मेरे पचास साल से भी अधिक समय के मित्र डॉ. राम पुनीयानी का कुछ मित्रों ने आजसे 25 अगस्त तक एक सप्ताह के लिए जो राम का इस दुनिया में आनेका दिन है. एक हफ्ते का जश्न मनाने की घोषणा देख-कर मुझे यह संस्मरणात्मक लेख लिखने की प्रेरणा हुई है. और वह 25 अगस्त को राम अपने जीवन के एक्यास्सी साल पूरे कर रहा हैं.और उम्र के हिसाब से होनेवाले शारिरिक बदलाव मे जिसे” केमिकल लोचा” एक सिनेमा मे बोलते हूऐ देखा है. वह होने से जून – जुलाई के दोनों महिनो मे वह अपने विकनेस की वजह पता करने के विभिन्न परिक्षणो से गुजर रहा था. और कोइंसिडेंटली उसी दौरान कॅक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन की शुरुआत भी हुई थी. तो मैने हसते हुए कहा था कि “तुम्हारे जीवित रहते हूऐ, ही तुम्हें तुम्हारे जीवन के पचास मतलब अर्धशताब्दि से अधिक समय से चल रहीं बदलाव की कोशिश अब रंग ला रही है. हमारे युवा रहते हूऐ तो सिर्फ युवक आंदोलन या विद्यार्थी आंदोलन जैसे शब्दों को बोला जाता था. लेकिन अब तो जेन जी और अल्फा जेन जैसे नऐ शब्दों के दौर में. इन पचास दिनों मे हम सभी सत्तर की उम्र पार कर चुके एक्टिविस्टो के लिए अब यह सब बदलाव की बयार से ही तुम्हारे भी और हमारे भी शारिरिक और मानसिक कमजोरियों को दुरुस्त होनी है. और इस पूरे घटापट मे हमारे दोस्त को प्राथमिक रूप में रक्त के केंसर के कुछ लक्षण निकले हैं. जो शतप्रतिशत वर्तमान मेडिकल क्षेत्र मे किऐ जा रहे, नऐ – नऐ अनुसंधानों की वजह से राम दुरुस्त हो जायेगा इसमे कोई शक नहीं है.लेकिन इस पूरे दौर मे भी राम जिस तरह से अस्पताल के बेड से भी पाॅडकास्ट और यूट्यूब तथा सभी तरह के सोशल मीडिया पर लगातार वर्तमान समय की स्थिति पर अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त कर रहा था. उससे मै तो बहुत ही अभिभूत हूँ. लेकिन इसी जज्बे के बारे में मेडिकल साइंस का भी कहना है, कि दवा पचास प्रतिशत काम करती है. और पेशंट का आत्मविश्वास पचास प्रतिशत काम करता है. तो राम का आत्मविश्वास कितना है ? यह उसने इन सभी परिक्षणो के दौरान भी जिस तरह से अपने मिशन को जारी रखा. यह देख-कर मैनें उसकी जीवनसाथी और मेरी मित्र डाॅक्टर स्मिता पुनियानी को भी हसते हुए कहा कि” राम को सीजेपी और मेडिकल का इलाज दोनों इस बिमारी से जल्द स्वस्थ करने के लिए काम आने वालें है. भले ही कोई उसे दिमागी नक्सल बोले या अर्बन नक्सल कहे . हाँ हम सभी घोर फासीवादी ताकतों के विरोधी है. और मरते दम तक रहेंगे.फिर हमें कोई भी कुछ भी बोले हम इसकी रत्तीभरभी पर्वा नहीं करते हैं.

