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विस्थापन की दास्ताँ | Pavitra India

महात्मा गाँधी जी ने हमारे देश के साडेछह लाख गाँवों के आत्मनिर्भर करने की बात कही थी. लेकिन आज हमारे देश के शहरीकरण के चक्र में तथा विभिन्न परियोजनाओं के कारण गाँव के आत्मनिर्भर होने की बात तो बहुत दूर है. आज हमारे देश के गाँव तथाकथित विकास की आँधी दौड मे नष्ट हो रहे हैं.

महाराष्ट्र के शहरीकरण मे मुंबई, पुणे, नाशिक, औरंगाबाद, नागपुर, कोल्हापूर, सांगली, सातारा, सोलापूर, अमरावती, नांदेड, जलगांव, ठाणे, भिवंडी, जैसे शहरों के कही पच्चीस किलोमीटर तो कहा पर पचास किलोमीटर के इर्द-गिर्द की सिमाओ को लांधकर शहरो का विस्तार अधिकृत रुप से किया जा रहा है. इसलिए अब साडेछह लाख गाँवों में से सचमुच कितने गाँव बचे हैं ? इस बारे में मुझे शक है. इसी कड़ी में वर्तमान प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी ने अपने आप को गंगापुत्र से लेकर विकास पुरुष तथा विश्व गुरू के भी नाम से प्रचारित कर लिया है. लेकिन उसके लिए उन्हिके संसदीय क्षेत्र, वाराणसी जो उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल जिसकी जनसंख्या उत्तर प्रदेश की एक चौथाई जनसंख्या का क्षेत्र 6 करोड से अधिक लोकसंख्या मे पिछले बारह सालों से विकास के नाम पर वाराणसी तथा पूर्वांचल के क्षेत्र के गांँवों की विस्थापन की विभीषिका का खांका बनारस की एक्टिविस्ट और मुक्त पत्रकार अपर्णाजी ने ‘आफत मे गाँव’ शिर्षक से 167 पन्नौकी किताब में वाराणसी के लेकर आजमगढ़, चंदौली के गांँवो मे खुद जाकर अपनी आंखों से वहा पर विस्थापित लोगों के साथ मिल कर वह अपनी आजीविका चलाने के लिए आफत मे फंसे लोगों के साथ बातचीत करते हुए 21 स्टोरीयो के साथ यह किताब लिखी है. लगभग यह हमारे देश के सभी आफत मे फंसे हुए गाँवों की प्रातिनिधिक दास्तान है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आयेदिन देश के प्रमुख अखबारों के प्रथम पन्नौ पर उत्तर प्रदेश – उत्तम प्रदेश जैसे विज्ञापन छपवाने के परिप्रेक्ष्य में आफत मे फंसे गाँवों की दास्तान पढकर मै हैरान हो गया हूँ. कल ही मैंने हिटलर के बारह साल के जर्मनी में सत्ताधारी रहने के कार्यकाल का लेखा-जोखा लिखा हुआ साडेछहसौ पन्नौकी ‘हिटलर’ शिर्षक की किताब में डॉ. गोबेल्स ने जर्मन मिडीया को किस तरह से नाझी जर्मनी के दौर के प्रचार-प्रसार को एकतर्फा चलाया था. यह आफत मे गाँव को पढकर मुझे लग रहा है कि वर्तमान में हमारे देश के मुख्य धारा के मिडिया मे देश की असली तस्वीर पिछले बारह सालों से गायब है और इसलिए अपर्णाजी की ‘आफत मे गाँव’ जैसे रिपोर्टाज लिखें जाना और भी महत्वपूर्ण है.

हालांकि 79 साल से अब तक किसी भी दल की सरकारने विभिन्न परियोजनाओं के कारण तथा खेती किसानी के क्षेत्र में चल रहे संकटों की वजह से हो रहा विस्थापन के आंकड़े विधिवत रूप से देने का कष्ट नहीं किया है . 2019 – 20 के करोना काल में जब लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूरों को अपने – अपने घरों को अपने माथेपर सामान लादकर वापस लौटने का नजारा देखने के बाद पता चला है कि हमारे देश की एक चौथाई आबादी अपने जीवन- यापन करने के लिए देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक जाने के लिए मजबूर है. लेकिन इस विषय पर आजादी के पहले भी परियोजना के कारण होने वाले विस्थापन के खिलाफ आंदोलन हूऐ है. जिसमें से पुणे के पास मुळशी तहसील मे टाटा कंपनी के द्वारा बनाया जाने वालीं जलविद्युत परियोजना के विरोध का आंदोलन स्वतंत्रता सेनानी सेनापति बापट के नेतृत्व में होने का (1921 – 24) दस्तावेज है. यह भारत के पहले बांध के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन के रुप में दर्ज है.8 दिसंबर के दिन 95 साल की उम्र में समाजवादी डॉ. बाबा आढाव की जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र के विभिन्न परियोजनाओं के विस्थापन को लेकर संघर्ष करने मे ही व्यतीत हुआ है लेकिन एक भी जगह पर संपूर्ण पूर्नवास नहीं हो सका यह उन्होंने मुझे बताया था. गोंवा के एक्टिविस्ट क्लाड अल्वारिस तथा झारखंड – छत्तिसगढ की वासवी किडो, ग्लैडसन डुंगडुंग, तथा भारत के पूर्व अनूसूचीत जनजाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. बी. डी. शर्माजी ने भी गाँव तथा आदिवासी समस्याओं के उपर किताबे लिखने का प्रयास किया है. उसी कडी मे अपर्णाजी का यह प्रयास दिखाई दे रहा है.

