Posts

गटर किसने खोलीं? फिल्म बनेगी: कॉकरोचों का इंतकाम | Pavitra India

https://ift.tt/4DvFmeQ

बृज खंडेलवाल

दिल्ली में फिर वही मौसम लौट आया है। नहीं, यह बरसात का मौसम नहीं। संसद का भी नहीं। यह है सियासी केंचुल बदलने का मौसम। नेता अपने उसूल साँप से भी तेज़ी से बदल रहे हैं। गठबंधन स्याही सूखने से पहले टूट रहे हैं। धरने-प्रदर्शन देखते ही देखते समेटे जा रहे हैं। कल की इंक़लाबी हुंकार आज प्रेस कॉन्फ़्रेंस बन जाती है। आज का गुस्सा कल इस्तीफे पर खत्म हो जाता है। ताज़ा ब्लॉकबस्टर भी वक्त पर आ गई। एक इस्तीफा, कुछ नाटकीय ऐलान, सोशल मीडिया पर शानदार तमाशा, और देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जीत का एलान कर दिया। बैनर समेटे गए, लाउडस्पीकर बंद हुए और सब घर लौट गए, जैसे इतिहास की दिशा ही बदल गई हो।

और हाँ… गाजर भी आई। एक बार नहीं। दो-दो बार। जब नेताजी इंस्टाग्राम पर हाथ में गाजर लेकर देश से बातें करने लगें, तो समझ लीजिए कि भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है, जिसकी कल्पना संविधान बनाने वालों ने भी नहीं की होगी। अर्थशास्त्री संदेश ढूँढ़ते रहे। मनोवैज्ञानिक उसके मायने तलाशते रहे। किसान सोचने लगे कि क्या अब गाजर भी कोई नई विचारधारा बन गई है। उधर मीम बनाने वालों ने तो गाजर को सीधा कैबिनेट मंत्री घोषित कर दिया। इस बीच डिचकॉक ने अगली फिल्म का ऐलान कर दिया है: “कॉकरोच फिर लौटेंगे!”

वैज्ञानिक आज भी कॉकरोच पार्टी पर हैरान हैं। परमाणु बम शहर मिटा सकता है। बाढ़ पुल बहा सकती है। चुनाव सरकारें गिरा सकते हैं। लेकिन तिलचट्टे हर बार मुस्कुराते हुए वापस आ जाते हैं। हाथ में एक तरफ इस्तीफे की माँग, दूसरी तरफ भविष्य के गठबंधन का गुलदस्ता। इतनी जबरदस्त अनुकूलन क्षमता तो शायद डार्विन ने भी नहीं सोची होगी। सत्ता पक्ष उस स्कूल के हेडमास्टर जैसा है, जिसे लगता है कि सुबह का सूरज भी उसकी इजाज़त लेकर निकलता है। हर उपलब्धि दूरदर्शी नेतृत्व का कमाल है। हर आलोचना साज़िश है। और जो ज़्यादा सवाल पूछे, उसे विकास-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी या हालात खराब हुए तो गाजर-विरोधी भी घोषित किया जा सकता है।

फिर बारी आती है विपक्ष की। चलते नहीं। दौड़ते भी नहीं। बस… कॉकरोचों की तरह सर्र से निकल लेते हैं। सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है: जिंदा रहना। इस हफ्ते दहाड़ेंगे। अगले हफ्ते बातचीत करेंगे। उसके अगले हफ्ते लोकतंत्र बचाने का श्रेय भी खुद ले लेंगे। नई पीढ़ी ने CJP का नया मतलब निकाल लिया है। अब इसका अर्थ कॉकरोच जनता पार्टी नहीं। बल्कि सर्टिफाइड जंपर्स पार्टी है। इसका चुनाव चिन्ह कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल या हाथी नहीं होना चाहिए। एक घूमता हुआ दरवाज़ा होना चाहिए। सदस्य बनने के नियम भी आसान हैं। किसी विचारधारा की ज़रूरत नहीं। सिद्धांत हों तो अच्छा, न हों तो और भी अच्छा। बस एक छोटा बैग, तीन माइक, भरपूर नैतिक गुस्सा और ऐसी रीढ़ चाहिए जो बिना दर्द के 360 डिग्री घूम जाए।