दुनिया भर के सभी लोगों को बहुत अच्छे से मालूम है. पिछले 12 सालों से लगातार भारत में जिस तरह का अघोषित आपातकाल का माहौल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा ने शुरू कर दिया है. और देश के रोजमर्रा के सवालों की जगह सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए ही लोकसभा से लेकर भारत की सभी संविधानिक एजेंसियों में जिसमें मुख्यतः चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, मिडिया तथा सभी जांच एजेंसियों को अपने इशारो पर काम करने के लिए, मजबूर कर दिया. यह 1975 मे श्रीमती इंदिरा गांधी के 19 महिनों के लिए घोषित आपातकाल के समय मे सिर्फ सेंसरशिप जारी थी. लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण दूर- दूर तक नहीं था. लेकिन इस लंबे अघोषित आपातकाल के दौर मे सिर्फ हिंदू – मुसलमानों के जुमले के इर्द-गिर्द हमारे तथा राम के जैसे इस देश के सभी परिवर्तनवादी एक्टिविस्टो के लिए दमघोंटू दौर चल रहा है. जिसमें 6 जून 2026 से कॅक्रोच जनता पार्टी के द्वारा शुरू किया गया सार्थक प्रयास से 20 जूते के बाद लगभग एक सप्ताह तक संपूर्ण देश मे 1974 के बाद, पहलीबार हिंदू- मुसलमान अब नहीं चलेगा यह बोलते हूऐ, जेन जी और अल्फा जेन की जनरेशन ने खुदबखुद सबसे पहले साफ करते हूऐ, हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर जो महत्वपूर्ण सवाल उठाकर पहल की है. उससे हमारे जैसे सभी संवेदनशील लोगों को हमारे अपने ही जिवित काल में अघोषित आपातकाल को समाप्त करने के आसार नजर आ रहा है. और मुझे उम्मीद है कि हमारे दोस्त डाॅक्टर राम पुनियानी की तबीयत को बेहतर बनाने के लिए यह बदलाव भी काम आयेगा. और राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा की मानसिक तबियत को बिगाड़ने की वजह से ही वह दुसरों को ऊलजलूल बोले जा रहे हैं.

राम नागपुर के गव्हर्मेंट मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसी मेडिकल काॅलेज में रजिस्ट्रार रहा है.सत्तर के दशक की शुरुआत में ही क्यूबा मे फिडेल कॅस्ट्रो और चे ग्वेरा के साथीयो के द्वारा कीया गया क्रांतिकारी बदलाव. तथा 1968 के मई महीने में फ्रांस मे विद्यार्थियों के आंदोलन जो पेरिस के नांतेर विश्वविद्यालय से शुरू होकर, पूरे फ्रांस मे सेरबोन विश्वविद्यालय तक फैल गया था. इस आंदोलन की मुख मांगों मे विश्वविद्यालय के पुराने नियमों तथा प्रशासनिक तानाशाही, पूंजीवादी व्यवस्था और उस दौरान चल रहे विएतनाम युद्ध का विरोध विद्यार्थी कर रहे थे. इस आंदोलन को फ्रांस के मजदूरों का भी साथ मिलने से लगभग एक करोड़ मज़दूर हडताल पर चले गये थे. जिससे पूरा देश ठप्प हो गया था. जिससे द गाॅल की सरकार को हिलाकर रख दिया था. यह आंदोलन आधुनिक इतिहास का एक क्रांतिकारी मोड माना जाता है. जिसने फ्रांसीसी संस्कृति, राजनीति और फ्रांस की क्रांति के बाद दोबारा फ्रांस के समाज को हमेशा के लिए बदल दिया था. मै खुद उस दौरान मॅट्रिक के क्लास मे पढाई कर रहां था . और राष्ट्र सेवा दल की शाखा प्रमुख की हैसियत से इन सभी घटनाओं को बहुत ही संवेदनशीलता से देख रहा था. और राम नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल काॅलेज में रजिस्ट्रार के रूप में काम कर रहां था. वह और डॉ.मुकुंद वैद्य तथा अन्य मित्र मिलकर, सिताबर्डिके मातृसेवा संघ के ब्लड बैंक के कमरे में, स्पार्क सोशलिस्ट फोरम के नाम से अभ्यास मंडल चलाने की कोशिश करते थे. वर्तमान जेन जी और अल्फा जेन युवाओं को शायद इस आभ्यासमंडल की गतिविधि के बारे में जानकारी नहीं होने की संभावना है. इसलिए थोड़ी रोशनी डालने की कोशिश कर रहा हूँ. सत्तर के दशक में यह गतिविधि आईआईटी, मेडिकल कॉलेज तथा अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों मे जीसमे महाराष्ट्र, बंगाल तथा दक्षिण भारत के ज्यादा तर जगहों पर भी चलाने की कोशिश, उस समय के विद्यार्थियों ने आभ्यास मंडल (Study circles) शुरू किए थे. तबसे हमारे बीच में परिचय है. मै भी हमारे अमरावती मेडिकल कॉलेज में राष्ट्र सेवा दल के नाम से, आभ्यास मंडल चलाने की कोशिश की है . उसकी मुख्य वजह आज जिस तरह की देश की वर्तमान स्थिति है.