डॉ. मोहन भागवत जी, दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।
आरएसएस के शताब्दी समारोह के समापन समारोह के दौरान आपने दशहरे के दिन 20 अक्टूबर को नागपुर के रेशीमबाग स्थित आरएसएस के मुख्यालय के प्रांगण में रेजिम चेंज करने के बारे में जो वक्तव्य दिया है, उसे देखकर मुझे “सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली है” जैसी पुरानी कहावत याद आई है। क्योंकि आरएसएस के पूर्ववर्ती इतिहास को मैं पिछले साठ सालों से लगातार देख रहा हूँ। जबकि आज तक के सभी आरएसएस के प्रमुख “हमारा राजनीति से कोई संबंध नहीं है, हमारा संगठन शुद्ध रूप से सांस्कृतिक संगठन है” जैसे दावे करते रहते हैं। लेकिन 101 सालों की यात्रा में, आजादी के बाद 79 सालों की यात्रा को देखकर लगता है कि आरएसएस की स्थापना ही मूलतः ‘एकचालकानुवर्त’ अपने फासिस्ट सपने की रेजिम चेंज करने के लिए ही की गई है।
वर्तमान समय के रेजिम चेंज करने के विवाद में भागीदारी करते हुए, आपने आरोप लगाया है कि इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ है। जैसा गैरजिम्मेदाराना आरोप आपने लगाया है, यही आपके द्वारा हमारे संगठन का राजनीति से कोई संबंध नहीं है, यह सौ सालों से लगातार झूठा किया जा रहा दावे के पाखंड को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। आज मैं इसी आप सभी के झूठ का पर्दाफाश करने के लिए, भारत से अंग्रेजों के 1947 में चले जाने के बाद 1952 से संसदीय राजनीति की शुरुआत से ही आपके संगठन आरएसएस की राजनीतिक इकाई जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 के दिन द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने रेजिम चेंज करने के लिए ही की थी, यह याद दिलाना चाहता हूँ।
1971-72 में मानसून का साइकिल बिगड़ने की वजह से देश का काफी बड़ा हिस्सा अकाल की चपेट में आने की वजह से महंगाई आसमान छू रही थी। और लोगों में अन्न की कमी की वजह से बहुत असंतोष फैल गया था। महाराष्ट्र से लेकर देश के अन्य हिस्सों में भी लोग रस्ते पर उतर कर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। अनाज के गोदाम पर हमला करते हुए अनाज को लूटने की घटनाएं हो रही थीं। मैं खुद उस दौरान अमरावती में कॉलेज की पढ़ाई के लिए होने की वजह से उस आंदोलन में शामिल रहने वाले लोगों में से एक रहा हूँ। लेकिन उस परिस्थिति की सबसे बड़ी संगठित अभिव्यक्ति सबसे पहले गुजरात राज्य में ‘नवनिर्माण आंदोलन’ के नाम से जो आंदोलन जाना जाता है, उसकी शुरुआत मोरबी के सरदार पटेल इंजीनियरिंग कॉलेज की मेस में भोजन की थाली का रेट जो पहले एक रुपया था, उसे सव्वा रुपया यानी चार आना बढ़ाने से वहाँ के विद्यार्थियों ने उसके विरोध में आंदोलन शुरू किया था। जो तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की कांग्रेस पार्टी की रेजिम चेंज करने तक चला गया था। और बाबूभाई पटेल के नेतृत्व में जनता सरकार को उनकी जगह पर 1975 में लाने का काम हुआ है। यह आजादी के बाद पहली बार किसी जनआंदोलन की वजह से रेजिम चेंज का पहला उदाहरण है, जिसमें आरएसएस और उसकी राजनीतिक इकाई जनसंघ भी शामिल थे। जनता पार्टी का गठन आपातकाल के बाद का है।
मेरे वरिष्ठ मित्र दत्तप्रसाद दाभोलकर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के वरिष्ठ बंधु हैं। जिन्होंने नानाजी देशमुख के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के गोंडा तथा चित्रकूट के ग्रामीण विकास कार्य का नजदीकी से निरीक्षण करने के लिए उस क्षेत्र में कुछ दिनों के लिए यात्रा की थी। उस दौरान दत्तप्रसाद दाभोलकर को नानाजी देशमुख ने टेपरेकॉर्डर पर साक्षात्कार देते हुए कहा था कि:
“महात्मा गांधीजी की हत्या के बाद हम आरएसएस और जनसंघ के लोगों को मुंह दिखाने के लिए जगह नहीं बची थी। इसलिए हम बहुत चिंतित थे। क्योंकि 1951 में जनसंघ की स्थापना करने के बाद, हिंदुओं की बहुतायत रहते हुए भी, भारत की संसदीय राजनीति में हमें कामयाबी नहीं मिल रही थी। इसलिए हमने काफी सोच-विचार करने के बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दो प्रतिभाशाली हीरो जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया, जिन्हें महात्मा गांधीजी के बाद भारत के सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में बहुत आदर और सम्मान प्राप्त है, यह देखकर ही हमने मन-ही-मन में तय कर लिया था कि इनका विश्वास संपादन करते हुए इनके नेतृत्व में भारत में कांग्रेस के राज के खिलाफ रेजिम चेंज का प्रयास किया जा सकता है।
और उसके लिए मैंने देखा कि जयप्रकाश नारायण तो 1954 से विनोबाजी के साथ सर्वोदय में जीवनदानी बन गए थे। वर्तमान समय में जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ डॉ. राममनोहर लोहिया एकमात्र राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं जो उनके साथ लोहा ले रहे थे। इसलिए मैंने सबसे पहले डॉ. राममनोहर लोहिया को लखनऊ के कॉफी हाउस में 1963 की शुरुआत में ही जाकर अपना परिचय देते हुए कहा कि ‘मुझे आपके साथ दोस्ती करना है।’ और उसके बाद मैंने उन्हें उत्तर प्रदेश के आर.एस.एस. और जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन में आमंत्रित किया था। इस तरह उनका विश्वास संपादन करने में मुझे कामयाबी हासिल हुई।
उनको लोकसभा में भेजने के लिए हम लोगों ने कांग्रेस के 1963 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के सांसद पंडित मूलचंद दुबे के निधन के बाद खाली हुई सीट के उपचुनाव में पहली बार जनसंघ ने डॉ. राममनोहर लोहिया की उम्मीदवारी को समर्थन देते हुए, और उसके बदले में उसी दौरान सोशलिस्ट पार्टी का समर्थन पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जौनपुर के लोकसभा उपचुनाव में देने का समझौता हुआ था। जिसमें डॉ. लोहिया की जीत हुई थी और जौनपुर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय हार गए थे। और इसी के बाद तत्कालीन कांग्रेस की रेजिम चेंज करने के लिए डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति में जनसंघ तथा आरएसएस अपनी पूरी ताकत के साथ शामिल होने के बाद ही हमें उत्तर भारत में थोड़ी सफलता मिलने की शुरुआत हुई थी। 1967 में उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में कांग्रेस की रेजिम चेंज करते हुए हमारी संयुक्त गैर-कांग्रेसवादी सरकारों के गठन की शुरुआत हुई है।
लेकिन अचानक ही डॉ. राममनोहर लोहिया 12 अक्टूबर 1967 के दिन प्रोस्टेट ग्रंथि के ऑपरेशन में गड़बड़ी होने की वजह से अकाल मृत्यु के शिकार हो गए, जो सोशलिस्ट पार्टी के लोगों के साथ हमारे लिए भी बहुत बड़ा झटका था। तब मैंने जयप्रकाश नारायण की तरफ ध्यान देना शुरू किया, क्योंकि जयप्रकाश नारायण 1954 से आचार्य विनोबा भावे के सर्वोदय में जीवनदानी बनकर सर्वोदय के लोकसेवक बन गए थे। लेकिन 1973 के जनवरी में उनकी पत्नी प्रभावतीजी को कैंसर की बीमारी की शुरुआत हुई थी। और उनके इलाज के दौरान मैंने सभी राजनीतिक गतिविधियों को किनारे रखकर प्रभावतीजी की माताजी की तरह सेवा की थी। और मेरी सेवा को देखकर जयप्रकाशजी ने भी मुझे अपना मानसपुत्र मानना शुरू किया था। और प्रभावतीजी की स्मृति में मैंने गोंडा, उत्तर प्रदेश में ‘जयप्रभा ग्राम’ की स्थापना की है।
इस तरह जयप्रकाशजी का विश्वास संपादन करने के बाद, फरवरी 1974 में गुजरात में चल रहे विद्यार्थियों के ‘नवनिर्माण आंदोलन’ के दौरान उन्हें गुजरात ले जाने के पहले मैंने आरएसएस और जनसंघ के सभी सदस्यों को सूचित किया था कि जयप्रकाशजी की सभा में बड़ी संख्या में लोगों को लाना है। और अहमदाबाद के हवाईअड्डे पर एक हजार से अधिक संख्या में कारों को लाकर जयप्रकाश नारायण का जबरदस्त स्वागत करना है। और अहमदाबाद हवाईअड्डे पर उस तरह हमारे स्वयंसेवक तथा कार्यकर्ता उपस्थित थे। तथा अहमदाबाद की जनसभा में एक लाख से अधिक संख्या में लोग उपस्थित थे। यह नजारा देखने के बाद जयप्रकाशजी ने कहा कि मुझे 1942 याद आ रहा है। उसके बाद गुजरात में कांग्रेस की चिमनभाई पटेल की सरकार को 9 फरवरी 1974 के दिन इस्तीफा देना पड़ा।