वैसे ही झारखंड के आदिवासीयो के द्वारा जल-जंगल – जमीन को बचाने के आंदोलनो का इतिहास तो (1832 – 33) का कोल विद्रोह और (1895 – 1900) बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान विद्रोह शामिल है. यह मुंडा विद्रोह के रूप में जाना जाता है. जिसे देख कर ही अंग्रेजी ने भारत में शासन शुरू करने के तुरंत बाद होने के बावजूद अंग्रेजों को ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट’ जैसे कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था .लेकिन पिछले बारह सालों से लगातार इन सभी प्रावधानो की अनदेखी करते हूए, वर्तमान सरकार भारत मे आदिवासीयों की जनसंख्या का अनुपात 8.5 %है. लेकिन उनके विस्थापन का अनुपात 75 % है. क्योंकि विभिन्न प्रकार के खनिजों को खोदने के लिए प्रायवेट सेक्टरों को अपने पसंदीदा धनकुबेरोंको सौप रही है. जमीन पर बचा-खुचा जंगल को उजाडकर हमारी हजारों सालों के प्राकृतिक उर्जा स्रोत को नष्ट करने का सिलसिला जारी है. माधव गाडगीळ जैसे आंतरराष्ट्रीय पर्यावरण विशेषग्य के कमिटी के रिपोर्ट तथा आदिवासीयों के लिए बनाऐ गए सभी संविधानिक प्रावधानों (5 वीं और 6 ठी अनुसूचि तथा भूरिया कमेटी के पेसा एक्ट ) की सूचनाओं को अनदेखा करते हूए अब हिमालय जैसे क्षेत्र में लोगों की धार्मिक भावनाओं को भडकाते हूऐ चारधाम यात्रा के लिए चौड़ी सडकों का निर्माण करते हूए, भूस्खलन का संकट मोल लेना कौन सा विकास (विनाश) का लाभ होने जा रहा है ? जोशीमठ तथा बद्रीनाथ – केदारनाथ जैसे ऐतिहासिक जगह पृथ्वी के पेट में लुप्तप्राय होने की शुरुआत देखकर भी तथाकथित योजनाकारो की आंखे खुल नहीं रही ?

वर्तमान समय में पिछले 12 सालों से लगातार सडकों को चौड़ा करने से लेकर, कुंभमेलो के आयोजनों से लेकर, स्मार्ट सिटीज, की आड़ में गांँवो को उजाडकर शहरों का निर्माण, ट्रांसपोर्ट हब, हवाई अड्डे तथा बुलेट-ट्रेन, स्टिल हब, चारधाम जैसे और जलविद्युत परियोजना, फायरिंग रेंज, तथा औद्योगिकीकरण करने के नाम पर बेतहाशा जमीनों को अधिग्रहण करने के जूनून के वजह से पारंपरिक कारागिरी करते हूए अपने परिवार का सदियों से निर्वहन करते हुए चल रही देश की एक चौथाई आबादी आज भयंकर संकट के दौर से गुजर रही है. क्या उन्हें लाडली बहना बोलते हूए चंद रुपये सौपने से उनके जीवन मे खुशहाली आने वाली है ? हमारे देश की राजधानी का वायूप्रदूषण विश्व का सबसे बड़ा प्रदूषित शहर को देखकर डेनमार्क की बॅडमिंटन खिलाडी एंडर्स एंटोनसेन टूर्नामेंट के मेजबान दिल्ली शहर की वायुगुणवत्ता गंभीर श्रेणी मे होने की वजह से में खेलने से मना करते हूए लाखों रुपये का जुर्माना देना स्विकार करना. क्या हमारे देश के वर्तमान पर्यावरण को लेकर हमारे देश के मुंहपर झन्नाटेदार तमाचा नहीं है ?
इसी विषय पर बनारस की अपर्णाजी जैसी एक्टिविस्ट पत्रकार मित्र ने हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी के लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत तथा पूर्वांचल के क्षेत्र में विकास के नाम पर वाराणसी, आजमगढ़, चंदौली मे जमीनों को अधिग्रहण करने के वजह से उस क्षेत्र के सभी प्रकार के कारागिर तथा मछुआरे मेहनतकश लोगों का जीवन कैसे संकट के दौर से गुजर रहा है, इसको लेकर आफत मे गाँव शिर्षक की 167 पन्नौकी अगोरा प्रकाशन की किताब 2026 नऐ साल की किताब दो हफ्ते पहले ही मेरे हाथ में आई है. इस किताब में कुल 21 जगहों पर जाकर अपर्णाजी ने स्पॉट रिपोर्ट लिखने की कोशिश की है. जिसमें उन्होंने महंगाई तो बढी लेकिन उस तुलनामे गाँव के मजदूरों को उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के इस रिपोर्ट में कही भी सरकार के द्वारा तय किया गया वेतनमान नहीं दिया जा रहा है तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी किसी को नहीं मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है यह कौन सा उत्तम प्रदेश है ? वर्तमान टेबल जर्नलिज्म के दौर मे कुछ उंगलियों पर गिनती वाले पत्रकार या एक्टिविस्ट है जो इतना कष्टदायक काम करते हूए असली स्थिती को उजागर करने का प्रयास रहे हैं. उसमे से अपर्णाजी भी एक है. उनके जज़्बे को मेरा सलाम .

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