बिल्कुल ऐसी ही स्थिति सत्तर के दशक में भी भारत की थी. हालांकि वर्तमान समय की स्थिति भारत की आजादी के 80 साल के इतिहास में फासिस्टो के द्वारा चलाई जा रही स्थिति है. लगभग उस समय भी महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन हौले-हौले शुरू हो रहे थे. सिर्फ सांप्रदायिकता का जहर उतना फैला नही था. और सांप्रदायिक शक्तियों का मनोबल महात्मा गाँधी जी के हत्या के बाद गिरावट के दौर की बात है. तो वह भी अपने फासिस्ट चरित्र को छुपाते हूऐ महंगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में शामिल होनेकर अपनी फासिस्ट जमीन को बनाने की कोशिश कर रहे थे. और उसी समय से उन्हें गाँधी हत्या के अपराध से कुछ राहत तो मिल गई . पर गाँधी द्वेष को छुपाते हूऐ, बहरूपिये के जैसे अब वह पिछले 12 सालों से सत्ताधारी पार्टी बन गए है. तो अब गाँधी के हत्यारों का महिमामंडन करने से लेकर सावरकर जैसे अंग्रेज सेना के भर्ती बोर्ड मे शामिल आदमी जो आजादी के आंदोलन से दूरी बनाकर अंग्रेजों की बाँटो और राज करो की निति मे खुद शामिल होकर, ‘हिंदुत्व’ नाम की किताब 1923 में ही लिखकर बटवारे के लिए पथप्रदर्शक की भुमिका करने के बाद भी. वह अखंड भारत का पाखंड करते रहे. इसी सावरकर को लेकर आजसे 25 सालों पहले अकोला के शिबीर मे पहली बार मेरी ही अध्यक्षता मे राम ने सावरकर के 1910 तक का स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गिरफ्तार होने के बाद अंदमान की जेल में जाने के तुरंत बाद ही एक के बाद एक दर्जन से अधिक माफीनामा लिखने दस्तावेजों के साथ तथ्य को उजागर करने का साहस तो किया था. लेकिन दुसरे दिन हमारे शिबीर स्थल पर शिबीर के समापन के दौरान ही अचानक सावरकर के रिश्तेदार विक्रम सावरकर के नेतृत्व में जुलूस लेकर 10- 12 लोग पहुंच गए थे. उन्हें शिबीर मे बैठकर विस्तृत चर्चा के लिए काफी मनाने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने कहा कि पहले आप लोग माफी मांगीए. हमने कहा कि माफी मांगने का सवाल ही नहीं है. क्योंकि सावरकर के माफीनामो के रेकार्ड लेकर ही यह पूरी चर्चा हुई है.तो उन्होंने कहा कि हम आप के शिबीर का निषेध करने के लिए ही आए हैं. तो मैने कहा कि फिर तबियत से निषेध करते रहिये. क्योंकी अभी हम लोग शिबिर समापन कर रहे थे. तो उसी समय आप लोग आ गए हैं. आप निषेध का पर्चा लाए होंगे तो हमें दिजिये. हम उसका भी जवाब देंगे तो “बोले कि हम पढने लिखने तथा सुनने मे समय नहीं गवाते हम डायरेक्ट एक्शन वाले हैं.”
सत्तर के दशक में भारत की आजादी के पच्चीस साल 1972 में होने के बाद 25 साल की आजादी मे हमने क्या पाय – क्या खोया ? इस बात की समिक्षा तथा काफी चर्चा तथा आलोचना सार्वजनिक क्षेत्र में हो रहीं थीं. और मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कालेज तथा स्कूल – कॉलेजों में आभ्यास मंडल नाम से गतिविधियों का दौर शुरू था. चार-पांच साल पहले ही 1968 फ्रांस मे विद्यार्थीयों का आंदोलन हुआ था. और लॅटिन अमेरिका के क्यूबा, चिली, पनामा आदी देशों में क्रांतियों के अलावा, वीएतनाम के युद्ध और भारत के बगल में भाषा के आधार पर ही वर्तमान बंगला देश जो कभी पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था. जो आज 55 सालों से 1971 मे बंगला देश के रुप में जाना जाता है. और पश्चिम बंगाल के नक्सल प्रभावित होने की खबरे उस दौरान काफी फैल रही थी. इस तरह के काफी उत्तेजना से भरें हूऐ दिनों में हम लोग और राम, जितेंद्र शाह, प्रफुल्ल बिडवाई, सुधीर बेडेकर, सुभाष काणे , जैसे आई आई टीयन दोस्तों की उम्र पच्चीस- तीस सालों की रही होगी . और इसके अलावा जयप्रकाश नारायण के तरुण शांति सेना, युवक क्रांती दल और दलित पैंथर जैसे नए – नए युवकों के संघठन अंगडाई ले रहे थे. मतलब सत्तर से अस्सी के दशक में भारत में विएतनाम युद्ध से लेकर, युरोपीय देशों में फ्रांस के विद्यार्थीयो के आंदोलन से लेकर कमअधिक प्रमाण में समस्त विश्व में सबसे अधिक हलचलों वाले दशक के दौरान हम भी अपने तई योगदान देने वाले लोगों में से एक थे.