यह रेजिम चेंज करने का आजादी के बाद का भारत का पहला प्रयोग करने के बाद, उसके आसपास बिहार में भी विद्यार्थी आंदोलन में विद्यार्थियों के आग्रह की वजह से जयप्रकाशजी के नेतृत्व करने के बाद बिहार में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फूर का इस्तीफा 18 मार्च 1974 से मांगने की शुरुआत हो गई थी। और उन्होंने एक साल के बाद 11 अप्रैल 1975 को इस्तीफा दे दिया था। यह एक साल में दूसरे राज्य में रेजिम चेंज के बाद हमारे सामने श्रीमती इंदिरा गांधी जी को केंद्र से भी रेजिम चेंज की चुनौती के दौरान ही हम लोगों ने 25 जून 1975 के दिन दिल्ली के राम लीला मैदान की सभा में ‘सिंहासन खाली करो की जनता आ रही है’ के नारे के साथ रेजिम चेंज के संकेत देने के बाद कुछ घंटों के भीतर ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने उसी 25 जून की आधी रात को आपातकाल की घोषणा की है।
उसके दो सालों के बाद इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा की थी। और 23 जनवरी 1977 को जयप्रकाश नारायण के आग्रह की वजह से ही जनता पार्टी का गठन किया गया था। जिसमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस के साथ चौधरी चरण सिंह के लोक दल तथा बाद में जगजीवन राम तथा हेमवती नंदन बहुगुणा की पार्टियों को मिलाकर बनी जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व की कांग्रेस पार्टी की रेजिम चेंज करते हुए मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने के प्रयोग में जनता पार्टी के भीतर पुराने जनसंघ के लोगों को लेकर उनकी आरएसएस और जनता पार्टी के साथ दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर दो सालों के भीतर ही जुलाई 1979 में जनता पार्टी की सरकार की रेजिम चेंज करने की नौबत भी आरएसएस के कारण ही आई थी।”
उसके बाद आरएसएस की सदस्यता नहीं छोड़ने वाले जनता पार्टी के पूर्व जनसंघ के लोगों ने 6 अप्रैल 1980 को वर्तमान सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की है।
2014 में दिल्ली में सत्ताधारी दल बनने के पहले यानी रेजिम चेंज करने के लिए, 1980 से ही विभिन्न दलों के साथ गैर-कांग्रेसवाद के चलते वी. पी. सिंह की सरकार का समर्थन करते हुए उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए मदद की है। लेकिन 23 अक्टूबर 1990 के दिन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को बिहार में समस्तीपुर में 23 अक्टूबर 1990 के दिन रोककर उन्हें गिरफ्तार कर लेने के विरोध में भाजपा ने वी. पी. सिंह की सरकार को अपना समर्थन वापस लेकर एक साल से भी कम समय की (343 दिन) वी. पी. सिंह की रेजिम चेंज करने का काम किया है।
उसके बाद 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत में पहली बार 13 दिन के लिए (13 मई 1996 से 16 मई 1996) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इकाई भाजपा की रेजिम आजादी के बाद पहली बार केंद्र में सरकार बनी थी, जो लोकसभा में अपना बहुमत साबित न कर पाने की वजह से रेजिम चेंज कर दी गई। उसके बाद 19 मार्च 1998 को दोबारा अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद 13 महीनों में जयललिता की एआईडीएमके ने अपना सपोर्ट वापस लेने के बाद 17 अप्रैल 1999 को वापसी की वजह से एक वोट से (269 के मुकाबले 270) पुनः अटल बिहारी वाजपेयी जी की रेजिम चेंज हो गई थी। उसके बाद दोबारा आमचुनाव कराने पड़े थे। और एनडीए के (26 घटक दलों के साथ) गठबंधन की जित होने के बाद (303 सिटें जीतने के बाद), तीसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत में सरकार बनने का रिकॉर्ड बनाया है। (मतलब अटल बिहारी वाजपेयी के अकेले के जीवन में तीन बार रेजिम चेंज करने का मौका मिला है।)