सुना है पार्टी की ट्रेनिंग अकादमी में खास कोर्स भी चलते हैं। “अगली सूचना तक धरना कैसे दें” “यू-टर्न लेने की उन्नत कला” और सबसे लोकप्रिय विषय: “स्कोर चाहे कुछ भी हो, जीत का एलान कैसे करें।” दीक्षांत समारोह में सबकी फोटो भी खिंचती है। मुश्किल सिर्फ इतनी होती है कि फोटो छपने तक आधे लोग दूसरी पार्टी में पहुँच चुके होते हैं। आजकल प्रेस कॉन्फ़्रेंस किसी रियलिटी शो से कम नहीं।
पहला एपिसोड—लोकतंत्र खतरे में है।
दूसरा—लोकतंत्र बच गया।
तीसरा—सरकार हमारी वजह से झुकी।
चौथा—धरना समाप्त।
पाँचवाँ—जल्द मिलेंगे, नया आंदोलन लेकर।

OTT प्लेटफॉर्म के लेखक भी अब शिकायत करने लगे हैं कि राजनीति की पटकथा उनकी कल्पना से भी आगे निकल गई है। राजनीतिक प्रवक्ता भाषा के सबसे बड़े जादूगर हैं। पीछे हटना रणनीतिक जीत बन जाता है। इस्तीफा नैतिक भूकंप कहलाता है। चुप्पी दूरदर्शिता बन जाती है। और उलझन को रणनीति बताया जाता है। उधर असली कॉकरोचों ने भी नाराज़गी जता दी है। राष्ट्रीय कॉकरोच प्रतिष्ठा महासंघ ने बयान जारी किया: “हम इस तुलना का सख्त एतराज़ करते हैं। हम सिर्फ रसोई में घुसते हैं। नेता टीवी स्टूडियो, व्हाट्सऐप ग्रुप, संस्थाओं और कभी-कभी एक-दूसरे की पार्टियों में भी घुस जाते हैं। शुक्र है, सोशल मीडिया अब देश की सबसे बड़ी व्यंग्य पत्रिका बन चुका है। एक सूटकेस घसीटते कॉकरोच का मीम चार घंटे की टीवी बहस से ज़्यादा सच्चाई दिखा देता है। एक गाजर वाला इमोजी पूरे हफ्ते की राजनीति समझा देता है। लोकतंत्र कोई टैलेंट शो नहीं है, जहाँ हर ब्रेक के बाद कलाकार नई पोशाक पहनकर लौट आएँ। इसे ऐसे हुक्मरानों की ज़रूरत है जो जवाब दें, ऐसे विपक्ष की जो अपने पाँव पर डटा रहे, ऐसे पत्रकारों की जो मुश्किल सवाल पूछें और ऐसे नागरिकों की जो हर तालियों के इशारे पर ताली न बजाएँ।

वरना हर चुनाव सिर्फ कीटनाशक छिड़कने का नया कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। स्प्रे बड़े शोर-शराबे से छिड़का जाएगा। और कॉकरोच हर बार मुस्कुराते हुए लौट आएँगे। तो आख़िर नालियाँ किसने खोलीं? लेकिन हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है। रोशनी मंद पड़ती है। कैमरे बंद हो जाते हैं। दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं डिचकॉक मुस्कुराता है। मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है। और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है – “फिक्र मत कीजिए… इंटरवल खत्म हो गया है!”

-------------------------------

 ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें। Pavitra India पर विस्तार से पढ़ें मनोरंजन की और अन्य ताजा-तरीन खबरें 

Facebook | Twitter | Instragram | YouTube

-----------------------------------------------

.  .  .

About the Author

Pavitra India (पवित्र इंडिया) Hindi News Samachar - Find all Hindi News and Samachar, News in Hindi, Hindi News Headlines and Daily Breaking Hindi News Today and Update From newspavitraindia.blogspit.com Pavitra India news is a Professional news Pla…
Cookie Consent
We serve cookies on this site to analyze traffic, remember your preferences, and optimize your experience.
Oops!
It seems there is something wrong with your internet connection. Please connect to the internet and start browsing again.
AdBlock Detected!
We have detected that you are using adblocking plugin in your browser.
The revenue we earn by the advertisements is used to manage this website, we request you to whitelist our website in your adblocking plugin.
Site is Blocked
Sorry! This site is not available in your country.