नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार ‘खेला’ का मतलब पूरी तरह बदल चुका है। अब लड़ाई सिर्फ भाषणों और रैलियों की नहीं, बल्कि सीधे महिलाओं के खातों में जाने वाले पैसों की है। 2026 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाता सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरी हैं। राज्य में करीब 3.16 करोड़ महिला वोटर्स हैं, जो कुल वोटर्स का लगभग आधा हिस्सा हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। पार्टी ने महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये देने का वादा किया है। यह सिर्फ एक चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। इससे पहले मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में इसी तरह की योजनाओं का असर देखने को मिला, जहां महिला वोटर्स ने चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाई।
दूसरी तरफ, ममता बनर्जी की सरकार पहले से ही ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना चला रही है, जिसमें महिलाओं को हर महीने आर्थिक मदद दी जाती है। यह योजना टीएमसी के लिए मजबूत वोट बैंक साबित हुई है। लेकिन भाजपा ने अब इससे ज्यादा रकम का वादा कर सीधा मुकाबला खड़ा कर दिया है। ऐसे में मुकाबला अब ‘कौन ज्यादा देगा’ पर आकर टिक गया है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आज की महिला वोटर पहले से ज्यादा जागरूक हो चुकी है। अब वे सिर्फ परिवार या समाज के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक जरूरतों और फायदों को ध्यान में रखकर वोट कर रही हैं। यही वजह है कि सभी पार्टियां अब महिलाओं को साधने में जुटी हैं।
भाजपा ने सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं, बल्कि युवाओं को भी साथ जोड़ने की कोशिश की है। बेरोजगार युवाओं के लिए भी आर्थिक मदद का वादा किया गया है, जिससे एक बड़ा ‘युवा+महिला’ वोट बैंक तैयार हो सके।
अब सवाल यही है कि क्या भाजपा का यह नया दांव ममता बनर्जी के मजबूत वोट बैंक को हिला पाएगा, या फिर महिलाएं पुरानी योजनाओं पर ही भरोसा जताएंगी। इसका जवाब चुनाव नतीजों में ही मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार बंगाल की सत्ता की चाबी महिलाओं के हाथ में है।
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