माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,
आपका आज ही समाप्त हुआ पांच दिनों का विदेश दौरा संपन्न हुआ। इस दौरान आपने नॉर्वे का दौरा किया, जो एक छोटा सा यूरोपियन देश है और जिसकी जनसंख्या हमारे नागपुर के आस-पास की है; लेकिन वह एक स्वतंत्र देश है। वहाँ की राजधानी ओस्लो में एक शिष्टाचार पत्रकार वार्ता के दौरान, एक नॉर्वेजियन महिला पत्रकार हेले लिंग ने भारत की परिस्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने भारत में अभिव्यक्ति की आजादी, पिछले 12 सालों से लगातार भाजपा की तरफ से संसद से लेकर सड़क तक होने वाले धरना-प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों पर चल रही कार्रवाइयों से लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न किए। साथ ही, उन्होंने आपके सत्ता में आने के बाद भारत में रह रहे सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती असुरक्षित भावना और भारतीय संसदीय प्रणाली के स्खलन से लेकर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल किए।
इन सवालों के बाद, 145 करोड़ आबादी और पांच हजार साल पुरानी सभ्यता वाले देश के प्रधानमंत्री होने के बावजूद, आप उस पत्रकार के सवाल का जवाब देने से बचने के लिए सीधे उठकर चल दिए। क्यों? आप तो खुद बहुत ही हिम्मतवाले होने का दावा करते हैं, फिर एक पत्रकार के सवाल से ही आप क्यों डर गए? और आप सिर्फ डरे ही नहीं, बल्कि जवाब देने के लिए विदेश सेवा के एक अफसर को बैठा दिया। वे महाशय पूछे गए सवालों के जवाब देने की जगह भारत की पांच हजार साल पुरानी सभ्यता का बखान कर रहे थे। लेकिन उसी महान संस्कृति के देश के वर्तमान प्रधानमंत्री, एक पत्रकार के सवालों का जवाब देने से टालमटोल कर कौन सी सभ्यता का परिचय दे रहे थे?
इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि भारत में इस मुद्दे को लेकर आरएसएस की ‘सैफ्रॉन डिजिटल आर्मी’ उस महिला पत्रकार की स्विमसूट वाली फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर अपनी पांच हजार सालों की महान संस्कृति का भद्दा प्रदर्शन कर रही है। ओस्लो की प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रश्न करने पर, भारतीय मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने (अंग्रेजी-हिंदी बोलने वाली महिला पत्रकारों को विशेष रूप से तैनात करके) उस नॉर्वेजियन महिला पत्रकार से पूछा कि आपने भारत के बारे में कौन सी किताबों को पढ़ा है? क्या हमारे भारतीय मुख्यधारा के मीडिया में काम कर रहे पत्रकारों ने खुद पिछले 12 सालों से लगातार भाजपा की बीन बजाने के सिवा और किसी पत्रकारिता धर्म का पालन किया है? उन्होंने खुद कौन सी किताबों का अध्ययन किया है, जिसके भरोसे वे वर्तमान पत्रकारिता का स्तर नीचे गिराने का काम कर रहे हैं?
