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खेजड़ी : थार-शोभा | Pavitra India

ढाक, कदम, खजूर, खैर, कैर
सब थे गाँव में,
आँगन में नीम और आम,
पिछवाड़े में इमली, महुआ।

एक माँ और कई पेड़ों वाला वह घर
खेजड़ी से घिरा था
वृक्ष ही थे माँ के संगी
बरगद, खेजड़ी, अठरून की कई कहानियाँ
वह हमें सुनाया करती थी

माँ जिस तरह से याद करती थी खेजड़ी को
उस तरह से उसने याद नहीं किया किसी को
वह मुख से कहती—खेजड़ी
मन से सुनने वालों को लगता
बिछड़े प्रेमी का नाम ले रही है

यह उसका साहस ही था
कि वह सूखे सरोवर, कुएँ, खेत देखकर भी
हरियाली की बातें करती थी

जेठ में दो ही चीजें हरी रहती थीं गाँव भर में—
एक खेजड़ी, दूसरी माँ
फटी धरती, सूखे सरोवर के पास
उदासी नहीं, प्रार्थना छोड़कर आती थी वह

खेत की बात हो तो
वह खेजड़ी की जड़ से बने
हल की बात करती थी

मेवे की चर्चा हो तो खोखा की
चारे की चर्चा हो तो लूँग की

मेले की चर्चा हो तो
वह याद करती थी
खेजड़ली गाँव का
भादो सुदी दशमी का मेला
जहाँ उसकी चोटी से
हरा फीता खुलकर गिरा था

जहाँ अणदोजी और अमृता का नाम
कितने आदर से लेते थे सब लोग
वहीं तब ही
उसने सोचा था
कि वह अपनी गुड़िया का नाम
अमृता रखेगी

माँ बताती थी—
बारहसिंगी में टाँगकर गांडीव
जब अज्ञातवास में गए थे अर्जुन
खेजड़ी आशीष का हाथ उठाए
खड़ी थी तब भी

माँ समझाती थी—
पंचकूटा की सब्ज़ी में
सांगरी, गूंदा,केर का फल,
कूमटा के बीज और काचरी होती है
जबकि जीवन में—
प्रेम, विषाद, धोखा, विश्वास और प्रार्थना

माँ खेजड़ी थी
या खेजड़ी माँ
दोनों लंबे समय तक साथ चलीं
सहोदर बहन-सी

वह दलान की कथा
रसोई में पसार देती थी
लूँग खाते देख ऊँट को
कितना रंभाती थीं गायें

वह घी नहीं
मानो नन्हें पीले मींझर
पिघलाकर रोटी पर लगाती थी

वह कल्पवृक्ष थी
जो सबकी भूख मिटाती थी

विषखोपरा को वह कहती—
जन्म-जन्म का बैरी

अरब वालों का ग़फ़ ही तो था
माँ की खेजड़ी

छपनिया अकाल और खेजड़ी की छाल
कहकर उसकी आँखें डबक उठती थीं

रातू जब भी कहता—
“माँ, जानती हो
जड़ में उसके राइजोबियम है”
वह झट से कहती थी—
“नहीं रे! देवता रहते हैं
जड़ में खेजड़ी के”

“विज्ञान सब जान ले
ज़रूरी तो नहीं?”

रातू हँसकर कहता था—
“माँ, इस बार उत्तर में
जीवाणु के बदले देवता लिखकर आऊँगा
फिर खेजड़ी की टहनी मत ढूँढ़ना
मुझे पीटने के वास्ते”

विजयादशमी की सुबह
वह उठकर आँगन लीपने लगती थी
उसे याद आता था
पिता का पित्तदोष
और दवा—खेजड़ी की

मारवाड़ी मेवा है खोखा
मेरी माँ ने बस
एक यही महँगी चीज़
कई बार खाई

एक मच्छरदानी-सी तार-तार
ज़िंदगी में
जिसमें फँसी थीं कई मछलियाँ

माँ के भीतर
बारह धारों वाली नदी
और असंख्य मौसम थे
वह दिखती शुष्क थी
पर उसके भीतर
एक नदी थी—
कई धारों वाली

वह खेजड़ी थी
खेजड़ी माँ थी

— अनामिका अनु

*गूंदा (लसोड़ा का फल)

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