वर्तमान समय में भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले साढ़े बारह सालों से लगातार एनडीए (41) दलों के साथ केंद्र में सरकार चल रही है। लेकिन इस सरकार को सत्तारूढ़ करने के लिए 2011 में तथाकथित जनलोकपाल बिल की मांग करते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ रेजिम चेंज करने के आंदोलन को हरतरह की मदद करने की चर्चा के दौरान जब अण्णा हजारे ने “हमारे आंदोलन के साथ आरएसएस का कोई संबंध नहीं है,” ऐसा कहने के बाद मोहन भागवत ने पटना की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहुत नाराज होकर अण्णा हजारे को एहसानफरामोश बोलते हुए कहा था कि “इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के दौरान हमारे स्वयंसेवकों ने सुबह से शाम तक आज जंतर-मंतर पर दिनभर क्या होगा? कौन से नारे दिए जाएंगे? से लेकर मंच पर कौन रहेंगे या कौन नहीं? यह भी आरएसएस ही तय करता था। और स्वयंसेवकों से लेकर हरतरह की मदद करने का काम आरएसएस ने ही किया है।”
यह दावा खुद करने वाले मोहन भागवत आज रेजिम चेंज को लेकर विदेशी षड्यंत्र से लेकर हमारे देश की तरक्की को रोकने की साजिश बता रहे हैं।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले 1974 के आंदोलन को भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने जयप्रकाशजी को सीआईए का दलाल बोलते हुए, पड़ोसी बंगला देश के शेख मुजीबुर रहमान (15 अगस्त 1975) के जैसे मेरी और मेरे परिवार के सभी सदस्यों की हत्या की साजिश करने का आरोप लगाया था। 25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल की घोषणा करते हुए, उस आंदोलन में शामिल आरएसएस को तो 1948 के बाद दोबारा बैन लगाकर उसके हजारों स्वयंसेवकों को देशभर में विभिन्न जेलों में बंद कर दिया था।
उस समय मैंने खुद जेल में देखा था कि आरएसएस के स्वयंसेवक माफीनामों पर हस्ताक्षर करते हुए इंदिरा गांधी को शपथपूर्वक लिखकर दे रहे थे कि “हमारा और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का कोई संबंध नहीं है। हम तो आपके 20 पाइंट कार्यक्रम का समर्थन करते हुए, उसे अमल में लाने के लिए, हमें जेल से रिहा कीजिए।” इस तरह का अंडरटेकिंग लिखित रूप में दे रहे थे। और हम उन्हें समझा रहे थे कि इंदिरा गांधी आपको नहीं छोड़ेंगी क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से पता है कि जयप्रकाशजी के आंदोलन में आप लोग शामिल थे। और आप सभी स्वयंसेवक उनके बारे में कितने घटिया स्तर पर उनके तथा उनके पिता जवाहरलाल नेहरू जी के खिलाफ चरित्र हरण करते रहते हो। और सचमुच ही इंदिरा गांधी ने इनके माफीनामों की अनदेखी करते हुए उन्हें रिहा नहीं किया था।
1977 के 18 जनवरी के दिन इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग करते हुए लोकसभा चुनाव की घोषणा करने के बाद आरएसएस के स्वयंसेवकों ने इंदिरा गांधी जी की रेजिम चेंज करने के लिए उस चुनाव में अपने आप को झोंक दिया था। क्योंकि अमरावती जेल से मेरी रिहाई होने के बाद जनता पार्टी के महाराष्ट्र के अध्यक्ष श्री. एस. एम. जोशीजी ने मुझे जनता पार्टी का अमरावती लोकसभा का उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया था। और मैं चुनाव में भाग लेने से मना कर रहा था, तो मुझे आरएसएस और जनसंघ के अमरावती के लोगों ने बहुत आग्रह किया था कि हमारे पास लायक उम्मीदवार नहीं है। इसलिए हम आपकी उम्मीदवारी को सहर्ष स्वीकार करते हुए, आपके चुनाव में हरतरह की मदद करने का आग्रह कर रहे थे। क्योंकि 25 जून 1975 के दिन आपातकाल की घोषणा के बाद मैं सालभर से अधिक समय तक भूमिगत गतिविधियों में शामिल रहने के दौरान मुझे आरएसएस के लोगों ने ही छुपाने से लेकर, मेरी दैनंदिन आवश्यकताओं को पूरा करने का काम किया है। इसलिए मुझे आरएसएस के और जनसंघ के लोगों का तहेदिल से समर्थन था। इसमें कोई शक नहीं है। क्योंकि उनका मुझे पार्लियामेंट में भेजने का एकमात्र उद्देश्य, तत्कालीन कांग्रेस रेजिम चेंज को चेंज करना था।
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