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पंजाब 2027: राजनीतिक एस्ट्रोटर्फ पर परगट सिंह का सबसे कठिन मैच | Pavitra India

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परगट सिंह हॉकी के मैदान पर भारत की कप्तानी कर चुके हैं। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में पंजाब कांग्रेस की कमान संभालना उनके लिए अब तक का सबसे कठिन मुकाबला साबित हो सकता है। उनकी बेदाग छवि, खेलों से आई अनुशासनप्रियता और संतुलित व्यवहार निश्चित रूप से एक उम्मीद जगाते हैं। लेकिन इस राजनीतिक एस्ट्रोटर्फ पर सबसे पहली चुनौती अपनी ही टीम के खिलाड़ियों को एक साझा गेम प्लान पर खेलने के लिए तैयार करना होगी।

वरिष्ठ नेता, अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं

पंजाब कांग्रेस में परगट सिंह से कहीं अधिक वरिष्ठ नेता मौजूद हैं—प्रताप सिंह बाजवा, राणा गुरजीत सिंह, सुखपाल सिंह खैरा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेता। इनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है और अपने-अपने स्वतंत्र जनाधार भी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष में बदलाव के पीछे भूमिका निभाने वाले कई वरिष्ठ नेता अब संगठन में अपना प्रभाव और बढ़ाने की उम्मीद कर सकते हैं। परगट को एक ओर इन नेताओं के कद और अनुभव का सम्मान करना होगा, तो दूसरी ओर अध्यक्ष के रूप में अपनी स्वतंत्र सत्ता और अधिकार भी स्थापित करना होगा।

राजनीति में नेता अक्सर साथ मिलकर शिकार करना और फिर शिकार का हिस्सा बांटना पसंद करते हैं—टिकट, प्रभाव और पद। इन अपेक्षाओं को संभालना, जो कई बार जायज होती हैं लेकिन अक्सर राजनीतिक सुविधा के मुताबिक ढाली जाती हैं, परगट के लिए दृढ़ता और रणनीति की मांग करेगा।

इन नेताओं को एक टीम की तरह काम करने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती होगी। इनमें से बहुत कम नेता ऐसे होंगे जो एक ऐसे पूर्व अकाली दल नेता को अध्यक्ष की कुर्सी पर देखना सहज महसूस करेंगे, जिसने 2017 में कांग्रेस का दामन थामा था।

वारिंग का अनुभव और अधिकार की लड़ाई

राजा अमरिंदर सिंह वारिंग का पूरा प्रकरण परगट के लिए एक अनुभव भी है और चेतावनी भी। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद राहुल गांधी ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी, उसे निभाने के लिए वारिंग ने कड़ी मेहनत की। हालांकि उनके कार्यकाल में 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से सात सीटें जीतीं। इसके बावजूद वरिष्ठ नेताओं का एक वर्ग उनके खिलाफ लामबंद हो गया, उसने कार्यक्रमों का बहिष्कार किया और व्यावहारिक तौर पर उनके कामकाज को बाधित कर दिया।

वारिंग की कमियां चाहे जो रही हों, प्रदेश अध्यक्ष को कमजोर करने का सीधा असर संगठन की ताकत पर पड़ा।

परगट को वारिंग द्वारा नियुक्त कार्यकारी अध्यक्षों, चुनाव समिति के प्रमुखों और जिला कांग्रेस अध्यक्षों के साथ आगे बढ़ना होगा। पहले उनकी पहचान चन्नी खेमे के करीब रहने वाले नेता के रूप में की जाती थी। लेकिन अब संकेत हैं कि निवर्तमान अध्यक्ष वारिंग ने विजय इंदर सिंगला के बजाय परगट सिंह के नाम की सिफारिश की थी। इससे पंजाब कांग्रेस के भीतर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।

वरिष्ठ नेता अपने समर्थकों के लिए टिकटों का दबाव बनाएंगे। उम्मीदवारों के चयन में जनसेवा, ईमानदारी, साफ छवि और चुनाव जीतने की क्षमता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आखिरकार टिकटों की अंतिम सूची ही यह बताएगी कि परगट सिंह वास्तव में टीम की कमान संभाल रहे हैं या फिर अलग-अलग नेताओं की अपनी-अपनी ‘कोटा राजनीति’ को समायोजित करने में लगे हैं।

मालवा का प्रतिनिधित्व

पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें मालवा क्षेत्र में हैं। इसलिए राजनीतिक रूप से मालवा का वजन सबसे ज्यादा है। यही परगट के सामने एक बड़ी चुनौती भी है।

परगट सिंह और चरणजीत सिंह चन्नी—जालंधर से सांसद और चमकौर साहिब से पूर्व विधायक होने के कारण—दोहा क्षेत्र से जुड़े हैं, जबकि प्रताप सिंह बाजवा और सुखजिंदर सिंह रंधावा माझा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ऐसे में कांग्रेस की मौजूदा संगठनात्मक संरचना में मालवा का प्रतिनिधित्व काफी हद तक कमजोर दिखाई देता है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है और इस पर परगट को विशेष ध्यान देना होगा।

हिंदू प्रतिनिधित्व की चुनौती

हिंदू प्रतिनिधित्व का सवाल भी कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है। पंजाब की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत है।

2021 में सुनील जाखड़ को लेकर पैदा हुआ विवाद—जब उनकी धार्मिक पहचान मुख्यमंत्री पद की दौड़ में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई थी—कांग्रेस में हिंदुओं के उचित प्रतिनिधित्व को लेकर एक असहज सवाल छोड़ गया था।