दुनिया में सिर्फ आपके अकेले के चैनल या अखबार नहीं चलते हैं। दुनिया के लगभग 200 देशों में करोड़ों भाषाओं में अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विभिन्न चैनलों पर संपूर्ण विश्व की जानकारी प्रसारित होती है। कुछ पत्रकार तो अपनी जान जोखिम में डालकर भी पत्रकारिता के धर्म का पालन कर रहे हैं। दूसरी तरफ एक आप हैं। आपातकालीन परिस्थिति में भी, आज से पचास साल पहले गौरकिशोर घोष, कुलदीप नायर, राजमोहन गांधी, अनंतराव भालेराव, यदुनाथ थत्ते, प्रभाष जोशी, मा. गो. वैद्य, सुरेश द्वादशीवार, बी. जी. वर्गिस और लालकृष्ण आडवाणी जैसे सैकड़ों की संख्या में पत्रकारों और संपादकों ने अभिव्यक्ति की आजादी के लिए बड़ी कीमत चुकाई थी। जब एक विदेशी पत्रकार अपना काम कर रही थी, तो उसके सवालों के जवाब न देकर हमारे प्रधानमंत्री जी ने भारत का कौन सा सम्मान बढ़ा दिया? उल्टा, आपकी पत्रकार वार्ता से इस पलायन को देख कर हम सभी भारतीयों की गर्दन शर्म से नीचे हो गई है।
145 करोड़ आबादी के देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, आप नॉर्वे कोई तफरीह करने के लिए तो गए नहीं थे और न ही यह आपका कोई वैयक्तिक मामला था। आप भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से ही उन देशों की यात्रा पर भारत के संबंधों को मजबूत करने के लिए गए थे। तो वहाँ की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत की वर्तमान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसदीय जनतंत्र को लेकर आपको ऐसा क्या अटपटा सवाल लगा कि आप गुस्से में पत्रकार वार्ता से ही निकल गए? इससे आप क्या मैसेज देकर आए, मोदी जी? आपने खुद ही भारत को विश्व की ‘संसदीय जनतंत्र की जननी’ कहा है। अगर आपकी बात में सच्चाई है, तो उस पत्रकार को कहना चाहिए था कि हाँ, भारत ही दुनिया का पहला देश है जहाँ से संपूर्ण विश्व ने जनतंत्र के मॉडल का अनुकरण किया है।
लेकिन आपको पत्रकारों का इतना फोबिया क्यों है? इसी महीने में आपके प्रधानमंत्री बनने के 12 साल पूरे हो रहे हैं और इन बारह सालों में आपने अभी तक एक भी आधिकारिक पत्रकार वार्ता नहीं बुलाई। जबकि आपके पहले के हर प्रधानमंत्री ने विज्ञान भवन में कम-से-कम साल में एक बार, या कोई महत्वपूर्ण बात होने पर दो बार भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी और देश-विदेश के सभी पत्रकारों के सवालों के जवाब देने का काम किया था। एक आप ही हैं जो संसद के कामकाज में भी अक्सर गैरहाजिर रहते हैं और आपके एवज में अन्य मंत्रियों को विरोधियों के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। क्या आपको स्वतंत्र पत्रकार या संसद में कोई भी विरोधी पार्टी नहीं चाहिए, जिससे आपको सवालों के जवाब देने की आवश्यकता ही न पड़े? यह तो जनतंत्र के बिल्कुल खिलाफ है।
यदि आपको संसदीय शासन प्रणाली में सचमुच विश्वास है, तो आपको पत्रकारों का सम्मान करना चाहिए, जो हमारे जनतंत्र के चार खंभों में से एक हैं। जिस आजादी का हरण आपातकाल के दौरान 21 महीनों के लिए हुआ था, उसे लेकर आप पिछले पचास सालों से लगातार 25 जून को ‘अभिव्यक्ति हरण दिवस’ के रूप में मना रहे हैं। इसे हम भी मनाते आ रहे हैं, क्योंकि हम भी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के सिपाहियों में से एक होने के नाते आपातकाल के खिलाफ जेल गए थे। लेकिन आज, 51 साल पहले के आपातकाल का कर्मकांड के रूप में विरोध करने के साथ-साथ, पिछले 12 सालों से लगातार एक अघोषित आपातकाल आप भी चला रहे हैं और इसके खिलाफ बोलने वाले लोगों को सालों-साल जेलों में बंद कर रहे हैं।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने तो सिर्फ 21 महीने यानी दो साल से भी कम समय के लिए आपातकाल लगाया था, लेकिन आपने तो 2014 से ही लगातार प्रेस की स्वतंत्रता का हरण कर लिया है। इसी कारण आज हमें सिर्फ आपकी ‘मन की बात’ और भाजपा तथा आरएसएस की खबरों के अलावा कुछ और देखने-सुनने को नहीं मिलता। चैनलों पर पाकिस्तान में इमरान खान को जेल में कैसे प्रताड़ित किया जा रहा है, वहाँ से लेकर इजराइल के महिमामंडन करने के ही समाचार देने की व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ, फिलिस्तीन के साथ गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक और लेबनान में आए दिन इजराइल हमले करते हुए अपना भूगोल बढ़ाने का काम कर रहा है। क्या यही विश्व के जनतंत्र की जननी भारत का मानवीय पक्ष है?
