरम पर है। मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों के लिए ग्रामीण श्रमिकों की संख्या एनएमएमएस एप पर डालनी होती है। ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि इस एप पर श्रमिकों की संख्या अधिक दिखाकर सरकार से प्राप्त धनराशि निकाल लेते हैं; मगर कार्य पर कम श्रमिकों को लगाते हैं। कोटरा में बीते दिनों ऐसा ही पाया गया। वहाँ एप पर 36 श्रमिकों की उपस्थिति दिखायी गयी थी, जाँच में कार्य करते हुए मात्र 19 श्रमिक मिले। चारागाह में भी तालाब खुदाई के लिए 40 श्रमिक एप पर दिखाये गये थे; मगर जाँच हुई, तो मात्र नौ श्रमिक ही मिले।

कम ही मामलों में कार्रवाई

शासन ने बीते वर्षों में अनेक भ्रष्ट अधिकारियों एवं चुने हुए ग्रामीण प्रतिनिधियों के विरुद्ध कार्रवाई की है; मगर कुछ दिनों बाद कई जाँचें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं एवं भ्रष्टाचारी बच जाते हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं लगती है कि यह सब कैसे होता है? भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई कितनी कड़ी होती है, इसका पता इस बात से ही चल जाता है कि अभी तक किसी भी बड़े भ्रष्टाचारी को जेल नहीं हुई है। निलंबन बस्ता छीने जाने एवं आर्थिक दंड के मामले भी कम ही देखने को मिलते हैं।

बीते वित्त वर्ष में पूरे प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की कितनी शिकायतें दर्ज हुईं, इसका ब्योरा ग्राम पंचायत विभाग अथवा सरकार ने जारी नहीं किया है; मगर ऐसा अनुमान है कि प्रतिदिन हज़ारों शिकायतें आती हैं। अनुमानित रूप से कह सकते हैं कि एक वर्ष में शासन के पास लाखों शिकायतें दर्ज होती हैं। मगर शिकायतों की अपेक्षा कार्रवाई का अनुपात देखें, तो वह बहुत कम है। बीते वर्ष संभल जनपद की 23 ग्राम पंचायतों में 1.75 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार पाया गया। हरदोई जनपद की भी एक ही ग्राम पंचायत में 12.57 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितताएँ सामने आयीं। ऐसे अनेक मामले उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जनपद में व्याप्त पाये गये हैं। अकेले विकास खंड बड़ोखर ख़ुर्द में हुए लाखों रुपये के भ्रष्टाचार से अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार की स्थिति क्या होगी? सपा कार्यकर्ता दिनेश कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार की ज़ीरो टॉलरेंस नीति के ढोल पीटे जाते हैं; मगर भ्रष्टाचार चरम पर है।

आदेश की अवहेलना

कैसा हो, यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना की जाए? उत्तर प्रदेश में ऐसा ही होता है। अपनी ज़ीरो टॉलरेंस नीति को लाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अनेक बार भ्रष्टारियों अपराधियों एवं माफ़ियाओं को चेतावनी दे चुके हैं; मगर उनकी चेतावनी के उपरांत भ्रष्टाचार एवं अपराध में बढ़ोतरी ही हुई है। माफ़ियाओं का हाल यह है कि बीते दिनों मेरठ के एक माफ़िया ने सरेआम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गाली देते हुए उसका कुछ भी बिगाड़ लेने तक की चुनौती दे डाली। सेवानिवृत्त अध्यापक बलवंत सिंह कहते हैं कि अगर मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन नहीं होता है, उनकी चेतावनी का किसी पर कोई असर नहीं होता है, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि उनके आदेश एवं चेतावनियाँ मात्र जनता को शान्त करने के लिए हैं। अन्यथा ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री कोई आदेश दे अथवा चेतावनी दे, उसका कोई प्रभाव न हो। उत्तर प्रदेश में तो प्रभाव भी उलटा हो रहा है। भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है अपराध भी बढ़ रहे हैं एवं माफ़िया भी लूट मचा रहे हैं। अगर वास्तव में भ्रष्टाचारियों, अपराधियों एवं माफ़ियाओं के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होती, तो उत्तर प्रदेश में वास्तव में राम राज्य होता।

ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अधिकांश ग्रामीण मौन साध लेते हैं। उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने कुछ कहा, तो उनके कार्य ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि एवं अधिकारी नहीं करेंगे। मगर कुछ ग्रामीण ऐसे हैं, जो इसकी परवाह नहीं करते वे भ्रष्टाचार की शिकायतें करते रहते हैं, जिससे भ्रष्टाचार की परतें खुलती रहती हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि ग्राम पंचायतों में होने वाले भ्रष्टाचार पर संज्ञान लें एवं भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के आदेश दें। भ्रष्टाचार की शिकायतों एवं कार्रवाई का अनुपात देखकर भी लंबित पड़े एवं ठंडे बस्ते में डाल दिये गये मामलों में कार्रवाई की जा सकती है।

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