अरविंद चतुर्वेदी
पत्रकारिता से सत्ता तक: दुनिया और भारत के चर्चित उदाहरण
इतिहास गवाह है कि दुनिया और देश में कई ऐसे पत्रकार रहे जिन्होंने या तो जनता के दिलों पर राज किया या सीधे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे। तहलका संडे स्पेशल में आइए पड़ताल करते हैं ऐसे ही चुनिंदा दिग्गजों की
वैश्विक पटल पर: -कलम से सीधे सिंहासन तक
बेनिटो मुसोलिनी: समाजवादी पत्रकार से इटली के तानाशाह तक
बेनिटो मुसोलिनी (इटली),राजनीतिक जीवन से पहले मुसोलिनी एक समाजवादी पत्रकार थे। वे सोशलिस्ट पार्टी के अखबार Avanti! के मुख्य संपादक रहे और बाद में अपना अखबार Il Popolo d’Italia निकाला। पत्रकारिता से वैचारिक जमीन तैयार करने के बाद वे फासीवादी पार्टी के नेता बने और 1922 से 1943 तक इटली के तानाशाह प्रधानमंत्री रहे।
बोरिस जॉनसन: पत्रकारिता से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री तक
बोरिस जॉनसन (ब्रिटेन): राजनीति में आने से पहले जॉनसन एक जाने-माने पत्रकार थे। उन्होंने प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान The Daily Telegraph के ब्रसेल्स संवाददाता और मशहूर मैगज़ीन The Spectator के संपादक के रूप में काम किया। इसके बाद वे कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता बने और 2019 से 2022 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे।
विंस्टन चर्चिल: युद्ध संवाददाता से दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री
विंस्टन चर्चिल (ब्रिटेन): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल ने शुरुआती जीवन में युद्ध संवाददाता (War Correspondent) और लेखक के रूप में काम किया था। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के बोअर युद्ध के दौरान The Morning Post के लिए रिपोर्टिंग की। ख्याति पाने के बाद वे राजनीति में आए और दो बार (1940–45 और 1951–55) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने।
टोनी एबॉट: अखबार से ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री तक
टोनी एबॉट (ऑस्ट्रेलिया): ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ने राजनीति में आने से पहले द ऑस्ट्रेलियन (The Australian) अखबार के लिए पत्रकार के रूप में काम किया था। वे लिबरल पार्टी के प्रमुख बने और 2013 से 2015 तक ऑस्ट्रेलिया के 28वें प्रधानमंत्री रहे।
भारत में पत्रकारिता से शीर्ष राजनीति तक कौन पहुंचा?
महात्मा गांधी: संपादन, विचार और स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व
महात्मा गांधी: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक थे। उन्होंने Indian Opinion, यंग इंडिया (Young India), नवजीवन और हरिजन जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने कभी कोई औपचारिक पद नहीं लिया, लेकिन उनके लेखों और विचारों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया।
अटल बिहारी वाजपेयी: राष्ट्रधर्म से प्रधानमंत्री पद तक
अटल बिहारी वाजपेयी: भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में शुमार अटल बिहारी वाजपेयी एक समर्पित पत्रकार थे। उन्होंने आरएसएस के मुखपत्रों और पत्रिकाओं राष्ट्रधर्म, पाँचजन्य और स्वदेश का संपादन किया। पत्रकारिता से सीधे जनसंघ और राजनीति में आए वाजपेयी ने अपनी वाक्पटुता व नीतियों से देश पर गहरी छाप छोड़ी।
जवाहरलाल नेहरू और नेशनल हेराल्ड की भूमिका
जवाहरलाल नेहरू: स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वैचारिक आधार तैयार करने के लिए ‘नेशनल हेराल्ड’ (National Herald) अखबार की नींव रखी थी। नेहरू ने पत्रकारिता और लेखन (जैसे ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’) के जरिए राजनीतिक चेतना जगाई।
भारत में कौन-से पत्रकार मंत्री, सांसद और प्रशासक बने?