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, मैं पिछले पंद्रह साल से अधिक समय से फिलिस्तीन की समस्या का समाधान तलाशने वाले चंद लोगों में से एक हूँ। मैं दो बार फिलिस्तीन, गाजा पट्टी और लेबनान भी गया हूँ। इसलिए मेरी आपसे गुजारिश है कि इजराइल 1948 से ही फिलिस्तीनियों के साथ अन्याय कर रहा है और भारत ने आपके प्रधानमंत्री बनने के पहले तक हमेशा फिलिस्तीन का समर्थन किया था। आपने 26 फरवरी को युद्ध शुरू होने के कुछ घंटे पहले इजराइल में जाकर, भारत का पिछले 88 सालों से फिलिस्तीन की तरफ चल रहा समर्थन केवल बाधित ही नहीं किया, बल्कि इजराइल जैसे एक ‘जियोनिस्ट स्टेट’ को समर्थन देकर बहुत बड़ी भूल की है।
आज इसी वजह से भारत को तेल और गैस के संकटों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें आपके अमेरिका के राष्ट्रपति मित्र ट्रंप भी आपको दोस्त बोल रहे हैं और शायद आप भी उन्हें दोस्त ही बोल रहे होंगे। आप दुनिया के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की उम्मीदवारी का चुनाव प्रचार करने के लिए वहाँ गए थे। आपकी उनके साथ घनिष्ठता को देखकर तो लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के बाद भारतीय हितों का ध्यान रखेंगे। लेकिन पता नहीं उन्हें क्या लग रहा है कि वह भारत की आर्थिक स्तर से लेकर गंदे शब्दों में लगातार भर्त्सना करते जा रहे हैं। दूसरी तरफ आप हैं, जो भारत के विरोधियों की हर बात में उन्हें विदेशी शक्तियों के हाथों में खेलने का आरोप लगाते हैं। आप डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के बेंजामिन नेतन्याहू के साथ कौन सी राजनीति खेल रहे हैं? दोनों ही भारत की मिट्टी पलीद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
और एक आप हैं कि उन्हें खुश करने के लिए भारत में रह रही 20 करोड़ मुस्लिम आबादी (जो इजराइल से बीस गुना ज्यादा जनसंख्या है) के लोगों के साथ पिछले 12 सालों से लगातार ‘सेकंड ग्रेड सिटीजन’ जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मैं फिर से आपको आगाह कर रहा हूँ कि आप भारत को फिर से बंटवारे की तरफ ले जाने की गलती कर रहे हैं। आपके मुख्यमंत्री आए दिन मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आर्थिक स्थिति से लेकर धार्मिक बातों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। आप सभी ने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के पहले हमारे देश के संविधान के अनुसार शपथ ग्रहण की थी; इसके बावजूद आप सभी उस शपथ का उल्लंघन आए दिन किए जा रहे हैं। इस बात पर आप सभी को संविधान के उल्लंघन के आरोप में अयोग्य (Disqualify) क्यों नहीं ठहराया जाना चाहिए?
इस 26 जून को आपातकाल की घोषणा के 51 साल पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी लोग आपातकाल की सेंसरशिप और नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी के हनन (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक) के 21 महीनों के काल को लेकर छाती पीट-पीटकर कांग्रेस को खूब कोसने वाले हैं। हम खुद भी कांग्रेस के इस आपातकाल में कुछ समय जेल में थे। जब हमने जेल में आकर देखा कि कुछ आरएसएस और जनसंघियों को भी जेल में बंद किया हुआ है और वे जेल से बाहर आने के लिए छपे हुए माफीनामों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं, तो हमने उनसे कहा था कि माफीनामे पर हस्ताक्षर करने की कोई जरूरत नहीं है; बहुत ही जल्द श्रीमती इंदिरा गांधी चुनाव की घोषणा करने वाली हैं और उससे पहले वे सबको छोड़ देंगी।