हमारे उस समय के इन सभी मित्रों में डाॅ. राम पुनीयानी, जितेंद्र शाह, प्रफुल्ल बिडवाई, किशोर देशपांडे, दिनानाथ मनोहर, सुधीर बेडेकर, लतीफ खाटिक, नामदेव ढसाळ, डॉ. कुमार सप्तर्षी, डॉ. अरुण लिमये,डॉ. अनिल अवचट. इनके अलावा सिनियर लोगों में, प्रोफेसर नरहर कुरुंदकर, हमीद दलवाई,प्रोफेसर ए. बी. शाह, यदुनाथ थत्ते, बाबा आमटे, प्रोफेसर ग. प्र. प्रधान, प्रोफेसर दि. के. बेडेकर, प्रोफेसर प्रभा गणोरकर, वसंत आबाजी डहाके, प्रोफेसर डी. वाय . देशपांडे – नातू मैडम, आचार्य दादा धर्माधिकारी, मामा क्षीरसागर, वसंत पळशिकर, दत्ता सावळे जैसे लोगों के प्रभाव में आने के कारण आज इतना खुलकर देखने – समझने का मौका मिला है . और स्पार्क सोशलिस्ट फोरम से लेकर युवक क्रांती दल, दलित पैंथर, तरुण शांति सेना तथा मेरे अपने मातृ संघठन राष्ट्र सेवा दल और छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की गतिविधियों में समान रूप से शामिल होने की वजह से ही. आज देश और दुनिया के सवाल पर विचार विमर्श करने की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना – शक्यता जारी है.
डॉ. राम पुनीयानी का परिवार पाकिस्तान से बटवारे के समय भारत में नागपुर में आकर बसा हुआ है. वैसे तो राम का जन्म नागपुर में ही हुआ है. लेकिन पैदा होने के बाद से ही घर में बटवारे की चर्चा सुनते – सुनते ही बडा हुआ है. लेकिन लालकृष्ण अडवाणी के जैसा सांप्रदायिक राजनीति में जाने की जगह, आई. के. गुजराल, कुलदीप नायर, न्यायमूर्ती राजेंद्र सच्चर, गौरकिशोर घोष जी के तरह दोबारा धर्म के नाम पर बटवारा नहीं हो. इसलिए सांप्रदायिकताके खिलाफ लड़ाई में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा हैं . यही इतिहास से सबक लेकर सही भूमिका लेनेवाले लोगों को इतिहास में हमेशा के लिए जगह मिलती है. जो डॉ. राम पुनियानी को भी मिलीं है. जिसका मुझे एक मित्र के रूप में अभिमान है.
और यही जज्बा होना चाहिए कि, और अब और बटवारा नही हो. लेकिन ज्यादातर लोगों को बंग्लादेश या पाकिस्तानी हिस्से से भारत में आनेके वजह से, सबसे ज्यादा मुस्लिम विरोधी देखने में आ रहा है. अन्यथा सिर्फ सांप्रदायिकता के उपर. भले ही पाकिस्तान में लगातार सांप्रदायिक दलों की ही सत्ता जारी है. लेकिन भारत में सांप्रदायिक शक्तियों को सौ साल की जद्दोजहद के बाद एक राजनीतिक दल को, भारत के आजादी के पचहत्तर साल के भीतर ही. हिंदुत्व के आधार पर सत्ता में आने का मौका 2014 मे मिला है. और वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण से निकला हुआ राजनीतिक दल होने की वजह से भाजपा शतप्रतिशत पूंजी पतियों की हिमायत करते हूऐ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से ही वर्तमान समय में भारत के सत्ताधारी बनने मे कामयाब हूऐ है. इसलिए डॉ. राम पुनियानि ने भी अपनी आईआईटी की बायोमेडिकल इंजिनिअर के प्रोफेसर की नौकरी को बिचमेही छोड़ कर सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ लिखने के साथ देशभर में विभिन्न मंचों पर जाकर प्रबोधन का काम शुरू किया है. इस विषय पर उसके सौ से अधिक पुस्तकों से लेकर हजारों गोष्ठियों में बोलने का रेकॉर्ड से लेकर सोशल नेटवर्किंग साइट पर जो भी सुविधाएं उपलब्ध है उन सभी के माध्यम का बहुत ही प्रभावी ढंग से उपयोग करते हुए हमारे जैसे एक्टिविस्ट लोगों का रिसोर्स पर्सन की भूमिका लगातार शायद भारत के सेक्यूलर आंदोलन में सबसे अधिक मात्रा में निभा रहा हैं.