भारत में कई ऐसे दिग्गज पत्रकार हुए जिन्होंने बड़े मीडिया घरानों की कमान संभाली और बाद में राजनीति या शासन के बड़े पदों तक पहुंचे:
एमजे अकबर, अरुण शौरी और कुलदीप नैयर की सार्वजनिक भूमिकाएं
एम.जे. अकबर और अरुण शौरी,देश के सबसे बड़े मीडिया घरानों (द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया, संडे मैगजीन, द टेलीग्राफ) के संपादक रहे ये दिग्गज बाद में राजनीति में आए और केंद्र सरकार में मंत्री बने। कुलदीप नैयर देश के सबसे वरिष्ठ और बेबाक स्तंभकारों (Columnists) में गिने जाने वाले नैयर को 1990 में ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त (High Commissioner) नियुक्त किया गया था। इसके बाद वे 1997 में राज्यसभा सांसद भी रहे। हरिवंश नारायण सिंह, हिंदी दैनिक ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक रहे हरिवंश जनता दल (यूनाइटेड) से जुड़े और वर्तमान में संसद के उच्च सदन राज्यसभा के उपसभापति (Deputy Chairman) के रूप में देश की दूसरी सबसे बड़ी संसदीय पीठ पर आसीन हैं। मनीष सिसोदिया, राजनीति में आने से पहले मनीष ने ‘ज़ी न्यूज़’ और ऑल इंडिया रेडियो में बतौर पत्रकार, न्यूज़ रीडर और प्रोड्यूसर काम किया था। ‘आप’ की स्थापना के बाद वे दिल्ली के पहले उपमुख्यमंत्री बने। अंग्रेजी दैनिक ‘द पायनियर’ के संपादक चंदन मित्र और प्रखर विचारक बलबीर पुंज भाजपा के टिकट पर राज्यसभा सांसद रहे।
प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के मीडिया सलाहकारों की भूमिका
भारतीय राजनीतिक इतिहास में कई प्रतिष्ठित पत्रकार ऐसे भी रहे जिन्होंने अपनी विशेषज्ञता के बल पर पीएमओ (PMO) और मुख्यमंत्रियों के मीडिया सलाहकार या प्रेस सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:
प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सलाहकार कौन रहे हैं?
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के मीडिया सलाहकार:
संजय बारू: ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’, ‘द फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ और ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के संपादक रहे। उन्होंने मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर चर्चित किताब ‘The Accidental Prime Minister’ लिखी।
हरिश खरे: ‘द हिंदू’ और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के रेजिडेंट एडिटर रहे और 2009 से 2012 तक पीएमओ में मीडिया सलाहकार रहे।
पंकज पचौरी: एनडीटीवी (NDTV) और बीबीसी से जुड़े रहे और 2012 में पीएम के मीडिया सलाहकार बने।
प्रो. अशोक कुमार टंडन: पीटीआई (PTI) के यूके ब्यूरो चीफ रहे प्रो. टंडन ने वाजपेयी सरकार के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया रिलेशंस की कमान संभाली थी।
अशोक मलिक: ‘इंडिया टुडे’ और ‘द पायनियर’ के वरिष्ठ पत्रकार रहे अशोक मलिक को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का प्रेस सचिव नियुक्त किया गया था।
राज्यों में पत्रकारों से बने मीडिया सलाहकार और प्रवक्ता
राज्य स्तर पर मीडिया सलाहकार व प्रवक्ता:
हिरेन जोशी: राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा (तथा पूर्ववर्ती सरकारों में भी) के मीडिया सलाहकार।
मृत्युंजय कुमार: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार।
शलभ मणि त्रिपाठी: पत्रकारिता से निकलकर राजनीति और यूपी सरकार में मीडिया समन्वयक/प्रवक्ता की भूमिका।
आर. कृष्णा दास: छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मीडिया सलाहकार।
अन्य चर्चित नाम: रोहित सावल (जो हिमाचल के सीएम के मीडिया सलाहकार रह चुके हैं और बाद में पत्रकारिता में लौटे), जय प्रकाश रम्माईया (डी.के. शिवकुमार के मीडिया एडवाइजर), और यतेन्द्र शर्मा (बीजेपी यूपी के मीडिया प्रभारी)।हाल ही में पत्रकारिता छोड़ राजनीति में आए रजत राकेश टण्डन जो खुद को पुरूषोतम दास टण्डन के खानदान से सम्बंध रखने की बात करते है ।
पत्रकार का काम सत्ता का साझीदार बनना है या उसका आईना?
महान दार्शनिक अल्बर्ट कामू मानते थे कि सत्ता हमेशा अपनी स्थापना चाहती है और सत्य को झुकाना चाहती है। पत्रकार का काम सत्ता का साझीदार बनना नहीं, बल्कि सत्ता के सामने आईना बनकर खड़े रहना है। सत्ता से हक माँगना या सत्ता में शामिल होना अक्सर उस पत्रकार को उसी व्यवस्था का हिस्सा बना देता है, जिसकी वह कभी आलोचना किया करता था।
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