लेकिन उन लोगों ने कहा कि हमारे आरएसएस प्रमुख श्री बालासाहब देवरस ने भी पूना की येरवडा जेल से माफीनामे पर हस्ताक्षर किए हैं, इसलिए हम सभी को इस आदेश का पालन करना है। हो सकता है कि शायद श्रीमती इंदिरा गांधी इसी वजह से चुनाव की घोषणा करने जा रही थीं। हम उन लोगों से बोलते थे कि “यह जो श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा करके आपको और हमें जेल में बंद किया है, यह तो कुछ भी नहीं है; क्योंकि कांग्रेस एक ढीली-ढाली पार्टी है, इसलिए यह आपातकाल भी ढिलाई वाला ही है।” आपातकाल के दौरान आरएसएस की शाखाओं से निकले हुए पुलिस वालों ने ही मुझे अंडरग्राउंड रहने में काफी दिनों तक मदद की थी।
जब जॉर्ज फर्नांडिस को कलकत्ता में 10 जून 1976 के दिन सेंट पॉल कैथेड्रल में गिरफ्तार किया गया, उसके चार महीने बाद बड़ौदा डायनामाइट के आरोप में मुझे भी अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में बहुत ही हास्यास्पद सामग्री के साथ अमरावती में गिरफ्तार किया गया था, जिसके कोर्ट में टिकने की कोई संभावना नहीं थी। वही हुआ भी; कोर्ट ने उल्टा पुलिस को डांटकर कहा था कि “अगर ऐसी सामग्री से सरकार को अपदस्थ करना होता, तो सरकार काफी पहले ही कब की अपदस्थ हो जानी चाहिए थी।” मेरी राय में, पुलिस प्रशासन में आरएसएस की भर्ती 1925 से ही होने की वजह से इंदिरा गांधी का आपातकाल बहुत ही ढीला-ढाला था। लेकिन मैंने तब भी चेतावनी दी थी कि निकट भविष्य में अगर आप लोग सत्ताधारी पार्टी बनोगे, तो बगैर आधिकारिक आपातकाल लगाए ही आप लोग हमारे जैसे लोगों का जीना हराम कर दोगे।
आज पिछले 12 सालों से लगातार हम और पूरी दुनिया भी इस अघोषित आपातकाल की परिस्थिति से भली-भांति परिचित हैं। इन लोगों ने 12 सालों से लगातार सत्ता में रहने के बाद, आज तक बगैर किसी आपातकाल की घोषणा किए और बगैर किसी आधिकारिक सेंसरशिप के, पिछले बारह सालों से लगातार भारत में अघोषित आपातकाल और सेंसरशिप जारी रखी है। इसीलिए आज अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर वैश्विक स्तर पर भारत 157वें पायदान पर खड़ा है।
नरेंद्र मोदी जी, जब आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों को लेकर उस समय बीबीसी की महिला पत्रकार ने आपसे सवाल पूछा था कि “आपकी तरफ से इस दंगे में ऐसी कौन सी गलती हो गई थी?” तब आपने तुरंत जवाब दिया था, “मीडिया को कंट्रोल नहीं कर सका, यह सबसे बड़ी गलती हो गई थी।” मई 2014 में भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद आपने सबसे पहले मीडिया को अपने पसंदीदा पूंजीपतियों (अडानी-अंबानी) की मदद से कब्जे में लेने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए और लगभग सभी मुख्यधारा के चैनलों तथा अखबारों को नियंत्रित कर लिया। प्रणय रॉय ने अपनी मेहनत और हुनर से जो एनडीटीव्ही (NDTV) खड़ा किया था, उसे अडानी से शेयर खरीदवाकर एक सुनियोजित साजिश के तहत कब्जे में ले लिया गया। यह तथ्य पूरी दुनिया जानती है।
आपने लगभग सभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया पर पूरी तरह कंट्रोल कर लिया है। उसके बाद बॉलीवुड से बनने वाली हर तरह की फिल्मों, टीवी सीरियल्स और कॉमेडी शोज से लेकर मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों पर नियंत्रण कर लिया गया। इसके अलावा मोबाइल फोन पर आने वाले विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अभिव्यक्ति के ऐप्स पर भी लगाम कसना शुरू कर दिया है। इस तरह अभिव्यक्ति के हर माध्यम पर नियंत्रण करने वाली राजनीतिक पार्टी और उसके मातृ संगठन आरएसएस को भला 21 महीने चले आपातकाल और सेंसरशिप की 51 साल पहले की घटना को लेकर 25 जून को आपत्ति करने का कौन सा नैतिक अधिकार बचा है?
-------------------------------
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें। Pavitra India पर विस्तार से पढ़ें मनोरंजन की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
Facebook | Twitter | Instragram | YouTube
-----------------------------------------------
. . .