इस बार विजय इंदर सिंगला अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदारों में थे। ऐसे में परगट सिंह की नियुक्ति उस पुराने असंतोष और धारणा को फिर से जन्म दे सकती है कि कांग्रेस में हिंदू नेतृत्व को पर्याप्त राजनीतिक स्थान नहीं मिलता।

हिंदू नेताओं को संगठन में दिखाई देने वाली और वास्तविक राजनीतिक जिम्मेदारियां देनी होंगी। इसके साथ ही कारोबार, रोजगार, कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को एक विश्वसनीय शहरी एजेंडा भी सामने रखना होगा।

अनुसूचित जाति का समर्थन

पंजाब की आबादी में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी रखने वाला अनुसूचित जाति मतदाता कभी कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है। लेकिन अब इस समर्थन को स्वाभाविक मानकर नहीं चला जा सकता। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह पारंपरिक आधार पहले ही काफी कमजोर हो चुका है।

आम आदमी पार्टी की मुफ्त योजनाएं, पात्र महिलाओं को ₹1,000 की मासिक सहायता, एससी लाभार्थियों के लिए बढ़ाकर ₹1,500 की सहायता और हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली जैसी योजनाएं आम परिवारों को प्रत्यक्ष राहत देती हैं।

दूसरी ओर, भाजपा रविदास समुदाय और डेरा सचखंड बल्लां के साथ अपना संपर्क और प्रभाव बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रही है।

ऐसे में कांग्रेस को सम्मान, शिक्षा, रोजगार और अधिकारों के मुद्दों पर लगातार और जमीन से जुड़ा संवाद कायम करना होगा। केवल चन्नी की मौजूदगी इस चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।

चुनावी फंड और राजनीतिक प्रभाव

परगट के सामने वित्तीय संसाधनों की चुनौती भी कम बड़ी नहीं होगी। बूथ स्तर के संगठन, रैलियां, रणनीतिकार, यात्राएं, प्रचार और डिजिटल कैंपेन के लिए भारी धनराशि की जरूरत होगी।

उन्हें चुनाव अभियान के लिए पर्याप्त चंदा और संसाधन जुटाने होंगे। कुछ बेहद अमीर नेताओं, राजनीतिक सिंडिकेटों या कथित माफिया नेटवर्क पर निर्भरता उनके लिए घातक साबित हो सकती है और एक साफ-सुथरे राजनेता के रूप में उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।

बागियों का खतरा

बागी उम्मीदवार एक और बड़ा खतरा होंगे।

वारिंग द्वारा 60-70 युवा चेहरों को आगे बढ़ाने की कोशिश ने टिकट के इच्छुक नए नेताओं की उम्मीदें बढ़ा दी थीं। यह राहुल गांधी की उस सोच के अनुरूप था, जिसमें पार्टी में नए और युवा चेहरों को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।

यही स्थापित नेताओं के साथ टकराव का एक बड़ा कारण भी बना। पुराने और प्रभावशाली नेता राजनीतिक जमीन को अपने परिवारों के बाहर किसी के साथ साझा करने के लिए तैयार नहीं दिखते।

अब यदि स्थापित नेता अपने प्रभाव के दम पर टिकट हासिल करने में सफल होते हैं—और अंततः इसकी पूरी संभावना है—तो निराश युवा दावेदारों के सामने दो रास्ते होंगे। वे निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या फिर विरोधी दलों का रुख कर सकते हैं। इनमें से कई दावेदार वर्षों से अपनी राजनीतिक जमीन बनाने और अपनी उम्मीदवारी पर समय तथा पैसा खर्च कर चुके हैं।

मुख्य प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी ऐसे असंतुष्ट नेताओं को प्रोत्साहित करने, यहां तक कि उनके चुनाव अभियान को समर्थन देने से लाभ उठा सकती है।

किसी बागी उम्मीदवार का चुनाव जीतना जरूरी नहीं है। अगर वह कांग्रेस के खाते से केवल 2,000 से 5,000 वोट भी काट लेता है, तो कांटे के मुकाबले में पूरा चुनावी गणित बदल सकता है।

इसलिए परगट को युवा और महत्वाकांक्षी नेताओं के इस वर्ग के साथ संवाद और समझौते का रास्ता निकालना होगा।

सबसे बड़ा सवाल—पंजाब के लिए विजन?

लेकिन इन तमाम संगठनात्मक चुनौतियों से भी बड़ा सवाल पंजाब के भविष्य का है।

पंजाब को नशे, कानून-व्यवस्था, कृषि संकट, पानी और युवाओं के रोजगार जैसे गंभीर मुद्दों पर एक विश्वसनीय रोडमैप चाहिए। कांग्रेस को ऐसा घोषणापत्र पेश करना होगा जो केवल वादों का पुलिंदा न हो, बल्कि प्राथमिकताओं, वित्तीय संसाधनों और उन्हें लागू करने की स्पष्ट समय-सीमा के साथ सामने आए।

परगट सिंह की साफ छवि उन्हें जनता का भरोसा दिला सकती है। लेकिन उनकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ऐसी अनुशासित टीम कितनी जल्दी तैयार करते हैं जो पुरस्कार और हिस्सेदारी की सौदेबाजी से पहले जीत के लिए मैदान में उतरने को तैयार हो।

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