हालांकि बटवारे की मार झेले हुए, लोग फिर वह बंगाल के हो या पंजाब के अभिभी उस पिडासे मुक्त नहीं हो सके. और इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार में सबसे कारक तत्व बटवारे के जख्मों को हरा कर के संघ और भी कई बटवारो की निंव खोदने का काम लगातार कर रहा है. और हैरानी की बात है कि वह साथ- साथही अखंड भारत का पाखंड भी करते जा रहा है. अब तो उन्होंने 14 अगस्त को बटवारे का दिन मनाने की शुरुआत भी कर दी है. लेकिन बटवारा क्यों हुआ? इस सवाल से चतुराई से बचकर बटवारे को लेकर छाती पिटने का काम कर रहे हैं.
डॉ. राम पुनीयानी के नागपुर के परिवार ने, थोक कपड़े के काम में सफलता हासिल करने के कारण, राम नागपुर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश करने के बाद ही, रामदास पेठ जैसे प्राईम लोकेशन जिसे नागपुर का मेडिकल अस्पतालों का हब भी बोला जाता है. ऐसे एरिया में दस हजार स्क्वेअर फिट से अधिक जगह खरीद ली थी. ताकि वह भी अन्य डाक्टरों के जैसा अपना खुद का अस्पताल शुरू कर सके. लेकिन डॉ. राम पुनीयानी को सामाजिक – राजनीतिक परिवर्तन की धुन सवार होने के कारण सबसे पहले नागपुर के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के बीच में मजदूरों कि यूनियन बनाने का काम की शुरुआत की थी . और इसी गतिविधियों को देखने के बाद ही प्रफुल्ल बिडवाई ने कहा “कि तुम बहुत ही अच्छी हिंदी बोल लेते हों इसलिए तुम देश की औद्योगिक राजधानी मुंबई चलो. और वहां के मजदूरों को संघठीत करने का काम शुरू करो.”
और अनायास अस्सी वाले दशक में आई आई टी मुंबई में पहले आई आई टी के अस्पताल में डाॅक्टर के रूप में काम करने का मौका मिला. और बाद में बायो मेडिकल इंजीनियरिंग की शाखा शुरू होने के बाद वहीपर प्रोफेसर बना.
राम का सामाजिक सरोकार तो पहले से ही था. और नब्बे के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सांप्रदायिक राजनीति ने रामजन्मभूमी – बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राम का संपूर्ण जीवन ही सांप्रदायिकताके खिलाफ लिखने – बोलने में लगभग पैतीस सालों से भी अधिक समय से जारी है. और गुजरात दंगों के बाद तो उसने अपने नौकरी से मुदतपूर्व रिटायर्मेंट ले लिया. और पूर्ण समय सांप्रदायिकताके विषय पर लिखने और बोलने वाले लोगों में पहले दस लोगों में एक नाम राम का है. और अंग्रेजी, हिंदी धाराप्रवाह बोलने – लिखने के कारण, भारत में और भारत के बाहर भी वह आज जाना – पहचाना नाम है. अबतक सौ से अधिक किताबें, और हजारों सेमिनार तथा शिबीरार्थियो को मार्गदर्शन करते हुए, आज भी इकस्सी साल की उम्र में भी सक्रिय हैं.
मेरा भी अक्तुबर 1989 के भागलपुर दंगे बाद विषय यही होने के कारण हम पहले से ही जुड़े हुए हैं. और सांप्रदायिकता के कारण और भी अधिक जुडकर काम कर रहे हैं. ऐसे मेरे प्रतिबध्द मित्र को जन्मदिन के अवसर पर स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए उसे और जीवन जीने की उम्मीद के साथ . शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ.
डॉ . सुरेश खैरनार, 18 अगस्त, 2026 नागपुर.
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